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विश्व फोटोग्राफी दिवस 2020 : वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी और कैमरे में कैद हुए कुछ दुर्लभ जीवों की कहानी

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भारत में जंगली कुत्तों की संख्या धीरे-धीरे कम हो रही है। - फोटो : ब्रजेश सिंह
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कहते हैं कि कभी मनुष्य की आंखें जो नहीं देख पातीं हैं वो कैमरा देख लेता है। हर एक बेहतरीन विहंगम तस्वीर के पीछे एक कहानी होती है, किसी फोटोग्राफर का विजन, उसका नजरिया भी होता है।

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19 अगस्त के दिन को पूरी दुनिया वर्ल्ड फोटोग्राफ़ी डे के रूप में मनाती है तो आज इस पर कुछ चर्चा भी स्वाभाविक है। आज ये चर्चा मैं करने जा रहा हूं वाइल्ड डॉग्स पर और इनकी कुछ खास तस्वीरें भी मैं आपके लिए लेकर आया हूं।

सन् 1896 में जोसेफ नीसफर नीप्स द्वारा किए गए फोटोग्राफी कैमरा के आविष्कार से लेकर अब तक यूं तो फोटोग्राफी की कई विधाएं विकसित हुई हैं और आज मोबाइल फोन के साथ जुड़कर कैमरा लगभग हर हाथ, हर घर में पहुंच गया है। वाइल्ड लाइफ, ऐस्ट्रोनोमी, फैशन, फ़ूड, फिल्म, पत्रकारिता आदि फोटोग्राफी की प्रचलित और प्रसिद्ध विधाओं में से हैं।
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आंकड़ों के अनुसार भारत में ही नहीं अपितु विश्व भर में डिजिटल कैमरा की बिक्री, वाइल्ड लाइफ पर्यटकों की संख्या में हर वर्ष इजाफा हो रहा है और इसके पीछे सोशल मीडिया, तनाव भरे जीवन, शहरों की प्रदूषित हवा का भी योगदान है, क्योंकि समय मिलते ही अधिकतर लोग अपनी हॉबी को पूरा करने के लिए निकल जाते हैं।


वाइल्ड लाइफ प्रेमियों के लिए बाघ, तेंदुआ, शेर, हाथी, स्नोलेपर्ड जैसे वन्यजीवों की फोटोग्राफी प्रमुख है और पक्षियों एवं सरीसृप प्रजातियों के तरफ भी आकर्षण खूब बढ़ा है, और अब जब बात वाइल्ड लाइफ़ फोटोग्राफी की हो रही है तो मैं आपको एक ऐसे वन्यप्राणी के बारे में बताता हूं जिसमें बाघ, शेर और तेंदुआ के मिले-जुले बहुत सारे गुण होते हैं, मैं बात कर रहा हूं जंगली कुत्तों की।

जहां एक ओर बहुत ही अथक प्रयासों से भारत में बाघों की संख्या में उतरोत्तर वृद्धि हो रही है और कई शासकीय और निजी संस्थान इस ओर सराहनीय काम कर रहे हैं, उसी एक तरफ दुख की बात ये भी है की जंगली कुत्तों की संख्या धीरे-धीरे कम हो रही है और ये प्रजाति केे अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।  

(अगर आपने फिल्म ‘मोगली’ या ‘जंगल बुक’ देखी है तो आपको ये झुंड...

 जंगली कुत्ते एक साथ झुंड बनाकर रहते हैं। - फोटो : ब्रजेश सिंह

निवास क्षेत्र: शेरों की तरह झुंड में रहने वाले, तेंदुए की जैसी फुर्ती और रफ्तार, बाघ के जैसे दबंग और तर्रार ढोले प्रायः सेंट्रल, साउथ, साउथईस्ट एशिया रीजन के वनों में और भारत के कान्हा, पेंच, तडोबा वन्य क्षेत्रों में रिजर्व फोरेस्ट्स और उस से लगे हुए भागों की कंदराओं में प्रमुखता से पाए जाते हैं। शिकार के लिए अक्सर ये जंगलों के बीच के मैदानों को चुनते हैं, जबकि अपने निवास के लिए ये घने, एकांत इलाके के पहाड़ को चुनते हैं या फिर बड़े पेड़ों की जड़ों में गुफा बनाकर रहते हैं।


पारिवारिक व्यवहार: जंगली कुत्ते एक पत्नीक होते हैं, एक साथ झुंड बनाकर रहते हैं और प्रायः इनके प्रत्येक झुंड का एक मुखिया जोड़ा होता है जो बाकी सबको लीड करता है।

(अगर आपने फिल्म ‘मोगली’ या ‘जंगल बुक’ देखी है तो आपको ये झुंड तुरंत याद आया होगा) जब झुंड के बड़े सदस्य, मुखिया आदि शिकार पर जाते हैं तो बाकी नव वयस्क, झुंड के बच्चों की सुरक्षा का दायित्व निभाते हैं।


इनके झुंड  में 4 से लेकर 15-20 तक सदस्य होते हैं और कभी कभी छोटे बच्चों की संख्या 20-20 भी देखी जा सकती है। मार्च से सितंबर का समय इनका मेटिंग सीजन होता है और प्रजनन के लिए एक मादा 60-65 दिनों का समय लेती है।

एक मादा एक बार में चार से लेकर 10 pups को जन्म देती है जो कि जन्म के 8-10 सप्ताह बाद शिकार के लिए तैयार हो जाते हैं।

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घने-भरे जंगल, समुचित भोजन और शिकार की उपलब्धतता, जो हर वन्य प्रजाति की आवश्यकता है...

ये देखने में कुत्ता, भेड़िया और लोमड़ी का मिला-जुला रूप होते हैं। - फोटो : ब्रजेश सिंह

शिकार के तरीके: यदि आपने भेड़ियों को शिकार करते हुए देखा है तो जंगली कुत्तों को भी शिकार करते हुए कुछ-कुछ वैसा ही देखेंगे सिवाय इस बात के कि आक्रामक होते हुए भी कैसे खेल-खेल में शिकार किया जा सकता है। पूरा झुंड छोटे झुंडों बंटकर अलग-अलग दिशाओं से हमला करता है ताकि शिकार किसी भी दिशा में भाग ना सके, अपनी चपलता (agility) और गति का पूरा उपयोग करते हुए ये अपने शिकार को खूब दौड़ाते भी हैं और जब वो थककर चूर हो जाता है तो आसानी से शिकार कर लेते हैं। हिरण प्रजाति के सांभर, चीतल, नीलगाय आदि इनका प्रमुख भोजन हैं।



शारीरिक संरचना: ढोले देखने में कुत्ता, भेड़िया और लोमड़ी का मिला-जुला रूप होते हैं, इनका कद आम कुत्तों से छोटा ही होता है, पूंछ लोमड़ी की तरह गुच्छेदार होती है और थूथन (snout) व कान भेड़ियों जैसे।

हल्के भूरे से लेकर घने भूरे रंग तक की यात्रा इनके पैदा होने के साथ शुरू होती है, लेकिन कई बार इनका रंग इनके परिवेश और भौगोलिक क्षेत्र के अनुसार भी बदला देखा गया है।

एक जंगली कुत्ते-ढोले की औसत लम्बाई 90-95 सेमी की होती है उसमें पूंछ ही 40-45 सेमी की होती है। एक भरे पूरे ढोले का वजन 12-15 किलो के आसपास होता है।


आवश्यक पर्यावास: घने-भरे जंगल, समुचित भोजन और शिकार की उपलब्धतता, जो हर वन्य प्रजाति की आवश्यकता है वही वाइल्ड डॉग्स के लिए भी है, लगातार कम हो रहे जंगलों से चीतल-हिरण आदि भी कम हो रहे हैं और चूंकि एक वाइल्ड डॉग का वार्षिक भोजन लगभग 300-350 किलो मांस होता है तो इसका अभाव जंगलों में अतिक्रमण जौर कटाई आदि कारणों से बुरी तरह प्रभावित हुआ है।


(लेखक ब्रजेश सिंह वन्यजीव फोटोग्राफर हैं)


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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