मैंने हमेशा कहा है कि मैं बहुत ज्यादा भावुक नहीं हूं। जब कोई चीज मुझे प्रभावित करती है, तो मैं केवल वहां से हट जाती हूं। मैं बिल्कुल नहीं रोती। इसका मतलब यह नहीं है कि मैं उन लोगों से ज्यादा मजबूत हूं, जिनकी आंखें आंसुओं से भरी होती हैं। मैं कमजोर हूं, वे साहसी हैं। भावुक होना साहस का काम है।
मैं थोड़ी कायर हूं। अंतर बस इतना है कि मैं अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं रोने के लिए करती हूं। जब मैं भावनात्मक होती हूं, तो उस हिस्से को पकड़ती हूं, जो दुखद है और उसे एक कहानी में बांधती हूं, जिसमें रुदन नहीं होता, जो घर से बाहर रहने की उदासी पर केंद्रित नहीं होती। कुछ लोग लंबे समय तक अपने घर से बाहर रहने के दुख को रोते-गाते रहते हैं, लेकिन उसका कोई फायदा नहीं है। दुख लोगों के जीवन में सुधार नहीं ला सकता है।
कुछ लोग कहते हैं कि समय के साथ घर से बाहर रहने का दुख कम होता जाता है और वे केवल उपभोक्ता बनकर रह जाते हैं, क्योंकि तब उनका ध्यान पूरी तरह से घर पर केंद्रित नहीं होता है। मैं ऐसा ही मानती हूं। मृत्यु से मुकाबला करने के लिए जिंदगी की ज्यादा जरूरत होती है। यही एक चीज है, जो पृथ्वी पर खत्म नहीं हुई है।
लेखन इसलिए महत्वपूर्ण है, कि जो बात आप कह नहीं सकते, उसे लिख सकते हैं। लेखन एक मौन कर्म है, सिर और हाथ का श्रम है। साहित्य में सभी कुछ, यहां तक कि स्मृति भी पुरानी होती है। मैंने जो भी लिखा है, वह अपने लिए लिखा है, अपने साथ की चीजों को स्पष्ट करने के लिए, क्या हो रहा है, उसे आंतरिक स्तर पर समझने के लिए।
-रोमानिया में जन्मी जर्मन उपन्यासकार