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अंतर्ध्वनि : किताब खत्म करने के बाद खालीपन की अनुभूति होती है

Mon, 29 Jul 2019 02:55 AM IST
Avdhesh Kumar पैट्रिक मोदियानो
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
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मैं उस पीढ़ी का हूं, जिसमें बच्चों को देखा जाता था, सुना नहीं जाता था। सुना खास मौकों पर ही जाता था, वह भी पहले से अनुमति मिले होने पर। लेकिन उन्हें कोई नहीं सुनता था और लोग उनके बोलने पर भी खुद ही बोलते भी रहते थे। शायद यही कारण है कि बचपन समाप्त होते-होते मुझमें लिखने की इच्छा जाग गई। इस उम्मीद में कि आप जो लिख रहे हैं, उसे बड़े लोग पढ़ेंगे। 
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तब वे बिना बीच में काटे आपकी बात पूरी तरह सुनेंगे और उन्हें पता चलेगा कि आपके सीने के भीतर भी कुछ चलता है। लेखन एक अजीब और एकांतिक क्रिया है। जब आप अपने उपन्यास के शुरुआती कुछ पन्ने लिखने बैठते हैं, तब निराश कर देने वाले कई मौके आते हैं। हर रोज आपको बारहा यह लगता है कि आप गलत राह पर बढ़ चले हैं। 

जब आपकी किताब पूरी होने वाली होती है, तब आपको महसूस होता है कि उसने खुद को आपसे दूर करना शुरू कर दिया है, और अब वह खुली हवा में आज़ाद सांस लेने लगी है। इस क्षण के बाद से वह खुद को अपने पाठकों के जरिये खोजेगी। जब ऐसा होता है, आप खालीपन की एक अनुभूति से भर जाते हैं, ऐसा लगता है, जैसे आप परित्यक्त हों, आप छोड़े जा चुके हैं। एक खास तरह की निराशा भी होती है, क्योंकि आपने बहुत धीरे-धीरे किताब के साथ रिश्ता बनाया था और वह एक झटके में उसे तोड़ गई।
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पाठक किसी किताब के बारे में लेखक से ज्यादा जानता है। लेकिन लेखक और उसके पाठक के बीच ऐसा मधुर सामंजस्य विकसित हो सके, इसके लिए जरूरी है कि पाठक पर जरूरत से ज्यादा जोर न दिया जाए। पाठक को अनायास ही अपनी तरफ करने के लिए जरूरी है कि किताब के भीतर इतनी जगह छोड़ी जाए, जिसमें वह रफ्ता-रफ्ता पैठ सके और इस जगह छोड़ने में कलात्मकता हो।
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-नोबेलजयी फ्रांसिसी लेखक
 
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