बहुत छोटी उम्र से ही मैं अपने गांव के प्राकृतिक सौंदर्य और समृद्ध इतिहास पर मुग्ध था। मेरे गांव में आज भी ऐसे लोग मिल जाएंगे, जो गांव से जुड़ी पुरानी स्मृतियों के बारे में बता सकते हैं। हालांकि मेरे गांव से जुड़ी कठोर सच्चाइयां भी हैं। जैसे, मेरे परिवार के लोग लोहार हैं।
घटप्रभा नदी मेरे ही गांव के पास से मुड़ती है। मूसलाधार बारिश के दिनों में अपराधी हत्या कर लाशें मेरे ही गांव के पास नदी में फेंक जाते थे, जिससे वे बहकर काफी दूर निकल जाती थीं। हत्या की जानकारी मिलते ही गांव के लोग फुसफुसाकर बात करते।
मैं सुबह इस सनसनी तथा भय पर एक कहानी लिखता, और शाम को पाता कि मेरा कोई दोस्त हूबहू मुझे वही कहानी सुना रहा है! नाटकों से मुझे इतना लगाव हुआ कि स्कूल जाने से पहले जब मैं साथियों के साथ मवेशियों को चराने जंगल जाता था, तो वहां घंटों अभिनय करता था।
मेरे पिता स्वतंत्रता सेनानी थे। वह गांधी जी को चिट्ठियां लिखा करते थेे। मैं जब उच्च शिक्षा के लिए बेलगाम गया, तो वहां पहली बार ब्रिटिश अधिकारियों को देखकर मुझे डर लगा। अंग्रेजों से मुझे नफरत हो गई, क्योंकि उन्होंने स्मृति और सामूहिकता की हमारी परंपरा को ध्वस्त कर दिया था।
मेरे लिए साहित्य का मतलब लोक है। अपने गांव की स्मृतियों और परंपराओं पर मैंने एक लोकगाथा काव्य लिखा था, जिसकी तारीफ राममनोहर लोहिया ने की थी। इसी तरह शिवा’स ड्रम में मैंने अपने गांव शिवपुरा की कहानी लिखी है, जहां का पानी दूषित हो चुका है और किसानों की जमीन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास जा रही है।