जो समाज कचरे को जलाशयों में विसर्जित करने का आदी हो गया हो, उसे न तो कचरा प्रबंधन की सूझ है, न ही जल के अमृतमय होने का संज्ञान। ‘जल ही जीवन है’ जैसे मुहावरे अब किताबों के काले-सफेद अक्षर भर रह गए हैं। आज के उपभोक्तावादी समाज में इसके कोई मायने नहीं हैं।
सर्वोच्य न्यायालय ने मराठवाड़ा में गहराए सूखे के संकट को देखते हुए क्रिकेट की लोकप्रिय इंडियन प्रीमियर लीग-आइपीएल को वहां से बाहर कराए जाने का निर्देश दिया है। जल अगर जीवन चलाता है, तो खेल समाज को संगठित कर सार्थक दिशा प्रदान करते हैं। जीवन अगर उतार-चढ़ाव भरी अबूझ पहेली है, तो क्रिकेट भी अनंत संभावनाओं का विस्मयी खेल है। जीवन के उतार-चढ़ाव को झेलने-निभाने के लिए क्रिकेट को समझना-देखना कारगर रहता है। जीवन जब कठिनाइयों में उदासीनता देता है, तो क्रिकेट मनोरंजन का उत्सव देता है। क्रिकेट को खेलना, देखना भी जीवन को समझना-झेलना है। दोनों का समन्वय ही समाज को उत्सव और जीवन को आनंद दे सकता है।
सही है कि अगर पड़ोस में आग लगी हो, तो हम भी चैन से नहीं रह सकते। इसलिए मराठवाड़ा में सूखे और अकाल की स्थिति बनी है, तो बाकी देश को इसका संज्ञान लेना ही होगा। मदद का माहौल बनाना चाहिए। लेकिन जैसा कि जलविद अनुपम मिश्र कहते हैं, 'अकाल अकेले नहीं आते। उससे पहले अच्छे कामों का, अच्छे विचारों का भी अकाल आता है।'
देश भर में कुल 3,200 छोटे-बड़े बांध हैं, जिनमें से 1,821 बांध महाराष्ट्र में हैं। इन बांधों का मुख्य प्रयोजन पीने का पानी और सिंचाई है। खेती में मुख्यतः तो गन्ने की पैदावार ही है। हम जानते हैं कि महाराष्ट्र देश में गन्ने का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। गन्ने के लिए सिंचाई जरूरी है। महाराष्ट्र की नदियों पर इतने बांध बांधने का मुख्य कारण गन्ने की सिंचाई है। गन्ना महाराष्ट्र की तमाम चीनी मिलों का पोषक है। कारखानों में चीनी के अलावा शीरा भी निकलता है, जो शराब बनाने के काम आता है। यानी गन्ने की खेती से चीनी और शराब, दोनों बनाई जाती है। महाराष्ट्र में न तो उत्तर भारत की तरह बारिश होती है, न ही दक्षिण भारत की तरह कम गर्मी, कम ठंड का मौसम रहता है। फिर क्यों महाराष्ट्र में ही गन्ने की खेती के लिए अधिक बांध, अधिक चीनी कारखाने और अधिक शराब कारखाने हैं? महाराष्ट्र के मौसम के मुताबिक, खेती को बढ़ावा देने के बजाय बाजार के गणित और व्यापार की मांग पर खेती क्यों होती रही? क्यों महाराष्ट्र में चीनी और शराब के व्यापार के लिए जमीन और जल का दोहन होता रहा? धनकुबेरों के महाराष्ट्र में आज इतने बांध सूखे क्यों हैं और जनता पीने के पानी के लिए तरस क्यों रही है?
महाराष्ट्र में चीनी और शराब के अधिकांश कारखाने वहां के राजनेताओं के ही हैं। इसीलिए गन्ने की पर्याप्त सिंचाई के लिए वहां इतने बांध बनने की योजना पारित होती रही। आज वहां गन्ना उगाने वाले, चीनी और शराब कारखानों के मजदूर, सिंचाई योजनाओं के कारीगर, सभी पानी के लिए तरस रहे हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने चीनी और शराब कारखानों के मालिकों के धन से चलाई जाने वाली आइपीएल क्रिकेट मैच को राज्य से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। महाराष्ट्र की आम जनता तो पीने के पानी के लिए भी, और लोकप्रिय क्रिकेट के लिए भी प्यासी ही रहेगी। वाकई अकाल अकेले नहीं आते।