चिपको आंदोलन के प्रणेता सुंदरलाल बहुगुणा
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मैं प्रकृति की गोद में पला और बड़ा हुआ, प्रकृति से प्रेम होने के कारण पेड़ कटते देखकर रहा नहीं गया। वर्ष 1973 से 1981 तक चिपको आंदोलन चलाया, इस आंदोलन में महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर पेड़ों को बचाने की मुहिम चलाई। आठ वर्षों तक महिलाओं ने आंदोलन के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। चिपको आंदोलन प्रकृति को बचाने के लिए किया गया प्रयास था। यह आंदोलन मेरे परिवार तक ही सीमित नहीं रहा है, गढवाल, कुमायूं, उत्तरकाशी में तो महिलाएं दिलोजान से इसमें जुड़ी थीं।
पारिस्थितिकी मनुष्य और प्रकृति के संबंधों का शास्त्र है। मनुष्य और प्रकृति का संबंध मां-बेटे जैसा है, लेकिन जब हम आर्थिक लाभ के लिए जंगल का दोहन करते हैं, तो थोड़े समय के लिए जरूर लाभ दिखता है, पर हमेशा के लिए विनाश होता है। आज भी पृथ्वी प्राकृतिक संसाधनों पर ही टिकी हुई है। जल, जंगल, जमीन मनुष्य के लिए जीवन के आधार हैं, इसकी तुलना पूंजी के साथ करना बेमानी है। हमें अपने अस्तित्व को बचाने के लिए सतत अर्थतंत्र वाले पेड़ों को बचाने की जरूरत है। विकास के नाम पर हो रहे नए प्रयोग से आम इंसान बेहद परेशान है। पश्चिम इस समस्या को भुगत रहा है।
अब वह इस मानव विरोधी विकास को हम सब पर थोप रहा है या हम उनकी राह पर चल पड़े हैं, इस बात को हमें भलीभांति जान लेना चाहिए। वर्तमान दौर में भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण के नाम पर जो विकास की आंधी चली है, यह मनुष्य को खतरनाक मोड़ पर ले जा रही है। आज का विकास प्रकृति के शोषण पर टिका है जिसमें गरीब, आदिवासी को प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल किए जाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। भोगवादी सभ्यता ने हम सभी को बाजार में खड़ा कर दिया है।
- सुंदरलाल बहुगुणा, चिपको आंदोलन के प्रणेता।