मैं मानसा जिले के पिठो गांव में पैदा हुआ। मेरे पिता सेना में थे, पर साहित्य से उन्हें बेहद लगाव था। हमारे घर में किताबों का अच्छा संग्रह था, जिसमें प्राचीन पंजाबी कविताएं और गद्य साहित्य काफी था। पिताजी प्रसिद्ध पंजाबी पत्रिकाएं भी डाक से मंगवाया करते थे। इस तरह मेरा बचपन किताबों और पत्रिकाओं के बीच बीता। जल्दी ही मैं कविताएं लिखने लगा। मेरी पहली कविता प्रीतलड़ी में छपी, जिस पर मुझे बेहद खुशी मिली।
हालांकि बाद में समाज की सच्चाई सामने लाने के लिए कहानी मुझे ज्यादा प्रभावी माध्यम लगी और मैं इसी क्षेत्र में हाथ आजमाने लगा। सोवियत दूतावास में संपादक के तौर पर काम करते हुए मुझे विश्व साहित्य से परिचित होने का मौका मिला। खासकर मैंने रूसी साहित्य का व्यापक अध्ययन किया, जिससे मैं खुद को एक कहानीकार के तौर पर बेहतर ढंग से तराश सका। दो साल तक पंजाबी ट्रिब्यून का संपादक रहने के दौरान मैंने पत्रकारीय लेखन में साहित्य को जोड़ा, जिसकी पाठकों ने तारीफ की।
मैंने आलोचना की एक किताब लिखने के अलावा बच्चों के लिए किताबें लिखी हैं, और हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और रूसी भाषा के साहित्य का पंजाबी में अनुवाद भी किया है, लेकिन मूल रूप से मैं कहानीकार हूं। मैंने ग्रामीण पंजाब की अच्छाइयों के साथ बुराइयां भी देखी हैं, तथा शहरों में बूर्जुआ श्रेणी के अस्तित्व से भी बखूबी परिचित रहा हूं। मेरी कहानियों में ये तमाम चीजें हैं। मेरा मानना है कि लेखक को मानववादी होना चाहिए। एम एम कलबुर्गी की हत्या के बाद मैंने भी अपना पुरस्कार लौटाया। अगर कोई लेखक अपनी कृतियों में बुनियादी सवाल नहीं उठाता और मानवीय पक्षों को सामने नहीं रखता, तो वह लेखक नहीं है।
-पंजाबी के चर्चित लेखक।