एक दिन मुझे कांच के तीन टुकड़े दिखे, जो मैं कहीं से उठा लाया था। मुझे इन कांच के टुकड़ों का रंग बहुत अच्छा लगता था। जब मैं उनमें से देखता, तो एक जादुई संसार मेरे सामने आ जाता। मुझे कांच के टुकड़ों के उन रंगों में रंगा सब कुछ देखकर बहुत अच्छा लगता।
पेड़, फूल, माली, उसकी पगड़ी, कमीज, बाल्टी, सब कुछ हरा दिखता। फिर मैं इस सारे दृश्य को लाल वाले कांच से देखता, सब कुछ लाल हो जाता- भट्टी की तरह चमकीला। फिर मैं इस सारे दृश्य को भुतहा, ठंडी रहस्यमय चांदनी में नहाया हुआ देखता। यह कांच के गहरे नीले टुकड़े का कमाल था। बगीचे की दीवार पर बैठा मैं दृश्यों के रंग बदलता रहता।
एक बार जब मैं ऐसा करके रोमांचित हो रहा था, तो वहां से गुजरते एक बूढ़े व्यक्ति ने कहा था, बचपन स्वर्गिक होता है बेटे, स्वर्गिक। यह सब करने के बाद भी मेरे पास और बहुत कुछ करने के लिए वक्त बचा रहता था। मैं पिता के कमरे में जाकर उनकी चीजें देखा करता। बहुत सारे चश्मे।
एक कोने में कम-से-कम एक दर्जन छड़ियां रखी थीं- मलक्का छड़ियां, आबनूस की छड़ियां, हाथी के दांत के हैंडल वाली, चांदी की मूठ वाली। मुझे ज्यादा आकर्षित करता था पिता के बिस्तर के पास वाला मेज, जिस पर ढेरों विदेशी पत्रिकाएं पड़ी रहतीं। इन्हें लेकर मैं फर्श पर बैठ जाता और एक-एक करके उनके पन्ने पलटता रहता।
इनके श्वेत-श्याम चित्रों में मैं खो जाता। मैं कार्टूनों के साथ लिखे चुटकुले नहीं पढ़ पाता था, पर घंटों उन कार्टूनों को देखता रहता, और उनकी गुणवत्ता के बारे में सोचता रहता। इस प्रक्रिया से मुझमें परिहास की दिव्य समझ का विकास हुआ। मनुष्य के शरीर की समझ विकसित हुई।
अनजाने में ही मैं परिप्रेक्ष्य के मूलतत्व भी जैसे समझने लगा था। एक दिन पंच का एक कार्टून मुझे इतना पसंद आया कि मैं कागज पेंसिल लेकर उसकी नकल करने बैठ गया। मैंने शुरू ही किया था कि मेरा एक भाई उधर से गुजरा। उसने रुककर मुझे देखा और कहा, नकल? कभी नहीं। आसपास देखो, समझो और ड्रॉइंग करो! नकल करके तुम कभी आर्टिस्ट नहीं बन सकते। यह किसी दूसरे की प्लेट से खाने जैसा होता है।
मशहूर कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण की आत्मकथा का यह अंश जीवन के अहम सूत्र बताता है कि नकल करके कोई महान नहीं बनता।