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World Population Day 2020: अब समय आ गया है जनसंख्या नियंत्रण की गंभीरता को समझना होगा

सार

सर्वप्रथम 11 जुलाई 1989 को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया गया उस वक्त विश्व की आबादी 5 बिलियन पहुंच चुकी थी इस दिवस को मनाने का उद्देश्य भी जनसंख्या संबंधी समस्याओं व चुनौतियों से निपटने के लिए कारगर नीतियां व उपायों को क्रियान्वित करना है।
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सर्वप्रथम 11 जुलाई 1989 को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया गया- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला
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विस्तार
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दुनिया के तमाम वैज्ञानिकों द्वारा लगातार खोज करने के बाद भी आज तक पृथ्वी जैसा कोई दूसरा ग्रह ब्रह्मांड में नहीं मिल पाया. पृथ्वी ब्रह्मांड का एकमात्र स्थान है जो मानव ही नहीं अपितु लाखों प्रजातियों का घर है, सौरमंडल के इस एकमात्र सबसे घने ग्रह पर जीवन को संभव बनाने के लिए जल, हवा, पर्यावरण आदि ऐसे प्राकृतिक संसाधन हैं जो अन्य किसी ग्रह पर उपलब्ध नहीं हैं.

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मानव जाति के लिए पृथ्वी प्राकृति का अमुल्य उपहार है. पृथ्वी पर पाए गए प्राकृतिक संसाधनों को सहेजने की बजाए इंसान ने अपनी स्वार्थपरता के चलते इनका जमकर शोषण किया है. इस शोषण के पीछे काफ़ी हद तक धरा पर बढ़ता इंसानी बोझ भी एक कारण है.
 

1950 में विश्व की जनसंख्या 250 करोड़ के लगभग थी, 1980 में 440 करोड़ और सन 2000 में यह बढ़कर 611 कोरड़ हो गई, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) आंकड़ों के मुताबिक 2020 में दुनिया की आबदी 779 करोड़ यानि 7.7 अरब को पार हो गई है.
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सर्वप्रथम 11 जुलाई 1989 को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया गया उस वक्त विश्व की आबादी 5 बिलियन पहुंच चुकी थी इस दिवस को मनाने का उद्देश्य भी जनसंख्या संबंधी समस्याओं व चुनौतियों से निपटने के लिए कारगर नीतियां व उपायों को क्रियान्वित करना है.

संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के विभाग "पॉपुलेशन डिविजन" ने द वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रोस्पेक्ट 2019 हाइलाइट्स के 26वें अंक में जनसंख्या संबंधी आंकड़ों में भारत को लेकर काफी चिंताएं जाहिर की हैं. रिपोर्ट के मुताबिक अगले 7 साल यानी 2027 तक भारत चीन को पछाड़कर दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा इतना ही नहीं 2019 से 2050 तक भारत में 27.30 करोड़ और लोग बढ़ जाएंगे.

हलांकि ऐसा संभव होता नहीं दिखाई देता क्योंकि चीन ने अपने देश की गिरती जन्म दर को संभालने के लिए 2015 में एक बच्चे की नीति ख़त्म कर दंपतियों को दो बच्चे पैदा करने की अनुमति दे दी है. इस तरह यह कहना जल्दबाजी होगा कि आगामी 7-8 वर्षों में भारत जनसंख्या के मामले में चीन को पछाड़ कर विश्वभर में पहले स्थान पर खड़ा होगा.

आबादी में होने वाली वृद्धि किसी भी ऐसी परियोजना को साकार नहीं होने देती....

सीमित जनसंख्या में हम उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करके आरामदायक जीवन जी सकते हैं- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Pixabay
आजादी के समय भारत की जनसंख्या 33 करोड़ के करीब थी. वर्तमान में चीन 143 करोड़ की जनसंख्या के साथ पहले व भारत 137 करोड़ लोगों के साथ विश्वभर में दूसरे स्थान पर हैं. चीन व भारत में विश्व की क्रमशः 19 व 18 फीसदी आबादी रहती है.

अमेरिका 32.90 करोड़ की आबादी के साथ तीसरे नंबर पर है. इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि 2050 की अवधि तक वैश्विक आबादी में 200 करोड़ की वृद्धि होगी और विश्व की कुल आबादी 970 करोड़ हो जाएगी. 

ब्रिटिश अर्थशास्त्री एवं जनांकिकी विशेषज्ञ प्रो. थॉमस रॉबर्ट माल्थस ने 1798 ई. में अपनी पुस्तक में जनसंख्या के सिद्धांत पर एक निबंध लिखा भले ही उन्होंने यह सिद्धांत जनसंख्या की वृद्धि को यूरोपीय संदर्भ में ध्यान में रखते हुए लिखा लेकिन भारतीय परिपेक्ष्य में यह आज भी सटीक नजर आता है.

उनके जनसंख्या सिद्धांत के अनुसार मानव जनसंख्या ज्यामितीय आधार पर बढ़ती है जबकि भोजन और प्राकृतिक संसाधन अंकगणितीय आधार पर बढ़ते हैं जो आगे चलकर जनसंख्या व संसाधनों के बीच आगे अंतर उत्पन्न करता है, परिणामस्वरूप प्राकृतिक घटनाएँ व आपदाएं ही इस अंतर को दूर करती है. सूखा, भुखमरी, बाढ़ या महामारी आदि फैलना इसके ही उदाहरण है. 

1859 में प्रकाशित किताब 'द ओरिजिन ऑफ स्पीशीस' के लेखक व मानव इतिहास के सबसे बड़े वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन का मत था कि प्रकृति क्रमिक परिवर्तन द्वारा खुद अपना विकास व नियोजन करती है, आगे चलकर यही सिद्धांत आधुनिक जीव-विज्ञान की नींव बना. डार्विन सिद्धांत के मुताबिक ''जीवन के लिए संघर्ष" वर्तमान में भी लागू होता साफ दिखाई दे रहा है.

सीमित जनसंख्या में हम उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करके आरामदायक जीवन जी सकते हैं, लेकिन जनसंख्या वृद्धि के कारण यही सुख संघर्ष में परिवर्तित होकर जीवन की शांति को भंग करने काम करता है।

देश में जब भी कई विकासात्मक परियोजना बनाई जाती है तो वह वर्तमान जनसंख्या को ध्यान में रखकर बनाई जाती है लेकिन आबादी में होने वाली वृद्धि किसी भी ऐसी परियोजना को साकार नहीं होने देती.

भारत में दो बच्चों की नीति को धर्म के चश्मे से देखा जाता है...

भारत के लिए बढ़ती आबादी एक राष्ट्रीय समस्या बन चुकी है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
ठीक है चीन की जनसंख्या भारत से मात्र 6 करोड़ ज्यादा हो लेकिन भारत की तुलना चीन का क्षेत्रफल तीन गुणा अधिक है अर्थात देश के संसाधनों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता चीन के मुकाबले महज एक तिहाई रह गई है.

भारत के लिए बढ़ती आबादी एक राष्ट्रीय समस्या बन चुकी है. हम इस समस्या का ठोस हल करने की बजाए इसे आज भी धर्म की दृष्टि से देखते हैं. शायद तभी जहां तीन तलाक जैसे कानून बनने के खिलाफ़ हल्ला-गुल्ला होता है, तो वहीं बाल विवाह की घटनाएं आदि भी यदा-कदा सामने आ रही हैं. 

1970 में लागू टू-चाईलड पॉलिसी से फायदा होता न देख चीन ने 1979 में 'वन चाइल्ड' पॉलिसी लागू कर दी. इसे लागू करने के लिए चीन ने नसबंदी, गर्भपात जैसे तरीके अपनाए. कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि चीन की आबादी को नियंत्रित करने में वन चाइल्ड' पॉलिसी ने भी बड़ी भूमिका निभाई है.

इन्हीं नीतियों के चलते चीन ने लगभग 30 से 40 करोड़ नए लोगों को संसार में आने से रोक दिया. भारत में ओडिशा, बिहार, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात आदि राज्यों में दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को शहरी निकायों, नगरपालिकाओं और पंचायत चुनाव लडऩे की इजाज़त नहीं है. इसके अलावा महाराष्ट्र में दो से अधिक बच्चों वाले परिवारों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली से बाहर रखा गया है.

असम, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में दो से अधिक बच्चे होने पर सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य करार दे दिया जाता है. इन 11 राज्यों के बाद अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी हाल ही में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर सख्त नीति बनाने की बात कही है. देश की हर नीति पर राजनीति ज्यादा हावी रहती है.

जनसंख्या नियंत्रण की असफल नीतियों के लिए सरकार से ज्यादा समाज दोषी है. भारत में दो बच्चों की नीति को धर्म के चश्मे से देखा जाता है. देश में आज भी एक वर्ग ऐसा है जो शिक्षा के अभाव में यही सोच लिए जी रहा है कि बच्चे तो भगवान की देन हैं और परिवार में जितने अधिक सदस्य होंगे कमाने वाले भी उतने ही अधिक होंगे लेकिन वह यह भूल जाता है की कमाने वाला केवल कमाएगा ही नहीं बल्कि खाएगा भी.
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मीडिया व सोशल मीडिया पर देशभक्ति, या स्वाभिमानी बनकर कुछ नहीं होगा...

परिवार नियोजन जैसे उपायों को अपनाने के बावजूद "बच्चे दो ही अच्छे" सिद्धांत को पूरी तरह लागू नहीं कर पाए हैं- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
एक बेटे की चाह में बेटियों की फौज खड़ी करने की सोच न तो देशहित में है न ही निजी हित में. गरीबी तो सभी को दिखाई देती है लेकिन 6-7 बच्चों की फौज गरीब को और गरीब बना रही है इस तरफ़ किसी का ध्यान नहीं.

क्षेत्रफल की दृष्टि से हमारे पास 2.5 फीसद जमीन और 4 फीसद जल संसाधन है. स्वास्थ्य की बात करें तो विश्व में बीमारियों का जितना बोझ है, उसका 20 फीसदी अकेले भारत पर है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ठोस जनसंख्या नियंत्रण की नीति को लेकर देश के लोगों से आह्वान कर चुके हैं।

आज हर कोई चीन के खिलाफ़ अपनी देशभक्ति जाहिर कर रहा है लेकिन चीन की तरह जनसंख्या नियंत्रण करके छोटे परिवार रखकर भी अपनी देशभक्ति का परिचय दिया जा सकता है। विश्व के सबसे अधिक गरीब और भूखे लोगों की संख्या की बात हो या कुपोषण और उचित स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव से मरने वाले बच्चों की संख्या हो इन सबमें देश अग्रणी है. 

परिवार नियोजन जैसे उपायों को अपनाने के बावजूद "बच्चे दो ही अच्छे" सिद्धांत को पूरी तरह लागू नहीं कर पाए हैं तो "एक बच्चा नीति" के बारे में सोचना तो दूर की बात है. समाज में शिक्षा का प्रसार जितना अधिक होगा, जनसंख्या नियंत्रण उपाय उतने ही प्रभावी ढंग से लागू होंगे. परिवार नियोजन के उपायों को लेकर लोगों में विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए.

महिलाओं की बजाए पुरुष नसबंदी को प्राथमिकता देनी होगी. देश की युवा पीढ़ी को किशोरावस्था से ही असुरक्षित यौन संबंधों के बारें में जागरूक करने के लिए कार्यक्रम शुरू हों. 

स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर की विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हीं लोगों को मिलना चाहिए जो परिवार नियोजन की नीति को अपनाते हों. सरकारी व गैर-सरकारी क्षेत्र में नौकरीपेशा लोगों के लिए नियुक्ति से लेकर सेवानिवृत्ति तक "दो या एक बच्चे की नीति" राष्ट्रीय स्तर पर बिना भेद-भाव, सख्ती से सभी धर्मों, वर्गों व समुदायों पर लागू होनी चाहिए. जनसंख्या विस्फोट को भावनाओं से नहीं कठोर नीतियों से रोका जा सकता है.

मीडिया व सोशल मीडिया पर देशभक्ति, या स्वाभिमानी बनकर कुछ नहीं होगा, अंतरराष्ट्रीय समुदाय में आज भी हमें भूखे नंगों के देश के रूप में देखा जाता है. बढ़ती आबादी रोजगार और आवास के संकट को और विकराल कर रही है.

बेरोजगारी, नशाखोरी, गरीबी, मंहगाई और बढ़ते अपराध आदि सामाजिक बुराईयां सब बढ़ती आबदी की ही देन हैं. जनसंख्या वृद्धि दर को यदि नियंत्रित कर लिया जाए तो देश की ज़्यादातर सामाजिक समस्याओं का हल स्वतः ही हो जाएगा. 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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