आजकल देश की नजर उत्तराखंड में हो रहे सांविधानिक/ न्यायिक संकट पर है। सत्ताच्युत और सत्ताकांक्षी नेता अब भी फूलमाला पहनने से नहीं कतरा रहे हैं। आरोप-प्रत्यारोपों के बीच लगता है, उनकी प्राथमिकता आग और धुएं से घिरा उत्तराखंड नहीं है, वर्ना वे अपने क्षेत्रों में होते। न उन्हें आधे साल से अधिक समय का सूखा और अवर्षण दिखा। देहरादून की नौकरशाही और जिला मुख्यालयों के अधिकारी भी ठीक से देख-समझ नहीं पा रहे। वर्ना सितंबर, 2015 से लगभग वर्षा और बर्फविहीन वनों में आग तो फरवरी से ही लगनी शुरू हो गई थी, जो मध्य अप्रैल में चुनौती बन गई। फिर एकाएक वन और सामान्य, दोनों प्रशासन सावधान और सक्रिय हो गए। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस तथा सेना को कमान सभालने को कहा गया। एमआइ 17 हेलीकॉप्टर भेजे गए। अग्निशमनकर्मियों की संख्या बढ़ाकर तीन हजार से छह हजार कर दी गई। पर क्या उनको इतनी जल्दी आग बुझाने के साथ ग्रामीणों और अपने को बचाने का कौशल सिखाया जा सकता है? कितने जीव-वनस्पतियां नष्ट हुईं, यह तथ्य नेपथ्य में चला गया है। अभी चिंता है कि बाकी वन कैसे बचें! एक दर्जन से अधिक लोगों की जान चली गई है।
बयान आ रहे हैं, लेकिन वास्तविकता का भान किसी को नहीं है, क्योंकि सूचना देने वाला तंत्र एक ही है। जब इसरो ने अपने चित्रों में सुलगता उत्तराखंड ही नहीं, हिमाचल भी दिखाया, तो वन विभाग की पोल खुल गई। जब कहा जा रहा था कि दो दिन में आग नियंत्रण में आ जाएगी (सिर्फ अच्छी वर्षा ऐसा कर सकती है), तो आग 3,000 हेक्टेयर से अधिक वनों को स्वाहा कर चुकी थी और आग लगने की 1,600 से अधिक घटनाएं हो चुकी थीं। आग बांज क्षेत्र में चली गई है। जिम कॉर्बेट तथा राजाजी नेशनल पार्क में घुसी आग सौभाग्य से नियंत्रित हुई है। बिन्सर तथा अस्कोट सेंक्चुयरी में भी आग देखी गई।
एक ही रास्ता कारगर हो सकता है, वह है निवारक रास्ता। हमारे जंगलों में जमीन से आग लगती है, यह कैनोपी फायर नहीं है। अतः नीचे से काम शुरू करें। नवंबर से ही हर जिले में आपदा समितियां काम शुरू कर दें। विभिन्न विभागों का इसमें सहयोग हो। जन प्रतिनिधि, महिला मंगल दल, विद्यार्थी-शिक्षक और एनएसएस तथा एनसीसी के कैडेट इस टीम के अंग हों। अग्नि नियंत्रक रेखा (कम से कम 10 मीटर) बनाकर और उन्हें बार-बार साफ कर आग की आशंका को ही समाप्त किया जाए। सूचना, नक्शों का उपयोग हो और इसरो के साथ राज्य अंतरिक्ष उपयोग केंद्र अधिक सघन सूचना दे। सरकार, समाज, ज्ञान और विज्ञान मिलकर आग को नियंत्रित कर सकते हैं। एक जागृत समाज और कर्मठ प्रशासन ही ज्ञान-विज्ञान का उपयोग कर पाता है। चीड़ के पिरूल को अधिक से अधिक हटाकर ‘अवनि’ संस्था की तरह उससे बिजली तथा ईंधन बनाया जाए। चौड़ी पत्ती के वनों का विस्तार हो। उनमें वर्षा का पानी रोकने को जल तलाइयां बनें। चीड़ की उपयोगिता भी समझी जाए। मकान बनाने, मुर्दा जलाने से लेकर उद्योगों तक में चीड़ का उपयोग हो रहा है। चीड़ का इस्तेमाल करें, लेकिन उसे उसके मूल क्षेत्र में रहने दें। वह आग के बाद भी उग आएगा। कठिन है चौड़ी पत्ती के वनों का विस्तार। उसे इस अभियान का हिस्सा बनाएं।
मौसम में बदलाव वैश्विक घटना है, पर हिमालय में मौसम की विविधता बची हुई है। तवांग (अरुणाचल) में भूस्खलन; नेपाल, उत्तराखंड और हिमाचल के जंगलों में आग और कश्मीर के कुछ हिस्सों में बर्फबारी हो रही है। इसलिए जरूरत आपदा, आग या सूखे के आगमन से पहले ही पूरी रणनीति के साथ तैयार रहने की है। इसमें हम विफल हुए हैं। पिछली सदी में कितनी ही बार जंगलों में आग लगी। औपनिवेशिक काल में जंगल सत्याग्रह के समय ग्रामीणों ने बांज के जंगलों की आग बुझाई। 1995 के बाद 2005, 2009, 2012 तथा 2014 में भी आग लगी। 2013 की महाआपदा में आग सिमटी। कुछ लोग दो-चार-छह साल में आग का चक्र देखते हैं, पर पिछले दशक में यह कम या ज्यादा हर साल की त्रासदी हो गई है। बताया गया कि 2005 से 2015 के दशक में सिर्फ कुमाऊं क्षेत्र में 5,000 हेक्टेयर से अधिक जंगल स्वाहा हुए थे।
आजकल ग्रामीणों को आग लगाने वाला बताया जा रहा है। ग्रामीणों में अपवाद ही कोई ऐसा कार्य करेगा। जंगलों की आग ग्रामीण सदियों से बुझाते रहे हैं। उनका अस्तित्व इनसे जुड़ा है। विस्थापन होने तथा वनाधिकार न मिलने से उदासी जरूर है। ग्रामीणों ने जंगल बचाने में अपनी जान तक दी है। मई, 2009 में पौड़ी जिले के गगवाड़ा गांव में सरकारी जंगल की आग पंचायती जंगल में आ गई। गांव के बच्चे, महिलाएं और पुरुष आग बुझाने में जुट गए। आग बुझी, पर आठ लोगों की बलि लेकर। तब नेता और प्रशासन उपचुनाव में व्यस्त थे। आग लगाने में जंगल माफिया तथा नकली वृक्षारोपण करने वाले विभाग और सस्थाएं ज्यादा रुचि लेती हैं। आग उनके पाप ढक देती है। जैसे भूस्खलन सार्वजनिक निर्माण विभाग के पाप ढक देता है और बाढ़ बांध निर्माताओं के। जंगल की आग का सबसे बड़ा संचालक लंबा अवर्षण, लगातार सूखा, चीड़ के जंगलों का विस्तार और समय पर नियोजित अग्नि प्रबंध का न होना है। वन नौकरशाही का देहरादून में सिमटना एक और दुर्भाग्य है। उत्तराखंड आग और धुएं से भरा है। कुओं में पानी नहीं है। पर यह कुआं और पानी प्रतीक मात्र हैं। राजनीति, प्रशासन और वन विभाग के कुओं में समझदारी, प्रतिबद्धता, रणनीति और जंगलों के प्रति प्रेम का पानी नहीं है। जिस दिन समाज का कुआं सूखेगा, पहाड़ के जंगल राख हो जाएंगे। हे हमारी सरकार, एमआई 17 समाधान नहीं है। समय पर आग बुझाने की तैयारी और समाज व शासन का संयुक्त मोर्चा ही अकेला रास्ता है। हमने 2013 से नहीं सीखा, 2016 से तो सीखने का जतन करें।
-पीपुल्स एसोसिएशन फॉर हिमालया एरिया रिसर्च के संस्थापक