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सच बोलने वाले को क्यों पसंद नहीं करती हमारी सियासी बिरादरी?

Wed, 18 May 2016 05:40 PM IST
राहुल सांकृत्यायन/अमर उजाला, नई दिल्ली
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वो क्या है न कि हम भारतीयों को अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने की आदत है इसलिए हम खुद की आलोचना न तो करना चाहते हैं, न किसी के द्वारा की गई आलोचना को बर्दाश्त कर पाते हैं। बावजूद इसके कि आलोचना करने वाला हमारा अपना ही क्यों न हो। आपने कभी 5 रुपए से लेकर 1000 तक की कागजी भारतीय मुद्रा देखी है? देखी तो होगी ही। उस पर  नीचे एक दस्तखत है जो भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर की होती है। मौजूदा समय में कागजी मुद्राओं पर रघुराम गोविंद राजन की दस्तखत होती है। आप बस एक बार सोचिए कि आपकी जेब में जो मुद्रा है उस पर आपकी दस्तखत हो और पूरा देश उसी का उपयोग करता हो, भले ही राष्ट्रपति क्यों न हो। कितनी बड़ी बात होगी न आपके लिए। 
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अब आईए इसी तस्वीर का एक दूसरा पहलू देखते हैं। जब विशिष्ट ज्ञान और अनुभव के आधार पर मनोनीत किया जाने वाले माननीय राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी गवर्नर के लिए यह कहते हों कि ये शख्स हमारे देश के लिए अनुकूल नहीं है। इसे छुट्टी पर भेज दिया जाना चाहिए। चलिए छुट्टी पर भेजने वाली बात तो कोई भी कह सकता है लेकिन कोई ये कैसे कह सकता है कि इसे तुरंत हटाइए। मैं कोई अर्थशास्त्री तो नहीं हूं लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी जीते हुए इतना तो पता चल ही चुका है कि हमारी अर्थव्यवस्था वाकई अंधो में काना राजा है। हम अपनी अर्थव्यवस्था की शुरुआती तुलना करते भी हैं तो किससे? पाकिस्तान, अफगानिस्तान, मालदीव, बांग्लादेश, म्यांमार, नेपाल और चीन से। आपको पता होना चाहिए कि इनमे से किसी भी मुल्क की स्थिति न तो राजनीतिक और न ही भौगोलिक हमसे मिलती जुलती है। अगर हम ऐसे मुल्कों से अपनी तुलना करें तो क्या वाकई हम खुद को अंधे में काना राजा महसूस नहीं करते? नेपाल में लोकतंत्र अभी भी संकट में है, मालदीव एक छोटा सा द्वीप है, बंग्लादेश कट्टरपंथियों के निशाने पर है, म्यांमार अभी उठने की कोशिश रहा है और पाकिस्तान माशाअल्लाह इसके लिए कुछ कहने की हमें जरूरत नहीं। बाकी बात चीन की करें तो अगर वहां की तरह की स्थिति हमारे मुल्क की होती। हमें सांस लेने के लिए भी सरकार से परमिशन लेनी पड़ती तो शायद हम वैसे बन सकते थे। लेकिन हम ऐसे नहीं है और न ही हमें ऐसा होने की जरूरत है।



केंद्र सरकार के कई मंत्री नहीं चाहते कि रघुराम राजन आरबीआई के गवर्नर पद पर बने रहें। आखिर ऐसा क्यों है? मेरे लेख लिखने के दौरान जब मैंने थोड़ी सी जानकारी के लिए गूगल की ओर रुख किया तो एक खबर पढ़ कर चौंक गया। खबर थी कि एक सर्वे में कहा गया है कि देश के लोग चाहते हैं कि रघुराम राजन को दोबारा आरबीआई का गवर्नर बनना चाहिए। इतना ही नहीं उस सर्वे में यह भी कहा गया कि विशिष्ट ज्ञान और अनुभव के आधार पर मनोनीत किए गए राज्यसभा सांसद ने जो कहा वो गलत है। सुब्रमण्यम स्वामी का आरोप है कि राजन मन से पूरे भारतीय नहीं है क्योंकि उनके पास अमेरिका का ग्रीन कार्ड है और वो उसे रिन्यू कराने भी गए थे। स्वामी जी क्या पता कल कोई ये भी कह दे कि आप हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पढ़ कर आए हैं इसलिए भारतीय राजनीति को गंदा करने के लिए इतना सब अंट शंट कहते रहते हैं, तब आपकी क्या राय होगी? स्वामी के मुताबिक देश में कई राष्ट्रवादी विशेषज्ञ मौजूद हैं और राजन को इसलिए हटाया जाना चाहिए क्योंकि उन्हें यूपीए सरकार ने नियुक्त किया था। मने गजब करते हैं स्वामी जी! अगर आप जनसंघ से बिदक कर अलग पार्टी बना लें, फिर अपनी पार्टी का विलय भाजपा में करवा लें तो क्या ये राष्ट्रवाद की निष्ठा का कोई नया पैमाना बनाया है आपने? 
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अब आइए गवर्नर बनने के बाद राजन के ट्रैक रिकार्ड की बात करते हैं। राजन ने जब गवर्नर का पद संभाला तो एक डॉलर की तुलना में रुपया 68 के स्तर तक था। राजन पर यह जिम्मेदारी भी थी कि वे महंगाई को रोकने के लिए बैंक दरों को संतुलित करे । कार्यकाल के शुरूआती  6 महीने में राजन ने कई बार बैंक दरों में बदलाव किया जिससे महंगाई रोकने में काफी हद तक मदद मिली।  बीते साल 4 सितंबर को जब राजन ने अपने कार्यकाल का दूसरा साल पूरा किया तो देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी रिकॉर्ड स्तर पर बढ़कर 355 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया था। उनके आने से पहले विदेशी मुद्रा भंडार 274 अरब डॉलर के स्तर पर था। इतना ही नहीं साल  2013 में चालू खाता घाटा 5.7 फीसदी था वो मार्च 2015 घटकर 1.52 फीसदी के स्तर पर आ गया था।

राजन ने भारतीय निवेश की नीतियों में आमूल चूल परिवर्तन किया जिसके बाद प्रवासी भारतीयों के जरिए देश में 32 अरब डॉलर रुपए का निवेश कराया। जिससे भारतीय मुद्रा को स्थिर करने में खास कामयाबी मिली। राजन का साथ सरकार ने दिया या नहीं यह तो बाद की बात है लेकिन किस्मत ने उनका साथ जरूर दिया। कच्चे तेल की कम होती कीमतों  ने भी राजन की नीतियों को बेहतरी की ओर आगे बढ़ाया। आपने खबरों में पढ़ा होगा कि अपनी पहली समीक्षा में ही राजन ने कहा था कि ' कुछ निर्णय जो मैं करूंगा वो पसंद नहीं किये जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा था कि आरबीआई का गवर्नर होने का मतलब वोट मिलना या फेसबुक लाइक पाना नहीं है।'



राजन जब गवर्नर बने थे तो मंहगाई दर 9.80 फीसदी थी। मई में जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लगातार 17 महीने तक शून्य से नीचे रहने वाली महंगाई दर 0.34 प्रतिशत पर पहुंची है। आप ये भी कह सकते हैं कि आंकड़ों की बाजीगरी तो कोई भी दिखा सकता है लेकिन राजन सिर्फ आंकड़ों तक ही सीमित न होकर बैंको के गवर्नेंस पर भी काम किया। राजन ने न सिर्फ बाहर की बैंकिंग गवर्नेंस और दर बढ़ाने घटाने संबंधी फैसले किए बल्कि रिजर्व बैंक की स्थितियों में भी खासा बदलाव किया। उन्होंने आरबीआई के आंतरिक ढांचे को और अधिक मजबूत बनाने के लिए उसे प्रमुख क्लस्टर भागों में बांट दिया। ये क्लस्टर हैं रेगुलेशन एंड बैंकिंग, सुपरविज़न और रिस्क मैनेजमेंट, मॉनेटरी स्टेबिलिटी, फाइनेंसियल मार्केट और इंफ्रास्ट्रक्चर, ऑपरेशंस और ह्यूमन रिसोर्स। राजन ने कई मौकों पर आर्थिक जगत को भी आईना दिखाया और ये कहने से गुरेज नहीं किया कि आरबीआई आर्थिक जगत के लिए चीयर लीडर का काम नहीं कर सकती।



राजन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट मेक इन इंडिया पर भी हमला बोला  था। उन्होंने कहा था कि जब हम निर्यात आधारित विकास को पाना चाहते हैं जैसा की चीन ने किया था वही पर हम खतरे में आ जाते हैं। उन्होंने मेक इन इंडिया की जगह मेक फॉर इंडिया की बात कही थी। राजन ने देश में 'गायब' हो रहे अर्थशास्त्रियों पर एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि 'देश में अच्छे अर्थशास्त्रियों की कमी हैं जिसकी वजह से नीतियां बनाने में दिक्कत का सामना करना पड़ता है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताते हुए कहा कि देश को बहुत अच्छे इकोनॉमिस्ट की जरूरत है। हर दिन अपने काम में देखता हूं दिल्ली, मुंबई और पूरे देश में। हमने पूरी की पूरी अर्थशास्त्रियों की पीढ़ी खो दी है।' हालांकि मेरी नजर में इन सारी अच्छी तस्वीरों का दूसरा पहलू यह भी है कि राजन के फैसले वाकई कई लोगों को पसंद नहीं आए। राजन ने ही बैंकों को इस बात की मंजूरी दी कि एटीएम से तय संख्या से अधिक बार पैसे निकालने के लिए ग्राहकों से शुल्क वसूल किया जाए। यह माना जा सकता है कि राजन हद से ज्यादा वाला सच बोलते हैं। हमारे देश में हद से ज्यादा सच बोलने वालों को सियासी बिरादरी पसंद नहीं करती।
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