फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सुसाइड प्रिवेंशन डे 2020: मन के हारे हार है, मन के जीते जीत

विज्ञापन
विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस 2020 (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
विज्ञापन

आज कल कोरोना के बढ़ते प्रकोप और चर्चाओं के चलते बाकी बीमारियों और स्वास्थ समस्याओं को तो जैसे हम भूल ही गए हैं। आजकल चर्चा सिर्फ और सिर्फ कोरोना और उससे होने वाली मौतों को लेकर है। इन्ही सब के बीच पिछले दिनों आई राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट पर शायद हम सबका ध्यान ही नहीं गया। यह रिपोर्ट भारत में हर साल आत्महत्या से होने वाली मौतों को लेकर थी।

विज्ञापन


इस रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में 2019 में कुल 1,39,123 लोगों ने आत्महत्या की और इसका रोज का औसत निकालें तो हर रोज करीब 381 लोगों ने आत्महत्या कर अपनी जिंदगी खत्म कर ली। यह एक भयावह संख्या है और यह दर्शाता है कि आज की आधुनिक जीवनशैली में कहीं न कहीं लोग बहुत जल्दी ही हौसला हार रहे हैं और मौत को गले लगा रहे हैं।


वैसे देखा जाए तो आत्महत्या की मुख्य वजह गरीबी ही है। कुछ समय पहले आई डब्ल्यूएचओ की स्टडी के अनुसार, आत्महत्या उन देशों में ज्यादा होती हैं जहां प्रति व्यक्ति आय कम है, क्यूंकि गरीबी से जूझते कई लोग अपने सपनों को साकार करते-करते जिंदगी की लड़ाई हार जाते हैं। लेकिन आज के समय में अब इसका दूसरा पहलु भी है।
विज्ञापन


अब आत्महत्या सिर्फ गरीबों को नहीं बल्कि सम्पन्न लोगों को भी मार रही है। जहां गरीब मजबूरी में अपनी जिंदगी खत्म कर रहा है तो जिन लोगों के पास सुख सुविधाएं हैं, वो मानसिक अवसाद के शिकार हो कर मौत को गले लगा रहे हैं। चाहे वो बड़े बड़े बिजनेसमैन हो या फिल्म स्टार। 

आखिर ऐसा क्यों है कि आत्महत्या की प्रवृति बढ़ती जा रही है? क्या जिंदगी अब पहले से मुश्किल होती जा रही है या अब आधुनिकता का बोझ या चकाचौंध से भरी जिंदगी हमें अंदर से खोखला करती जा रही है। आत्महत्या का सीधा संबंध हमारे मानसिक स्वास्थ्य से होता है।

हां, लेकिन इस मानसिक स्वास्थ्य पर असर कई तरीकों से पड़ता है। कहीं किसी को लोन की परेशानी है तो किसी को पारिवारिक, कहीं कोई प्रेम में फेल हो कर जिंदगी की लड़ाई हार रहा है तो कोई एग्जाम में फेल हो कर।

एनसीआरबी के रिपोर्ट में भी आत्महत्या के ऐसे ही कारणों का जिक्र है और  पारिवारिक समस्याएं, बीमारी से परेशानी, बेरोजगारी, प्रेम और एग्जाम में नाकामी ही आत्महत्या के मुख्य कारण हैं। लेकिन यह समस्याएं तो सालों साल से हैं, तो और हम ही नहीं हमारे माता पिता भी इन सबसे लड़ कर मजबूत बन कर जिंदगी में आगे आए हैं। इसका मतलब यह है कि आत्महत्या की वजह यह समस्याएं नहीं बल्कि इनको लेकर हमारा नजरिया है।

विज्ञापन

विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस 2020विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस 2020 (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
चाहे अमीर हो या गरीब, लेकिन मानसिक अवसाद का सबसे बड़ा कारण है पारिवारिक समस्याएं और भावनात्मक कमजोरी। आज के बदलते परिवेश में परिवार के नाम पर हम सब संयुक्त परिवार प्रणाली से दूर होते जा रहे हैं।

एक साथ रहने से बेहतर अलग रहना समझते हैं, लेकिन सोचिए अगर परिवार के साथ रहेंगे जो हर मुसीबत और परेशानी को लड़ने का हौसला मिलता है। दूसरा यह कि शायद भावनात्मक रूप से हम सब इतने कमजोर हो रहे हैं कि छोटी-छोटी असफलताएं भी हम नहीं संभाल पाते।

बचपन से ही प्रतिस्पर्धा का ऐसा पाठ पढ़ाया जा रहा है कि छोटी सी असफलता मिलते ही लगता है कि जिंदगी खत्म हो गई है। कहीं कोई बोर्ड एग्जाम में कम नंबर की वजह से आत्महत्या कर रहा है तो कहीं कोई अपने किसी रिश्ते के खत्म होते ही अपनी दुनिया खत्म कर लेता है।

शारीरिक रूप से मजबूत लग रहा इंसान भी दिमागी रूप से कमजोर हो रहा है और मानसिक तौर पर आज की पीढ़ी में एक खोखलापन आता जा रहा है। आज लोग समस्याओं से लड़ कर उन्हें खत्म करने की जगह खुद को खत्म करना आसान समझ रहे हैं।

आज जरुरत है हमें खुद को अपनों से जोड़ने की, अपने परिवार के साथ समय बिताने की और कुछ भी दिल में आए तो उसे दूसरे के साथ साझा करने की। कहते हैं न कि खुशी बांटने से बढ़ती है और दुःख कम होता है।

लेकिन सबसे बड़ी बात जो मुझे लगता है कि हम सब को करनी चाहिए वह है अपनों से भावनात्मक जुड़ाव और खुद को प्रतिस्पर्धी बनाएं, लेकिन इतना भी नहीं कि अगर जिंदगी के किसी इम्तेहान में हार जाएं तो यह न लगे की यह जिंदगी की हार है।

हमें कोशिश करनी है और प्रयास करने हैं और जिंदगी की चुनौतियों से लड़ना है, उन्हें हारना नहीं है। आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं बल्कि अपनी मुसीबत अपने परिवार या अपने से जुड़े लोगों पर डाल देना है।

आज सुसाइड प्रिवेंशन डे पर, हौसला करें जिंदगी की चुनौतियों से डट कर लड़ने की। और एक बेनाम शायर के शेर के साथ कोशिश करिए की जिंदगी लड़ कर जिएं...

चाहा है तुझको तेरे तगाफुल के बावजूद
ऐ जिंदगी तू भी याद करेगी कभी हमें! 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें