किसी नियम की तरह मैं कविता पढ़ने और लिखने का काम बिस्तर में करता हूं। दर्शनशास्त्र और गंभीर निबंधों को अपनी मेज पर पढ़ता हूं। सोफा या दीवान पर लेटकर उपन्यास पढ़ता हूं। इतिहास पढ़ने के लिए कोई अच्छी-सी जगह खोजना सबसे मुश्किल काम है, क्योंकि इतिहास पढ़ना वास्तव में अन्याय और अत्याचार की कहानियां पढ़ना है।
उसे कहीं भी पढ़ा जाए, पढ़ते समय, खुद के खुशकिस्मत होने पर हमेशा लज्जा का अनुभव होता है। कॉमेडी पढ़ने के साथ भी यही मसला है। ऐसी जगह और परिस्थतियां खोजना कभी आसान नहीं होता, जहां आप खुलकर हंस सकें।
मैं कहीं भी बैठकर पढ़ूं, कुछ भी पढ़ूं, मुझे एक पेंसिल की दरकार होती है, कलम की नहीं। ताकि मैं शब्दों के ज्यादा करीब पहुंच सकूं और सुगठित वाक्यों, सुंदर या मूर्खतापूर्ण विचारों, दिलचस्प सूचनाओं और शब्दों को रेखांकित कर सकूं। किसी सार्वजनिक पुस्तकालय में इतिहास की किसी किताब पर रेखांकित पंक्तियां या हाशिये पर लिखी टिप्पणियां देख लूं, तो मुझे अच्छा लगता है।
वहां पुस्तकों पर ऐसे लिखना प्रतिबंधित होता है, लेकिन इससे पता चलता है कि उस पाठक को लेखक से कोई शिकायत थी और वह उसे ज़ाहिर करने से खुद को रोक नहीं पाया। या पिछले हजार बरसों में सभ्यता जिन दिशाओं की ओर मुड़ गई है, उससे उसे शिकायत है।
वितोल्द गोम्ब्रोविच ने कहीं कहा है कि हम किसी महान उद्देश्य के लिए नहीं लिखते, बल्कि अपना होना जताने के लिए लिखते हैं। यह सिर्फ कवियों और उपन्यासकारों के लिए ही सच नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है, जो किताब के पन्नों पर कुछ लिख देता है।
-मशहूर सर्बियाई-अमेरिकी कवि