उत्तर प्रदेश में जहां सपा, बसपा और भाजपा दलितों और पिछड़ों को आधार बनाकर विधानसभा चुनाव के लिए रणनीति बना रही हैं, वहीं कांग्रेस ने अगड़ा कार्ड चलने का फैसला किया है। अगड़े में भी कांग्रेस का ज्यादा फोकस राज्य के 12 फीसदी ब्राह्मण मतदाताओं पर है, जिनके साथ आठ फीसदी राजपूतों को जोड़ पार्टी अपना मजबूत सवर्ण जनाधार बनाना चाहती है। इसके साथ 15 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं को जोड़कर कांग्रेस 38 फीसदी मतदाता वर्ग का ठोस जनाधार तैयार करना चाहती है। कांग्रेस रणनीतिकारों के मुताबिक, भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर उसकी राह आसान कर दी है।
नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार को चुनावी जीत दिला चुके प्रशांत किशोर कांग्रेस के नए रणनीतिकार हैं। उन्हें उत्तर प्रदेश और पंजाब में पार्टी को सत्ता में वापस लाने की जिम्मेदारी राहुल गांधी ने दी है। किशोर मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का मूल जनाधार ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित रहा है। दलित मायावती के साथ एकजुट हैं और मुस्लिम तब तक वापस नहीं आएगा, जब तक कोई एक बड़ी जाति कांग्रेस के साथ नहीं जुड़ती। इसलिए कांग्रेस को सबसे पहले ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ना चाहिए। इसी कड़ी में राजपूतों को भी साथ लाया जाए, क्योंकि 1990 के बाद से ही उत्तर प्रदेश में अगड़ी जातियों का राजनीतिक वर्चस्व हाशिये पर चला गया है। प्रशांत किशोर ने राहुल गांधी को यह भी कहा है कि कांग्रेस ने पिछले सभी विधानसभा चुनावों में पिछड़ों और दलितों को अपना मुद्दा बनाया, पर न दलित साथ आए, न पिछड़े।
प्रशांत किशोर की रणनीति के मुताबिक, कांग्रेस में सबसे बड़ा ब्राह्मण चेहरा मानी जाने जाने वाली शीला दीक्षित और राजपूतों में सबसे कद्दावर नेता संजय सिंह की जोड़ी पार्टी की सवर्ण राजनीति को धार देगी। एक मुस्लिम चेहरा भी आगे किया जाएगा। सोनिया और राहुल गांधी ने प्रशांत किशोर की इस रणनीति को हरी झंडी दे दी है।
कांग्रेस की इस नई रणनीति को लेकर पार्टी के भीतर भी कई तरह के किंतु-परंतु लगाए जा रहे हैं। कुछ नेता आशंका जाहिर कर रहे हैं कि इससे कांग्रेस की दलित-पिछड़ा समर्थक छवि को आघात लगेगा और इसका नुकसान पार्टी को उत्तर प्रदेश के बाहर वहां होगा, जहां दलित और पिछड़े अब भी कांग्रेस के साथ हैं। बेशक कांग्रेस दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक हितैषी छवि को ही अपनी सबसे बड़ी पूंजी मानती रही है।
लेकिन कांग्रेस के एक तबके का यह भी मानना है कि उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जातियों ने हमेशा कांग्रेस के विरोध में मत दिया, जबकि दलित जो कांग्रेस के साथ थे, अब बसपा के साथ गोलबंद हैं। सिर्फ ब्राह्मण ही हैं, जो कभी भाजपा के साथ जाते हैं, तो कभी बसपा के साथ, पर उन्हें वह सम्मान और जगह नहीं मिलती, जो कांग्रेस में मिला करती थी। मुस्लिम भी कांग्रेस के साथ जुड़ना चाहते हैं, पर कांग्रेस के साथ कोई दूसरा जनाधार न होने के कारण वे भी सपा और बसपा के साथ मजबूरी में जाते हैं। इसलिए जब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, तो उसे सवर्ण कार्ड खुलकर खेलना चाहिए। कांग्रेस का यह ब्राह्मण सवर्ण कार्ड एक ऐसी दोधारी तलवार है, जो सही चली, तो दुश्मनों का सफाया करेगी और अगर चूक हुई, तो अपनी गर्दन कटने का जोखिम है।