मैं पत्थर पर उकेरी गई ऐसी मूर्ति हूं, जो कहीं-कहीं अनगढ़ छूट गई हो, ऐसी कि बुरा लगे। मुझ में कहीं एक आंच की कसर रह गई है। अपने भीतरवाली वह 'कहीं' मैं अब जानने लगा हूं और वहीं जूझ भी रहा हूं। इसकी तस्वीर तो जीवन पूरा होने पर ही पूरी हो सकती है। लिहाजा हार-जीत के परिणाम की बात नहीं जानता। अब पश्चाताप वाला प्रारंभिक वर्षों का स्वभाव भी बदल चुका है। मैं उस चींटी की तरह हूं, जो बार-बार गिरने के बावजूद चढ़ती है।
हार-जीत की बाजी प्राणों को उमंग देकर लड़ाती तो है, पर हार अब उतना निराश नहीं करती। फल की आशा से स्फूर्ति में भर-भरकर जान लड़ा-लड़ाकर काम किया, स्वप्न देखे। जब मेरी आशा फलवती न हुई, तो कुंठित होता था। बरसों यह राग रहा। इसके ऊफान के बाद फिर जब किए हुए काम पर नजर जाती, तो संतोष मिलता था। काम न करूं, तो जियूं कैसे? इसलिए शांत हूं, अपनी मौज में फल की ओर से लापरवाह हो चला हूं। लिखने-पढने के समय तो बात ही न्यारी है। कमोबेश हर काम में अपना प्राण लगाने का अब अभ्यस्त हो गया हूं। उसी की मस्ती है। इस मस्तीजनक शांति रस को यदि रंग दूं, तो चांदनी-भरे आकाश जैसा दूंगा।
मैं अब यह जानने लगा हूं कि प्रकृति को पहचानकर उसके अनुसार ढल जाना ही प्रकृति पर विजय पाना है। मुझमें महत्वाकांक्षाओं की लाली भी चमकती है, पर धन कमाने की महत्वाकांक्षा नहीं। यश और आदर का सदा से भूखा रहा। सच पूछो तो बस एक ही साध है, लिखते-लिखते कोई ऐसी चीज कलम से निकल जाए कि मैं सदा के लिए इंसान के दिल में जगह पा लूं। इस लगन का रंग गुलाबी या हल्का लाल नहीं, बल्कि गहरा लाल है-खून का रंग।
-हिंदी के प्रख्यात दिवंगत साहित्यकार