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निजी कंपनी बनकर रह गई है कांग्रेस

Sun, 22 May 2016 05:12 PM IST
तवलीन सिंह
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तवलीन सिंह
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जिस दिन चुनाव परिणाम आने वाले थे, मैं सुबह से ही टीवी के सामने बैठ गई थी और तब तक नहीं हिली, जब तक कि असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी से स्पष्ट परिणाम मालूम नहीं हो गए। जब साफ हो गया कि कांग्रेस ने असम और केरल में अपनी सरकारें खो दीं, तो गांधी परिवार के वफादार सेवक मणिशंकर अय्यर को टीवी पर यह कहते सुना कि कांग्रेस इसलिए बार-बार चुनाव हार रही है, क्योंकि देश भर में 'सांप्रदायिकता की लहर' फैल रही है। यानी दोष मतदाताओं का है, कांग्रेस का नहीं। उनकी ‘सेक्यूलर’ नजरों में भारत के मतदाता सांप्रदायिक हो गए हैं।
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फिर जब उनसे पूछा गया कि क्या कांग्रेस को जिंदा रहने के लिए अब प्रियंका गांधी को लाना पड़ेगा, तो उन्होंने बेझिझक कह दिया कि सोनिया गांधी की बेटी का स्वागत है, अगर राजनीति में आना चाहती हैं। उनके कहने का मतलब साफ था कि निकट भविष्य में कांग्रेस में किसी किस्म का परिवर्तन असंभव है। सेक्यूलरिज्म नारे के तौर पर तो ठीक है, लेकिन चुनाव जीतने के लिए गांधी परिवार चाहिए। कांग्रेस की समस्या यह है कि उनके अपने ही लोग पार्टी छोड़कर जा रहे हैं,क्योंकि वे जानते हैं कि परिवारवाद से कांग्रेस का कितना नुकसान हुआ है।

जब मैंने चैनल बदला, तो असम के हेमंत बिस्व शर्मा बोल रहे थे। उनसे जब पूछा गया कि चुनाव से कुछ महीने पहले कांग्रेस छोड़कर भाजपा में क्यों चले गए, तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि 'राहुल गांधी को सिर्फ ‘ब्लू ब्लड’ लोग (राजनीतिक वारिस) पसंद हैं, सो मेरे जैसे लोगों के लिए वहां कोई जगह नहीं रही।’
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अपने राज परिवार के नेतृत्व में कांग्रेस शहजादों की पार्टी बनकर रह गई है, सो राजनीतिक वारिसों के अलावा जगह है, तो मणिशंकर अय्यर जैसे सेवकों के लिए, जो दिन-रात राज परिवार की खुशामद करने में लगे रहते हैं। वर्ष 2014 के चुनाव के बाद कांग्रेस के नेताओं को समझ जाना चाहिए था कि परिवर्तन लाने का समय आ गया है। लेकिन परिवर्तन कैसे आएगा, जब नेतृत्व में परिवर्तन की कोई आवश्यकता ही न समझी जा रही हो? लोकसभा चुनाव हारने के बाद इतना ही हुआ कि राहुल गांधी ने अपनी विरासत संभालने की भरपूर कोशिश की। संसद के अंदर और बाहर भी वह बोलते और लोगों से मिलते-जुलते दिखाई दिए। आम राजनीतिक कार्यकर्ताओं की तरह देश भर में घूमने भी लगे। पांच राज्यों में जब चुनाव अभियान शुरू हुआ, तब जगह-जगह भाषण देने गए। सोनिया जी भी खूब प्रचार करते हुए दिखीं। कांग्रेस के इन बड़े नेताओं ने मतदाताओं से बार-बार कहा कि झूठे सपने दिखाकर 2014 में मोदी ने वोट लिया था। कांग्रेस फिर भी बुरी तरह हार गई। क्या कांग्रेस के इन बड़े नेताओं को नहीं समझना चाहिए कि रणनीति बदलने का समय आ गया है? जब कोई पार्टी निजी कंपनी बन कर रह जाती है, तो परिवर्तन बहुत मुश्किल हो जाता है।

कांग्रेस को निजी कंपनी में परिवर्तित करने का काम इंदिरा गांधी ने शुरू किया था। आपातकाल की आड़ लेकर उन्होंने कांग्रेस को अपने छोटे बेटे संजय के हवाले कर दिया था। संजय के देहांत के बाद पार्टी को राजीव गांधी के हवाले किया, और जब राजीव गांधी की हत्या हुई, तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने गांधी परिवार के नाम पर वोट मांगने की आदत डाल ली, सो स्वाभाविक था कि सोनिया गांधी को कांग्रेस सौंप दी जाए। चाहे चुनावों में जितना भी नुकसान होता रहे, इस परंपरा को बदलना आसान नहीं है।
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