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पंडित जसराज स्मृति शेष: अगर सुर सही नहीं लगता तो तानपूरे से ही पिटाई हो जाती!

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संगीत मार्तण्ड पंडित जसराज मुझे अपने प्रिय शिष्यों में शुमार करते थे। - फोटो : अमर उजाला
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आज मन बहुत विचलित है। मैं भाव विह्वल हूं। आंखों से अविरल बहती अश्रुधारा पर मेरा कोई बस नहीं है। काश कि आज मैं अपने गुरुजी की चरण वंदना कर पाता। मैं बहुत सौभाग्यशाली हूं कि मुझे पंडित जसराज जैसा गुरु मिला। जिनके संगीत संसार से जुड़ना, उसका अनुभव मात्र कर लेना मनुष्य के लिए अलौकिक अनुभूति होता है वो संगीत मार्तण्ड पंडित जसराज मुझे अपने प्रिय शिष्यों में शुमार करते थे इससे बढ़कर और क्या सौभाग्य हो सकता है।

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मैं उनके अनंत प्रेम की वर्षा में भीतर तक भींज गया - मन, आत्मा, विचार, भाव संगीत सबकुछ। उनके साथ इतनी यादें हैं की उसका कोई सिरा पकड़ पाना ही मेरे लिए मुश्किल है। खास तौर पर आज। भाव अवरुद्ध हैं। पर ये प्रयत्न इसलिए की मेरे गुरु को ये मेरी आदरांजलि है।


उन्होंने सिखाने से मना किया और मैं एकलव्य बन गया
बात 1990 की है। पंडित जसराज इंदौर के प्रख्यात शनि मंदिर में शनैश्चर जयंती समारोह में आए थे। मैं संगीत का अनुरागी, उनसे सीखने की ठान चुका था। उनसे मिला। सिखाने का आग्रह किया। उन्होंने साफ मना कर दिया। कहा मैं बहुत व्यस्त रहता हूंं, नहीं हो पाएगा, तुम यहां इंदौर में हो सब कैसे क्या होगा? तुम रहने दो। मेरे बहुत आग्रह पर भी वो नहीं माने। मेरा दिल बैठ गया। पर मैंने तो ठान लिया था। अपने रियाज के कक्ष में उनकी एक तस्वीर लगा ली और बस उसी को देख कर रियाज करता रहा। उनको खूब सुनता। अभ्यास करता। ये सिलसिला लगभग छ्ह साल तक चला।
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एक बार पता लगा महाराष्ट्र के अकोला में उनका कार्यक्रम है। मैं सुनने पहुंच गया। उनसे बात हुई। उन्होंने मुझे तानपूरा देकर मंच पर अपने साथ बैठा लिया। मेरी तो खुशी का जैसे कोई ठिकाना ही नहीं था। मौका मिलते ही उन्हें अपना संगीत सुनाया। वो बोले अरे ये तो हमारी ही तरह का है। मैंने तुरंत कहा - गुरुजी आप ही से तो सीखा है। वो बोले मैंने तो तुम्हें नहीं सिखाया। मैं तो अपने सब शिष्यों को याद रखता हूं। मैं अपने साथ वो चित्र ले गया था जिसे लगाकर मैं रियाज करता था। उन्हें दिखाया और सारी बात बताई। वो बहुत भावुक हो गए। बोले तुम लोग ऐसा क्यों करते हो। पर उस क्षण से मैं उनके करीब आता चला गया। मुझे एकलव्य की तरह हमेशा आश्रम के बाहर नहीं रहना पड़ा। उन्होंने मुझे अपना लिया और यही मेरा परम सौभाग्य है।

गुरुजी से लगातार मुलाकातें होती रहीं। - फोटो : अमर उजाला

जितने सहज, सरल और प्रेमी उतने ही कठोर उस्ताद भी! 
1999 के बाद तो उनसे लगातार मुलाक़ात होती रही। उनका असीम स्नेह और सान्निध्य मुझे मिला। वो आकंठ संगीत में डूबे रहते और उसी तरह अपने शिष्यों को सिखाते भी थे। उनके सिखाने का तरीका बहुत अनूठा था। आमने-सामने की गुरु शिष्य वाली पारंपरिक शिक्षा तो वो देते ही थे पर वो चलते-फिरते बात करते भी बहुत कुछ सीखा देते थे। वो हमेशा कहते कि मैं तो तुम्हारे रास्ते के कांटे हटाने का काम कर रहा हूं। जिन कांटों पर मैं चला और जो दर्द मैंने सहे वो तुम ना सहो यही मैं चाहता हूं।


वो गायन के नियम और रियाज को लेकर भी बहुत पक्के थे। मेरे शिक्षण के पहले दिन का ही वाकया है। वो मुझे राग भैरव का खयाल सिखा रहे थे। एक जगह पर मैं बार-बार अटक रहा था। मैं उस जगह को भर ही नहीं पा रहा था। जब 20-25 बार करने के बाद भी मुझे नहीं आया तो उन्होंने तानपूरा उठा लिया। मैं समझ गया कि अब सही नहीं गाया तो ये दे मारेंगे। वो उसी मुद्रा में खड़े भी हो गए। उस घबराहट में ही सही पर मैं उस जगह को गा गया। वो बोल पड़े - अच्छा तो तुम इस तरह से ही सीखोगे।


असीम स्नेह और अपनत्व
बहुत सी यादें हैं उनके साथ। क्या-क्या बताऊंं? वो एक बार जिसे शिष्य बनाते उसे फिर इस कदर अपनाते कि उसकी हर छोटी बात का भी खयाल रखते। मैं उन्हें अपने महत्वाकांक्षी आयोजन-इंदौर म्यूजिक फेस्टिवल के लिए निमंत्रित करने मुंबई गया था। इस बार उनका जो ड्राइवर आया था वो नया था। उसने मुझसे पूछा क्या आप इंदौर से हैं? मैंने कहा- हांं। तो वो बोला क्या आपकी बेटी का नाम सानिका है? 

मैं आश्चर्य में पड़ गया कि इन्हें कैसे पता। तब उसने किस्सा बताया- कल ही जब हम मुंबई की गलियों से गुजर रहे थे तो एक गाड़ी के पीछे लिखा था- सानिक - तब उन्होंने हम सब जो गाड़ी में थे उनसे पूछा कि तुम सबको सानिका का मतलब पता है? फिर उन्होंने ही बताया कि सानिका का मतलब है कृष्ण की बांसुरी। इंदौर में मेरा एक प्रिय शिष्य  है गौतम। उसकी बेटी का नाम है सानिका, मतलब उनका प्रेम सिर्फ सामने या दिखाने के लिए नहीं है। वो पूरे परिवार को अपना लेते हैं। अभी जनवरी में ही मेरी पत्नी अदिति के जन्मदिन पर उन्होंने वीडियो कॉल पर बात की थी। तब वो बड़ौदा में थे।

 

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पंडित जसराज ने मुझे अपार स्नेह और प्रेम दिया। - फोटो : अमर उजाला
हवाई अड्डे पर बंदिश सीखा दी!!
वो जब भी इंदौर आते तो घर का ही खाना खाते थे। बाहर का खाना तो वो यों भी नहीं खाते थे। पर इंदौर में हों तो अदिति के हाथ का खाना ही उन्हें पसंद था। अभी पिछले उज्जैन के सिंहस्थ में जब वो आए तो इंदौर से उनकी फ्लाइट लेट हो गई। मैं और अदिति टिफिन लेकर एयरपोर्ट पहुंचे। तो वहीं एयरपोर्ट के प्रतीक्षालय (वेटिंग लाउंज) में ही बातचीत के बीच उन्होंने पूछा - कोई कागज है तुम्हारे पास? मैंने कहा हांं गुरुजी, है। तो उन्होंने कहा कि लिखो। मैं लिखने लगा। पर कुछ समझ नहीं पाया। वो बोले - ये राग बहार है। मैं चौंक गया। मैं बोला कि पर गुरुजी वो तो मुझे आता नहीं, वो तपाक से बोले तभी तो सिखा रहा हूं।

इसी तरह गुरुजी से इतना सीखने को मिला कि वो सब मेरी धरोहर है। उसको साधना ही मेरा लक्ष्य है। मेरा सौभाग्य है कि सुनील बुद्धिराजा की पुस्तक - रसराज-जसराज में उनकी शिष्यावली में मैं उपस्थित हूं। इसे निभा पाने का प्रयत्न ही संगीत है और जीवन है।

एक महत्वपूर्ण बात जो पंडितजी ने कही और जिसे मैं जीवन भर नहीं भुला सकता- वो ये की चाहे खुद बिक जाओ पर ये हमेशा ध्यान रखो कि अपने घर से किसी कलाकार को नाराज होकर कभी मत जाने दो।

मैं इसका पालन करने का प्रयत्न सदैव करुंंगा। इससे ये पता चलता है कि वो किस मयार के कलाकार थे। कला और कलाकार को वो कितना अधिक सम्मान देते थे। ऐसे सरस्वती पुत्र को पाकर हम सभी धन्य हुए। मैं अपने गुरुवर को शत-शत नमन करता हूं, उन्हें विनम्र आदरांजलि अर्पित करता हूं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 
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