एक कविता का अर्थ कवि क्या कहना चाहता था, उसमें नहीं, दरअसल कविता क्या कहती है, वहां मिलता है। कविता रुदन और चुप्पी, अर्थ और निरर्थ के बीच खड़ी होती है। शब्दों की यह दुबली धार कहती है कि मैं कुछ भी ऐसा नहीं कह रही, जिसे पहले चुप्पी और हल्ले में नहीं कहा गया है। जब यह इतना कह देती है, तो कोलाहल और खामोशी खत्म हो जाती है। कविता अर्थ के खिलाफ एक अनवरत संघर्ष में शामिल रहती है।
इसके दो छोर हैं : पहला, जहां वह हर मुमकिन अर्थ को घेरे रहती है, दूसरा, जहां वह भाषा को कोई अर्थ देने से ही मना कर देती है। कविता अवर्णनीय होती है, अबोधगम्य नहीं। कविता को पढ़ना, आंखों से सुनना है। इसे सुनना, कानों से देखना। हर पाठक एक अन्य कवि है। हर कविता एक इतर कविता। कविता पढ़ने वाले को उकसाए। उसे खुद को सुनने के लिए बाध्य करे। एक लेखक की नैतिकता उसके उन विषयों और तर्कों में नहीं होती, जिसके सहारे वह अपनी बात कहता है, बल्कि भाषा के साथ उसके बर्ताव में निहित होती है।
कोई कवि नहीं हो सकता, यदि उसमें दी गई भाषा को नष्ट करने और एक नई भाषा गढ़ने का प्रलोभन न हो। कविता में निपुणता, नैतिकता का दूसरा नाम है। यह निरे शब्द-चातुर्य से नहीं, लालसा और तपश्चर्या से आती है। एक सच्चा कवि खुद से बातें करते हुए भी दूसरों से मुखातिब रहता है। एक कोरा या विराम-चिह्नों से अटा सफा बिन चिड़िया का पिंजरा है। एक सच्ची खुली रचना दरवाजे बंद करती है।
पाठक इसे खोल कर, उस चिड़िया, यानी कविता को उसका आकाश देता है। एक कविता की अमरता में यकीन, भाषा की अमरता में यकीन करने जैसा होगा। ऐसे यकीन से बेहतर यह होगा कि हम साक्ष्यों से सीख लें। साक्ष्य कहता है कि भाषाएं बनती और बिला जाती हैं। हर अर्थ एक दिन निरर्थ हो जाएगा।
-मैक्सिको के नोबेलजयी कवि