वास्तविक और काल्पनिक के बीच बहुत ज्यादा अंतर नहीं है और न ही सच और झूठ के बीच है। कोई भी चीज जरूरी नहीं कि या तो सच हो या झूठ हो, यह झूठ और सच, दोनों हो सकती है। मेरा मानना है कि मेरा यह दावा कला के माध्यम से वास्तविकता की खोज पर भी लागू होता है।
इसलिए एक लेखक के नाते मैं इसके साथ खड़ा हो सकता हूं, लेकिन एक नागरिक के रूप में नहीं। एक नागरिक के रूप में मुझे यह अवश्य पूछना चाहिए कि सच क्या और झूठ क्या? नाटक में सत्य हमेशा के लिए छिपा होता है। आप इसे कभी नहीं पाते हैं, लेकिन इसकी खोज हमेशा बाध्यकारी है।
इसकी खोज स्पष्ट रूप से प्रयास को प्रेरित करती है। खोजना आपका काम है। अक्सर आप अंधेरे में सच से चोट नहीं खाते हैं, इसके साथ टकराते हैं या एक छवि की झलक मिलती है, जो सच के अनुरूप लगती है।
लेकिन असली सच्चाई यह है कि नाटकीय कला में एक सच जैसी कोई चीज कभी नहीं होती है। नाटक में कई सच होते हैं, वे सच एक-दूसरे को चुनौती देते हैं, एक-दूसरे से टकराते हैं, एक-दूसरे को प्रतिबिंबित करते हैं, एक-दूसरे की अनदेखी करते हैं और एक-दूसरे के प्रति अंधे होते हैं। कभी-कभी आपको लगता है कि आपके हाथ में सच है, लेकिन यह उंगलियों से फिसलकर खो जाता है।
मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि मेरे नाटक कैसे आते हैं। लेकिन मैं कुछ कह नहीं सकता। न ही मैं अपने नाटक के बारे में संक्षिप्त विवरण दे सकता हूं, सिवाय इसके कि क्या हुआ। मेरे अधिकांश नाटक एक रेखा, एक शब्द या एक छवि से पैदा होते हैं। दिए हुए शब्द अक्सर तुरंत छवि का अनुकरण करते हैं।
-नोबेलजयी ब्रिटिश नाटककार