आचार्य नरेंद्र देव (फाइल फोटो)
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यह स्पष्ट है कि व्यक्ति को अमर्यादित स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती, क्योंकि सब व्यक्तियों की स्वतंत्रता की रक्षा करनी है। मर्यादा को स्वीकार करके ही व्यक्तित्व का विकास संभव है। व्यक्ति को यह स्वीकार करना पड़ेगा। यह ठीक है कि व्यक्ति पर परिस्थिति का प्रभाव पड़ता है, किंतु यह भी सत्य है कि व्यक्ति परिस्थिति को बदलता है।
मानव और प्रकृति की एक-दूसरे पर क्रिया-प्रतिक्रिया होती रहती है। यदि व्यक्ति की स्वतंत्रता का लोप हो जाए और कानून, परंपरा और रूढ़ि द्वारा उसको स्वतंत्र रीति से सोचने और काम करने का अधिकार न दिया जाए, तो समाज की उन्नति का क्रम बंद हो जाए और मानवोन्नति असंभव हो जाए।
इतिहास बताता है कि जिस समाज में व्यक्ति की स्वतंत्रता का अपहरण किया गया और राज्य या समाज की ओर से विचारों का दमन हुआ, उस समाज का ह्रास और पतन हुआ। विचार और संस्था के इतिहास में एक समय आता है, जब वह जड़ और स्थित हो जाती है। परिस्थितियां बदल जाती हैं और वे नए विचारों और नई संस्थाओं की मांग करती हैं।
किंतु पुराने विचार और पुरानी संस्थाएं मनुष्य पर ऐसा प्रभाव जमाए रहती हैं कि वह नए सिरे से सोचने को तैयार नहीं होता। अतः समाज के स्वस्थ जीवन के लिए ऐसे केंद्र चाहिए, जहां से पुराने विचारों और संस्थाओं की आलोचना होती रहे और जिनसे नए विचारों के उपक्रम में सहायता मिलती रहे, इसके लिए विचार-विनिमय की स्वतंत्रता अपेक्षित है।
यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी मर्यादा को समझे तो व्यक्ति और समष्टि में कोई झगड़ा नहीं है। व्यक्ति और समष्टि के बीच सामंजस्य का होना जरूरी है। हमारे समाज में विचार-स्वातंत्र्य रहा है। इसके कारण धार्मिक सहिष्णुता भी रही है। इस विचार-स्वातंत्र्य की, जो हमारी सबसे बड़ी निधि है, हमको रक्षा करनी चाहिए और उसकी युग के अनुकूल वृद्धि भी करनी है।