पहले अफ्रीकी-अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में ओबामा का चुनाव अमेरिकी समाज और राजनीति में ऐतिहासिक माना गया। पर ओबामा के पहले कार्यकाल के शुरुआती चरण में डॉ. मनमोहन सिंह के साथ वैसी गर्मजोशी और समझ का अभाव दिखा, जो जॉर्ज डब्ल्यू बुश के साथ था, जिनके बारे में फरीद जकरिया ने अपनी पुस्तक द पोस्ट अमेरिकन वर्ल्ड में लिखा-अमेरिकी इतिहास में सबसे ज्यादा भारत समर्थक राष्ट्रपति।
अपने चुनाव से पहले और बाद में ओबामा ने बार-बार आलोचना की कि बंगलूरू के लोगों को रोजगार देना अमेरिका के हित में नहीं है। दोनों देशों के बीच व्यापार, जलवायु परिवर्तन, बौद्धिक संपदा अधिकार, भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स को एच 1/ एल वन वीजा, आतंकवाद, रूस, ईरान,श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान के साथ भारत के संबंधों को लेकर गहरे मतभेद थे, जिसके चलते भारत-अमेरिका के रिश्तों में सुस्ती रही। द्विपक्षीय रिश्तों में ठहराव आ गया। भारत भी यह महसूस करता था कि अमेरिका उसकी सुरक्षा और सामरिक चिंताओं के प्रति संवेदनशील नहीं है। हालांकि बाद में ओबामा को अमेरिका के एशिया में शक्ति संतुलन की नीति और चीन की बढ़ती आक्रामकता का मुकाबला करने के लिए भारत के महत्व का एहसास हुआ। भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था के चलते भारत के रक्षा क्षेत्र में व्यापार की बढ़ती संभावनाओं से अमेरिका में रोजगार पैदा हो सकता है।
भारत-अमेरिका रणनीतिक वार्ता उनके पूर्ववर्ती द्वारा जून, 2010 में शुरू की गई थी। हिलेरी क्लिंटन ने भारत को 'एक जरूरी साथी और विश्वसनीय दोस्त' बताया और राष्ट्रपति ओबामा ने विदेश विभाग के स्वागत समारोह में घोषणा की कि अमेरिका और भारत का संबंध '21वीं सदी की निर्णायक साझेदारी में से एक' होगा।
नवंबर, 2010 में अपने पहले भारत दौरे के मौके पर संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए ओबामा ने दोनों देशों की निर्णायक भागीदारी वाला बयान दोहराया और कहा कि अमेरिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन करेगा। उनके दौरे में अमेरिकी कंपनियों ने 10 अरब डॉलर का अनुबंध किया। लेकिन भारत-अमेरिकी रिश्ते को तब गंभीर झटका लगा, जब दिसंबर, 2013 में भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े को गिरफ्तार किया गया। इससे पूरा देश नाराज हो गया।
भारत और अमेरिका के बीच संबंध कभी बेहतर नहीं रहे, लेकिन अब वे बहुआयामी, बहुस्तरीय और परिपक्व हो रहे हैं। दोनों पक्ष अब अपने मतभेदों पर अग्रिम और अभूतपूर्व स्पष्टता के बात कर सकते हैं। हालांकि ओबामा के राष्ट्रपति काल में असैन्य परमाणु करार जैसा कोई बड़ा समझौता नहीं हुआ है, लेकिन उनके और नरेंद्र मोदी के बीच व्यक्तिगत स्तर बेहतर रिश्ते विकसित हुए हैं। ऐसा तालमेल पहले कभी नहीं देखा गया। उन्होंने नई ऊर्जा, गतिशीलता और महत्वाकांक्षी दृष्टि और प्रतिबद्धता की भावना दिखाई, जो भारत-अमेरिका संबंधों के लिए शुभ संकेत है।
वर्ष 2000 में अमेरिका का भारत में रक्षा निर्यात 20 करोड़ डॉलर का था, जो 2014 में बढ़कर 14 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। भारत और अमेरिका क्रेता और विक्रेता के रिश्ते से आगे संयुक्त उत्पादन और सह-विकास के रिश्ते में बंध गए हैं। मोदी की महत्वाकांक्षी परियोजना 'मेक इन इंडिया' (जिसका उद्देश्य आधुनिक, उच्च प्रौद्योगिकी वाला रक्षा उत्पादन उद्योग का निर्माण है) अमेरिकी कंपनियों को सहयोग के नए रास्ते प्रदान करता है। अमेरिका ने किसी अन्य देश की तुलना में भारत के साथ ज्यादा सैन्य अभ्यास किया है। दोनों राष्ट्रों के बीच बढ़ते विश्वास का पता इसी से चलता है कि हमारे प्रधानमंत्री मोदी और ओबामा तथा दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच सुरक्षित हॉटलाइन स्थापित की गई है।
दोनों देशों के बीच वर्ष 2010 में द्विपक्षीय व्यापार 30 अरब डॉलर का था, जो 2015 में बढ़कर 104 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। पांच वर्षों में इसके 500 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना है। भारतीय कंपनियों ने अमेरिका में 11 अरब डॉलर का निवेश किया है, जिससे वहां हजारों रोजगार पैदा हुए, जबकि भारत में अमेरिकी निवेश करीब 28 अरब डॉलर का है। विश्व व्यापार संगठन के व्यापार सुविधा समझौते का श्रेय ओबामा और मोदी को दिया गया। यही बात पेरिस समझौते को लेकर कही जा सकती है; अमेरिका, भारत और चीन के एक साथ आए बिना यह संभव नहीं था। सिलिकन वैली में मोदी के दौरे के बाद एक नया इनोवेशन फोरम बना, जो स्मार्ट सिटी और इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट समते कई क्षेत्रों मे तकनीकी सुविधा उपलब्ध करा सकती है।
एशिया-प्रशांत और हिंद महासागर पर संयुक्त दृष्टिकोण, रक्षा तकनीक एवं व्यापार समझौते, संयुक्त रणनीतिक एवं वाणिज्यिक वार्ता, परमाणु उत्तरदायित्व मुद्दे का समाधान, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता के लिए अमेरिकी समर्थन, आतंकवाद से मुकाबले के लिए बढ़ता सहयोग, हिंद महासागर से होकर वैश्विक व्यापार व वाणिज्य के लिए स्वतंत्र मार्ग, स्वच्छ ऊर्जा और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने में भारत की अहम भूमिका को मान्यता मोदी-ओबामा के रिश्ते को बहुत आगे ले जाते हैं। हालांकि पाकिस्तान को एफ-16 विमान की आपूर्ति का अमेरिका का फैसला, अफगानिस्तान में अच्छे तालिबान के साथ बातचीत की कोशिश और आतंकी संगठनों पर प्रतिबंध लगाने के लिए पाकिस्तान पर दबाव नहीं डालना-ऐसे मुद्दे हैं, जो भारत के लिए परेशानी का कारण बने हुए हैं। व्यवसाय से संबंधित 16 मुद्दों पर विश्व व्यापार संगठन के दखल की भारत की इच्छा दोनों देशों के मतभेदों को दूर करने के लिए जरूरी हैं।
बहरहाल तमाम ऊंच-नीच के बावजूद ओबामा ने भारत-अमेरिकी रिश्ते को काफी ऊंचाई पर पहुंचाया है। उनके उत्तराधिकारी चाहे जो भी हों, उन्हें भारत के साथ रिश्ते को व्यापक और मजबूत बनाना होगा, जो न सिर्फ तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, बल्कि जहां ताकतवर, महत्वाकांक्षी और दूरदर्शी नेता है।