फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

असम के रास्ते पूर्वोत्तर पर नजर

विज्ञापन
सुबीर भौमिक
विज्ञापन

असम में भाजपा की भारी जीत और पश्चिम बंगाल में तीन सीटों पर उसकी विजय पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की सबसे बड़ी घटना है। असम में भाजपा की जीत की संभावना जताई जा रही थी, लेकिन उसकी जीत का आंकड़ा चकित करने वाला है। साफ है कि वहां हिंदू ध्रुवीकरण की भाजपा की राजनीति-जहां वह असमियों, बंगालियों और हिंदू आदिवासियों को केसरिया झंडे के नीचे लाने में सफल हुई-कारगर हुई है। भाजपा और असम गण परिषद को 2001 में पहली बार एक साथ लाने वाले असम के पूर्व राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल एस के सिन्हा थे। लेकिन तब यह गठबंधन विफल हुआ था, क्योंकि कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों की असुरक्षा का मुद्दा उठाकर जहां भाजपा की रणनीति को बेअसर कर दिया था; वहां 35 फीसदी मतदाता मुस्लिम हैं, वहीं तरुण गोगोई को मजबूत असमी नेता के रूप में पेश कर अगप की भी चलने नहीं दी थी।

विज्ञापन


असम में गोगोई की हैटट्रिक इसी का नतीजा थी, और उग्रवादी आंदोलनों का सफलतापू्र्वक मुकाबला कर कांग्रेस ने अपनी ताकत और बढ़ाई। लेकिन मुस्लिमों के लिए एआईयुडीएफ (ऑल इंडिया युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) के विकल्प के तौर पर उभरने और आईएमडीटी ऐक्ट को खत्म कर देने से अल्पसंख्यक वोटों का विभाजन हुआ, जिसने कांग्रेस को कमजोर किया। इस चुनाव में अल्पसंख्यक वोट जहां कांग्रेस और एआईयुडीएफ में बंटा, वहीं भाजपा हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के अलावा असम गण परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ गठजोड़ कर असम की स्थानीय पहचान को आगे बढ़ाने वाली पार्टी के तौर पर भी उभरी। यानी असम की जनजातीय पहचान भाजपा के साथ मिलकर हिंदू पहचान के रूप में तब्दील हो गई-असम में हिंदू ध्रुवीकरण की अपनी राजनीति में भाजपा जितनी सफल होगी, एआईयुडीएफ भी उतना ही ताकतवर होता जाएगा, क्योंकि अपनी पार्टी और अपना झंडा मानकर मुस्लिम भी इससे उतनी ही मजबूती से जुड़ेंगे।

पर असम में भाजपा की यह सफलता उससे थोड़े संयम की भी मांग करती है। इस सफलता से उत्साहित होकर भाजपा-संघ के कट्टरवादी तत्वों को सीमांत जिलों में मुस्लिमों को निशाने पर लेने से बचना होगा। जो राज्य बांग्लादेश से अपनी सीमा साझा करता है, वहां अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की कोशिश न सिर्फ खतरनाक हो सकती है, बल्कि इससे उस बांग्लादेश के साथ हमारे रिश्ते खराब हो सकते हैं, जो फिलहाल भारत का सबसे वफादार पड़ोसी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी रैलियों में लगातार विकास की बातें की हैं, वैसे में उससे उलट कुछ करना गलत होगा।
विज्ञापन


असम में भाजपा के शानदार प्रदर्शन का एक कारण अपने स्थानीय सहयोगियों का जनाधार खत्म कर देने की उसकी क्षमता भी है। ममता बनर्जी एनडीए से अगर बाहर निकल गई, तो इसका कारण सिर्फ अपने मुस्लिम जनाधार पर उसका असर पड़ने की आशंका ही नहीं थी, बल्कि दीदी बखूबी जानती थीं कि वैसे में पश्चिम बंगाल में भाजपा का प्रसार तृणमूल के सिकुड़ने की कीमत पर होता।

असम में सत्ता मिलने पर उत्साहित भाजपा पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में अपनी सरकार बनाने की कोशिश कर सकती है। उसने अरुणाचल प्रदेश में विवादास्पद तरीके से राष्ट्रपति शासन लगाया ही। मणिपुर पर भी अब भाजपा की नजर हो सकती है, जहां न सिर्फ हिंदुओं की पर्याप्त आबादी है, बल्कि वे लोग ओकराम इबोबी सिंह की नीतियों से नाखुश भी हैं। अनेक भाजपा नेता असम की जीत को पूर्वोत्तर के महत्वपूर्ण राज्यों में उसके नियंत्रण से जोड़कर देख रहे हैं, जो नरेंद्र मोदी की 'ऐक्ट ईस्ट नीति के लिए जरूरी है। असम में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार सर्बानंद सोनोवाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उत्तर भारतीय प्रचारक नहीं, बल्कि असम के स्थानीय आंदोलनों से उभरे एक जमीनी नेता हैं।

इसी तरह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की शानदार जीत बंगाली क्षेत्रवाद की मजबूती का सबूत है। कई विवादों के बीच उनकी जीत साबित करती है कि बंगाल के गरीब लोग अब राष्ट्रीय राजनीति पर भरोसा नहीं करते; वे क्षेत्रीय राजनीति की ओर मुड़ चुके हैं। ममता ने सिर्फ कांग्रेस को नहीं, उस वाम मोर्चे को भी बौना बना दिया, जो तीन दशकों से अधिक समय तक पश्चिम बंगाल की सत्ता में था। इस जीत के बाद दीदी के मोदी के करीब जाने की उम्मीद है, क्योंकि विकास के लिए उसे केंद्र की सहायता की जरूरत पड़ेगी। संभव है कि दीदी तीस्ता समझौते की दिशा में भी आगे बढ़ें।

केरल में जीत के बावजूद बंगाल में वाम मोर्चे का सिकुड़ जाना उसकी एक बड़ी विफलता है। चूंकि वाम मोर्चे के सर्वाधिक सांसद पश्चिम बंगाल से ही आते रहे हैं, ऐसे में, वहां इसका सिमट जाना बेहद चिंतनीय है। चूंकि केरल में कांग्रेस से लोहा लेने वाले वाम मोर्चे का पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के साथ हो जाना अनेक वामपंथियों को खल रहा था; और बंगाल में लेफ्ट की विफलता के बाद उसके बंगाल और केरल लाइन में शुरू हुआ विवाद वाम मोर्चे को और नुकसान ही पहुंचाएगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
MORE
AU ऐप में पढ़ें