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अंतर्ध्वनि : लेखन जीवित रहने के लिए किया जानेवाला एक जरूरी कर्म है

Wed, 21 Aug 2019 12:15 AM IST
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मेरी यह कोशिश रहती है कि अपने गद्य में इतनी जगहें छोड़ता चलूं, जिसमें पाठक का वास हो। जब मैं लिखता हूं, मेरे दिमाग में कहानी सर्वोपरि रहती है, और मुझे लगता है इस पर किसी और को वरीयता नहीं दी जानी चाहिए। इसके लिए सबकुछ तज देना चाहिए : अत्यंत मनोरम और उत्सुकता से भर देनेवाले उन तमाम हिस्सों को भी, अगर वे, जो मैं कहना चाहता हूं, उसके साथ एक प्रासंगिक जुड़ाव नहीं रखते। इतनी निर्ममता जरूरी है। 
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खासकर तब, जब आप एक कहानी कह रहे हों और उम्मीद करते हों कि लोग आपको सुनें। इसमें छटांक भर विचलन भी लोगों के मन में बोरियत पैदा कर सकता है। अंततः आप वही किताब नहीं लिखते, जिसे लिखने की जरूरत आपने महसूस की थी, आप वह किताब भी लिखना चाहेंगे, जिसे आप खुद पढ़ना पसंद करें। मैं जब यह सोचता हूं कि मैं क्यों लिखता हूं, तो मुझे अचरज होता है। 

लिखते हुए न तो मैं कोई सुंदर वस्तु बना रहा होता हूं और न मनोरंजक कहानियां गढ़ने की ही मेरी मंशा होती है। फिर? मुझे दरअसल यह शिद्दत से महसूस होता है कि लेखन जीवित रहने के लिए किया जानेवाला एक जरूरी कर्म है। एक ऐसा काम, जिसे न करूं, तो मुझे अपना अस्ति-बोध भयावह लगने लगता है। 
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मेरे लिए लिखना हमेशा सुखकर नहीं रहा है। पर यह न लिख पाने की पीड़ा से हमेशा बेहतर रहा है। जिन जीवनानुभवों से गुजरा हूं, उन्हें दर्ज कर मैं उनके प्रति एक नैतिक आभार प्रकट करता हूं। मैं अपनी जी हुई दुनिया पर ज्यादा यकीन करता हूं, बनिस्बत मुझे बताई गई दुनिया के।...इस तरह हर लेखक अपने लेखन में जीवनानुभवों को कमोबेश शामिल करता है और हर उपन्यास आत्मकथात्मक जान पड़ता है। पर इसमें लुत्फ कल्पना द्वारा यथार्थ में सुराख करने से पैदा होता है, यथार्थ को ज्यों का त्यों परोसने से नहीं।
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-बहुचर्चित अमेरिकी कवि-कथाकार
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