इन दिनों देश का राजनीतिक माहौल ऐसा हो गया है, मानो सभी राजनीतिक दल चुनावी मोड में हों और एक-दूसरे पर आक्रामक प्रहार कर रहे हों। सभी दल चुनावी लाभ के लिए ही मुद्दे उठाते हैं। इस वजह से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जो एक न्यूनतम कामकाजी रिश्ते होते हैं, उसमें भी कमी आई है। सभी राजनीतिक दल एक दूसरे पर बोलबयानी के जरिये आक्रामक होना चाहते हैं, न कि समस्याओं और मुद्दों पर तार्किक चर्चा करना चाहते हैं।
हालांकि सोलहवीं लोकसभा में जब पहले के जनसंघ से जुड़ी भारतीय जनता पार्टी अपार बहुमत के साथ जीतकर सत्ता में आई थी, तो आम लोगों को ही नहीं, बल्कि राजनीतिक पंडितों को भी भरोसा था कि इस बार संसद का रुख कुछ खास होगा। पहली बार कोई गैर कांग्रेसी पार्टी व्यापक बहुमत के साथ जीतकर संसद में आई थी। यह भरोसा इसलिए भी था, क्योंकि इसका नेतृत्व नरेंद्र मोदी कर रहे थे, जिनका गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर प्रदर्शन काफी अच्छा रहा था। देश भर में विकास के गुजरात मॉडल की चर्चा हो रही थी। लोगों को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात की तरह ही देश को भी विकास की राह पर ले चलेंगे। आर्थिक सुधार के जो कार्यक्रम पिछली सरकार में पूरे नहीं हो पाए थे, उसे आगे बढ़ाया जाएगा। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा, नए रोजगार सृजित होंगे, आम लोगों को महंगाई से राहत मिलेगी, गरीबी उन्मूलन की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे और विदेशों से कालाधन वापस लाया जाएगा, क्योंकि इन्हीं सब वायदों के बल पर यह सरकार सत्ता में आई थी। लेकिन संसद में शोर-शराबे और राजनीतिक दलों के बीच बढ़ती तल्खी की वजह से सुधार कार्यक्रमों को उस तरह नहीं बढ़ाया जा रहा, जैसी अपेक्षा थी।
नरेंद्र मोदी ने जब प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, तो वह समारोह भी राष्ट्रपति भवन के राजसी सभागार में नहीं, बल्कि खुले लॉन में हुआ था, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी मौजूद थीं। लेकिन जब संसदीय कामकाज की शुरुआत हुई, तो सबसे पहले सत्ता पक्ष और सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस के बीच नेता प्रतिपक्ष पद को लेकर ही तनातनी शुरू हो गई। सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता प्रतिपक्ष का पद, जो कि केंद्रीय मंत्री के बराबर का पद होता है, देने से इन्कार कर दिया। इसके बाद दिल्ली तथा बिहार के विधानसभा चुनावों में भाजपा को मुंह की खानी पड़ी। प्रधानमंत्री ने सत्ता संभालने के तुरंत बाद सहकारी संघवाद की बात की और योजना आयोग की जगह नीति आयोग बनाया , ताकि केंद्र का वर्चस्व खत्म हो और नीति-निर्माण में राज्यो की हिस्सेदारी बढ़े। लेकिन इसके लिए कोई ठोस रोडमैप अब तक नहीं बन पाया है।
लोकसभा में भाजपा बहुमत में है, जबकि राज्यसभा में वह अल्पमत में है। ऐसे में आर्थिक सुधार के कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने के लिए सरकार को विपक्षी दलों के सहयोग की जरूरत थी। लेकिन विभिन्न कारणों से सहयोग और संवाद का रिश्ता बनने के बजाय सत्ता पक्ष और विपक्ष के रिश्तों में लगातार तल्खी आती गई। नतीजा यह हुआ कि आर्थिक सुधार की दिशा में क्रांतिकारी माना जाने वाला वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) विधेयक अब तक पारित नहीं हो सका है। जीएसटी पर पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने काफी विचार-विमर्श किया है और यह माना जाता है कि इस विधेयक के पारित होने से भारत में एक एकीकृत कर ढांचा होगा, जिससे उत्पादकों एवं व्यवसायियों को काफी सहूलियतें होंगी। लेकिन एक-दूसरे पर हावी होने की राजनीति के चलते यह विधेयक अब तक अधर में लटका हुआ है, जिससे देश को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है।
हमारे राजनीतिक दलों के बीच यह तल्खी और कटु बयानबाजी सिर्फ संसद तक ही सीमित नहीं है, बल्कि संसद के बाहर भी दिखती है। पिछले दिनों विभिन्न टेलीविजन चैनलों की ओर से एक राजनीतिक विश्लेषक के नाते मुझे विभिन्न मुद्दों पर बहस में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया गया। वहां मैंने देखा कि राजनीतिक दलों के प्रवक्ता एक दूसरे को सुनने के बजाय आक्रामक ढंग से अपनी बात थोपने की कोशिश करते हैं।
पिछले दिनों अगस्ता वेस्टलैंड का मसला संसद में उठाया गया। इस मुद्दे पर भाजपा एवं कांग्रेस के बीच तीखी नोक-झोंक तो हुई ही, बसपा एवं जदयू के नेताओं ने भी चीख-चीखकर अपनी बात रखी। इसी तरह उत्तराखंड के मुद्दे पर चर्चा हुई। इससे जुड़े सांविधानिक मुद्दे, कोर्ट की समझदारी आदि पर चर्चा होने के बजाय सारी बहस दोनों तरफ से तेरी-मेरी पर केंद्रित हो गई। अभी-अभी बिहार में एक बहुत ही नृशंस घटना हुई है। आदित्य सचदेव नाम के एक युवक की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी गई, क्योंकि उसने जदूयू के एक विधान परिषद सदस्य के बेटे की कार को ओवरटेक किया था। जदयू के प्रवक्ता ने यह तो माना कि घटना दुखद है, पर यह तर्क देने से नहीं चूके कि भाजपा शासित अन्य राज्यों में अपराध का ग्राफ कहीं ज्यादा है। यानी राजनीतिक बहस का स्तर यह हो गया है कि राजनीतिक दल आपदा या मौत जैसी घटनाओं पर भी राजनीति करने के बाज नहीं आते। असल में आक्रामक बयानबाजी की प्रमुख वजह लोगों का वास्तविक समस्याओं से ध्यान भटकाना होता है, क्योंकि जनता तो पूछेगी ही कि जो वायदा किया गया था, वह पूरा क्यों नहीं हो रहा है।
जहां तक अगस्ता वेस्टलैंड की बात है, यह रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार का अभूतपूर्व मामला है। बोफोर्स सौदे को लेकर भी भ्रष्टाचार के मामले उठे थे, लेकिन कुछ नहीं हुआ। इटली की अदालत ने घूस देने वाले लोगों को सजा दी है, तो जाहिर है कि घूस लेने वाले लोग भी होंगे। इसलिए सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह घूस लेने वाले लोगों का पता लगाए और उसे सजा दिलाने का काम करे। सिर्फ राजनीतिक माहौल को गरमाए रखने के लिए बोलबयानी की राजनीति करने से देश का भला नहीं होगा।
दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक एवं राजनीतिक विश्लेषक