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अंतर्ध्वनि : खंडहरों में होने से हमारा समय-बोध गड़बड़ा जाता है

Thu, 11 Jul 2019 05:53 AM IST
Avdhesh Kumar वी. एस नायपॉल
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सांकेतिक तस्वीर
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हम वास्तव में केवल उस झूठ के लिए दंडित होते हैं, जिसे हम स्वयं बताते हैं। कुछ भावनाएं वर्षों की दूरी खत्म कर देती हैं और असंभव स्थानों को जोड़ देती हैं। जो सरकार अपने कानून तोड़ देती है, वह आपको भी आसानी से तोड़ सकती है। अगर किसी लेखक को सब पता हो, जो होने जा रहा है, तो उसकी पुस्तक उसके शुरू करने से पहले ही मर जाएगी। मैं जानता था कि मुझे कहां जाना है। 
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मैंने सही दरवाजा खटखटाया। खंडहरों में होने से हमारा समय-बोध गड़बड़ा जाता है। मैं अपनी किताबों का निचोड़ हूं। मेरे बारे में जो कुछ भी मायने रखता है, सब मेरी किताबों में है। लेखकों को लोगों को असहमति के लिए उकसाना चाहिए। हमें हमेशा स्थिति की सच्चाई देखने की कोशिश करनी चाहिए, इससे हम चीजों को सार्वभौमिक बना सकते हैं। अगर लेखक बैठकर बस दमन के बारे में बात करते रहेंगे, तो वे ज्यादा लिख नहीं पाएंगे। 

जिस सभ्यता ने दुनिया भर पर कब्जा किया हो, उसे मरती हुई सभ्यता नहीं कहा जा सकता। एक लेखक की जीवनी में—या यहां तक कि उसकी आत्मकथा में भी—हमेशा अपूर्णता रहेगी। बदलाव के लिए आपको अपने अतीत को, अपने इतिहास को नष्ट करना होगा। आपको कहना होगा कि आपकी पैतृक संस्कृति नहीं है, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जब मैं लिख रहा होता हूं, तो यह आश्चर्य का विषय होता है कि मैं क्या खोज रहा हूं। 
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मैं जो कर रहा हूं, उसके साथ न्याय करने का यह मेरा तरीका है, जो कभी आसान काम नहीं रहा है। कुछ लेखक सिर्फ बचपन के अनुभव के बारे में लिखते हैं, क्योंकि यह पूर्ण हो चुका होता है। लेकिन कुछ अन्य तरह के लेखक के लिए जीवन आगे बढ़ता रहता है। विषयों की तलाश के लिए मैंने अपने अंतर्ज्ञान पर भरोसा किया है। शुरुआत में मेरे पास एक विचार, एक स्वरूप होता है, लेकिन कुछ वर्षों बाद ही मैं समझ पाता हूं कि मैंने क्या लिखा है।
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-भारतीय मूल के नोबेलजयी लेखक
 
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