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मुड़-मुड़ के देख: आप खुद एक पुस्तकालय हैं; वृद्धावस्था जीवन का अंत नहीं, बल्कि हमारे संपूर्ण अस्तित्व का निचोड़

Fri, 27 Feb 2026 08:10 AM IST
Pavan एरिक एरिक्सन

सार

वरिष्ठ नागरिकों को खुद को उस जीवंत 'पुस्तकालय' के रूप में देखना चाहिए, जहां हर समस्या और मानवीय भावना से जुड़ी अनुभवी सलाह उपलब्ध है। जो बुजुर्ग अपने संघर्षों और सीखों को युवाओं के साथ साझा करते हैं, वे मानसिक रूप से कभी वृद्ध नहीं होते।
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मुड़-मुड़ के देख: आप खुद एक पुस्तकालय हैं - फोटो : FreePik
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विस्तार
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मानव जीवन विकास के विभिन्न क्रमिक चरणों से गुजरता है, जिसमें अंतिम चरण सबसे चुनौतीपूर्ण होने के साथ-साथ आध्यात्मिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण भी है। इसीलिए, मैं मानता हूं कि वृद्धावस्था जीवन का अंत नहीं, बल्कि हमारे संपूर्ण अस्तित्व का निचोड़ है। जब हम उम्र के इस पड़ाव पर पहुंचते हैं, तो हमें अपने अतीत को टुकड़ों में देखने के बजाय एक विस्तृत और पूर्ण तस्वीर के रूप में स्वीकार करना चाहिए। जीवन के उतार-चढ़ाव, सफलताएं और असफलताएं-इन सबका समग्र रूप से स्वागत करना ही समय पर प्राप्त की गई असली जीत है।
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एक बुजुर्ग व्यक्ति जब अपनी जीवन-यात्रा के प्रति ‘कृतज्ञता’ महसूस करता है, तो उसके भीतर एक ऐसी गहन शांति का संचार होता है, जो उतावलेपन से भरे युवाओं के लिए दुर्लभ है। इस अवस्था की सबसे अनमोल देन बुद्धिमानी है। यह वह अद्वितीय गुण है, जो केवल समय की मार, सफेद बालों और चेहरे की झुर्रियों के अनुभव से ही निखरता है। यह वह आंतरिक शक्ति है, जो मृत्यु की अपरिहार्यता के सामने भी जीवन की गरिमा और उसके अर्थ को अक्षुण्ण बनाए रखती है।

अतः, वरिष्ठ नागरिकों को स्वयं को समाज पर भार समझने की भूल कभी नहीं करनी चाहिए। इसके विपरीत, उन्हें खुद को उस जीवंत ‘पुस्तकालय’ के रूप में देखना चाहिए, जहां हर समस्या और मानवीय भावना से जुड़ी अनुभवी सलाह उपलब्ध है। इस उम्र में प्रेरणा का सबसे अक्षय स्रोत ‘जेनेरेटिविटी’ है, जिसका अर्थ है अपनी संचित विरासत और ज्ञान को अगली पीढ़ी के हाथों में सौंपना। जो बुजुर्ग अपने संघर्षों और सीखों को युवाओं के साथ साझा करते हैं, वे मानसिक रूप से कभी वृद्ध नहीं होते, बल्कि उनका अस्तित्व तो आने वाली पीढ़ियों के मार्ग को आलोकित करने वाला एक शाश्वत दीपक बन जाता है। इसलिए, वृद्धावस्था आत्म-ग्लानि में डूबने का नहीं, बल्कि स्वयं से यह कहने का समय है कि ‘मैंने अपना जीवन जिया है और इसका हर पल सार्थक था।’
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