यदि आपको पता चले कि जो पत्र अभी आप लिख रहे हैं या प्राप्त कर रहे हैं और आपकी हर बात तथा बाजार में होने वाला हर खर्च कोई अनजान व्यक्ति देख रहा है और उन तमाम विवरणों का किसी विदेशी सुरक्षा एजेंसी द्वारा विश्लेषण कर सामरिक नीतियां बनाई जा रही हैं, तो आपको कैसे लगेगा? गूगल तथा इसके जैसी अन्य अमेरिकी कंपनियां, जो इंटरनेट के क्षेत्र में सक्रिय हैं, देश के करोड़ों लोगों द्वारा उनकी सेवाओं का इस्तेमाल किए जाते समय समस्त जानकारियां अपने अमेरिका स्थित मुख्यालयों में 'पार्क' करती हैं। इन सब पर किसी भी भारतीय एजेंसी अथवा शासन के किसी भी अंग का न कोई अंकुश होता है, न ही इस सामग्री के उपयोग पर वे नजर रख पाते हैं। वर्ष 2013 में अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने यह स्वीकार किया था कि भारत सहित विश्व के अनेक देशों के राष्ट्राध्यक्षों व प्रमुख नेताओं के इंटरनेट डाटा उन्होंने हासिल किए, क्योंकि अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के सामने उनके लिए अन्य कोई भी बात वैधानिक-अवैधानिक मानी ही नहीं जाती।
भारत ने इन तमाम ताकतवर एजेंसियों की दादगीरी खत्म करने के लिए भूस्थानिक विवरण अधिनियम लाने का फैसला किया है, जिसका प्रारूप गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर सार्वजनिक कर दिया गया है। इस पर बहस हो रही है और अनेक सुझाव एवं आलोचनाएं भी प्राप्त हो रही हैं। निश्चित रूप से सरकार इन सबको ध्यान में रखकर विधेयक को अंतिम रूप देगी, परंतु इतना तय है कि भारतीय जानकारियां अवैधानिक रूप से विदेश ले जाने तथा भारतीय कानून की अवज्ञा पर सौ करोड़ रुपये जुर्माना और व्यापार बंद करने का दंड भी दिया जा सकेगा।
ये भारतीय जानकारियां या डाटा हैं क्या? आपके फोन नंबर, उनके माध्यम से आपके पते, आपके कामकाज और खर्च करने के तरीकों का खाका, ई-मेल पर आपको आने वाले पत्र और आपका संपर्क संसार, वीजा या मास्टर कार्ड के जरिये किए जाने वाले व्यय और लिए जाने वाले कर्ज, आपकी व्यक्तिगत जानकारियां, मजबूतियां और दुर्बलताएं-अर्थात आप कुल जमा इस दुनिया में क्या करते, लिखते और सोचते हैं, यह सब इकट्ठा एक थैले में बंद कर दिया जाए, तो उसे आपका संपूर्ण डाटा प्रोफाइल कहा जाएगा। यह उतना ही महत्वपूर्ण और निजी है, जितना आपका शयनकक्ष या स्नानागार। यहां किसी और की दखल आपको या किसी को भी स्वीकार नहीं हो सकती, क्योंकि यह आपकी संपदा है। लेकिन गूगल और याहू जैसी कंपनियां आपके ई-मेल के तमाम डाटा बिना आपकी जानकारी के अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को दे देती हैं।
इस कारण भारत के अत्यंत महत्वपूर्ण नेता, शासक, अधिकारी, कर्मचारी, व्यापारी, बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार, सैन्य अधिकारी क्या करते, सोचते और लिखते हैं, इसका पूरा विश्लेषण उनके डाटा के माध्यम से विदेशी खुफिया एजेंसियां करती हैं और अगले बीस से पच्चीस साल भारतीयों को प्रभावित करने, अपनी नीतियों को लागू करवाने तथा यहां की प्रगति रोकने के षड्यंत्र कार्यान्वित करने की योजनाएं बनाती हैं। मैंने जब राज्यसभा में यह विषय उठाया, तो सभी दलों के सांसदों ने गूगल द्वारा भारतीय कानूनों का उल्लंघन किए जाने पर आपत्ति जताई और अंततः गूगल द्वारा किए जा रहे मैपाथन (सामान्य नागरिकों से अपने प्रदेश के नक्शे मांगने का अभियान) को बंद करना पड़ा तथा गूगल के विरुद्ध भारत सरकार ने एफआईआर दर्ज करवा कर सीबीआई जांच भी बिठाई। यह बहुत बड़ा कदम था और तत्कालीन रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने सदन में मुझसे कहा, तरुण, यू आर वन मैन बटालियन अगेंस्ट गूगल वॉयलेशन्स-तरुण, आप गूगल के अवैधानिक कामों के खिलाफ अकेली फौज हो।
नरेंद्र मोदी सरकार ने इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए सरकारी अधिकारियों द्वारा जीमेल और याहू के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया। अब गृह मंत्रालय द्वारा एक ऐसा कानून लाया जा रहा है, जिसके अंतर्गत इन बड़ी इंटरनेट एजेंसियों के निरंकुश जानकारी संपदा एकत्रीकरण पर कठोर नियंत्रण होगा और उल्लंघन करने वालों को कड़ी सजा दी जाएगी।
भारत की कोई भी संपदा-चाहे वह जानकारी की हो अथवा कोहिनूर जैसी हीरे-जवाहरात की, वह तार्किक ढंग से भारत के पास ही रहनी चाहिए और उसका स्वामित्व तथा नियंत्रण भारतीयों के हाथ में होना चाहिए। पहले के उपनिवेशवादी भारत का कोहिनूर चुराकर ले गए, अब इंटरनेट उपनिवेशवादी जानकारी चुराकर ले जा रहे हैं। यह जानकारी कितनी खतरनाक हो सकती है, इसके दो बड़े उदाहरण 26/11 का मुंबई हमला और हाल ही में हुआ पठानकोट हमला है। डेविड हेडली ने गूगल अर्थ के उपयोग से ही अपनी टीम के साथ कराची से तालमेल करते हुए मुंबई हमले की योजना को मूर्त रूप दिया था और पठानकोट हमले में भी गूगल के डाटा का उपयोग हुआ। गूगल ने अपने पोर्टल पर भारत के बम डिपो, युद्धक विमानों के हैंगर, परमाणु संयंत्रों के भी नामोल्लेख के साथ डाटा प्रसारित किया हुआ है।
आवश्यक है कि भारतीय पोर्टल और इंटरनेट सेवाओं को गूगल के मुकाबले ज्यादा मजबूत किया जाए। भारत ने भुवन नाम का पोर्टल, जो नक्शे और अन्य जानकारियों में गूगल अर्थ का पर्याय कहा जाता है, बनाया है। पर वह बहुत कमजोर और आज के इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के लिए कम लाभकारी है। भारतीय सर्वेक्षण विभाग को गूगल अर्थ के सामने उससे भी बेहतर बनाने का इरादा रखना चाहिए। विदेशी कंपनियों के भरोसे भारत की तथ्य संपदा का दोहन करते रहना दीर्घकालिक दृष्टि से भारतीय सुरक्षा तथा भारतीय नागरिकों की निजी जानकारियों की रक्षा के लि घातक ही नहीं, बल्कि स्पष्टतः शत्रुओं को बिना प्रयास भारत पर आक्रमण करने के लिए आवश्यक जानकारियां मुफ्त में उपलब्ध कराने जैसा है। मोदी सरकार ने भूस्थानिक अधिनियम लाकर इस खतरे को रोकने का जो प्रयास किया है, उसका समर्थन करना चाहिए तथा इसके विरोध में गूगल के जनसंपर्क अभियान के भ्रम में नहीं फंसना चाहिए।
-लेखक भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं