लेखन एक निजी प्रक्रिया है, भले चाहे इसकी निजी गांठ भी पूर्व और वर्तमान के समाजों से जुड़ी होती है...इसलिए इसके नतीजे लेखक को अकेले ही भुगतने होते हैं। देर-सबेर यदि इससे कुछ पहचान या सहानुभूति मिलती है, तो यह इसकी ऊपर की कमाई है, जो कभी लेखक की बुनियाद में शामिल नहीं हो सकती है। क्या साहित्य से समाज या सत्ता बदल सकती है? नहीं, ऐसा कभी नहीं हुआ है, मगर फिर भी साहित्य की अपनी अहमियत है, क्योंकि यह एक संभावना को तो बचाकर फिर भी रखता है।
कोई इंसान यदि वक्त के त्रिखंड-अतीत, वर्तमान और भविष्य-से अपने को मुक्त नहीं कर सके, तो इसे किस तरह देखा या समझा जाए? खुदा की नेमत या उसकी तोहमत? क्रांति के दौर में जब डच सरकार ने मुझे बुकितदुरी जेल में कैद रखा था, तब मैंने एक नीग्रो भक्ति-गीत याद कर लिया था, जिसका मुखड़ा कुछ यों था-'कहीं न कहीं एक नखलिस्तान है', जो आदमी के अंदर भविष्य की उम्मीद का अक्स जगाता है।
उम्मीद का आसरा हो, विगत का सहारा हो, तो इंसान के कदम उस नखलिस्तान की चाहत में मेहनत करने के लिए आगे बढ़ने लगते हैं। मगर उस मुकाम को हासिल करने का कोई ठिकाना तो है नहीं, इसलिए उस गीत का अगला बोल था-'और वह बस एक इबादत भर दूर है।' कोई अगर उसे शांति से, दीन-दुनिया की चिल्लपों से दूर रहकर सुने, वह बड़ा खूबसूरत गीत है।
मगर कहां है यह नखलिस्तान? लोगों के मन में शुरू से ही यह मंत्र फूंक दिया जाता है कि सुख एक मंजिल है, जहां तक उन्हें पहुंचना ही है। कितनी आसानी से इस यकीन को हम सच मान बैठते हैं, जबकि मुमकिन है, वह मरीचिका भर हो। स्कूली दिनों की सीख अब बड़ी पाखंडी रवायत लगती है। हकीकत और उम्मीद के बीच कोई यथास्थिति नहीं है।
-दिवंगत इंडोनेशियाई लेखक