अपने पिता की एक झलक-मात्र मेरी आंखों में है। मंदिर से आकर ब्राह्मण-वेश में किसी ने मेरे मुंह में एक आचमनी गंगाजल डाल दिया, जिसमें बताशे घुले हुए थे। मैं मां की गोद में था। उसने बतलाया, चरणामृत है बेटे! कितना मीठा! मैंने अपने पिता को बुरी तरह बीमार देखा, घर में चारों ओर निराशा! पिता का मरना... आई का पछाड़ खा-खाकर रोना मुझे याद है। यद्यपि तब मैं बहुत छोटा, रोगीला, बेदम-जैसा बालक था। जब मेरे पिता का देहांत हुआ, मैं महज दो साल और छह महीनों का था। यानी मैंने जरा ही आंखें खोलकर दुनिया को देखा, तो मेरा कोई सरपरस्त नहीं! प्रायः जन्मजात अनाथ, ऐसा जिस पर किसी का भी वरदहस्त नहीं रहा।
चाची मेरी आई से तो कसकर झगड़ती थीं, लेकिन मुझे उनका वात्सल्य प्राप्त था। पाते ही प्यार से, पुचकार से वह मुझे कुछ-न-कुछ खाने को देतीं। लेकिन इसका पता लगते ही मेरी आई मुझे लिटाकर, देवरानी को दिखा-दिखा, सुना-सुनाकर धमार की धुन में धमकती थीं।
क्रोध माता करे या पिता, पति करे या पत्नी, बालक करे या युवा, होता है - पाप का मूल। मेरी आई परम क्रोधनी थीं, साथ ही परम भोली। वह परिश्रमी भी जबरदस्त थीं। हमारे लंबे-चौड़े दरिद्र कच्चे घर को होली-दिवाली पर वह अकेले ही कछाड़ बांधकर पोतती या पीली मिट्टी से दिव्य कर देती थीं। फटे-पुराने कपड़ों की कंथा ऐसी सी देती थीं, जिसे सर्दी के दिनों में वरदान की तरह लोग ओढ़ते-बिछाते थे। कागज गला पल्प बना उसकी भद्दी टोकरियां बना लेती थीं। सीक के पंखे तो खासे बना लेती थीं। ब्याह-गौना, कथा वगैरह में सामयिक गीत गाने वालियों में वह आगे ही रहना चाहती थीं।
-दिवंगत हिंदी साहित्यकार