गुरुजी से लगातार मुलाकातें होती रहीं।
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जितने सहज, सरल और प्रेमी उतने ही कठोर उस्ताद भी!
1999 के बाद तो उनसे लगातार मुलाक़ात होती रही। उनका असीम स्नेह और सान्निध्य मुझे मिला। वो आकंठ संगीत में डूबे रहते और उसी तरह अपने शिष्यों को सिखाते भी थे। उनके सिखाने का तरीका बहुत अनूठा था। आमने-सामने की गुरु शिष्य वाली पारंपरिक शिक्षा तो वो देते ही थे पर वो चलते-फिरते बात करते भी बहुत कुछ सीखा देते थे। वो हमेशा कहते कि मैं तो तुम्हारे रास्ते के कांटे हटाने का काम कर रहा हूं। जिन कांटों पर मैं चला और जो दर्द मैंने सहे वो तुम ना सहो यही मैं चाहता हूं।
वो गायन के नियम और रियाज को लेकर भी बहुत पक्के थे। मेरे शिक्षण के पहले दिन का ही वाकया है। वो मुझे राग भैरव का खयाल सिखा रहे थे। एक जगह पर मैं बार-बार अटक रहा था। मैं उस जगह को भर ही नहीं पा रहा था। जब 20-25 बार करने के बाद भी मुझे नहीं आया तो उन्होंने तानपूरा उठा लिया। मैं समझ गया कि अब सही नहीं गाया तो ये दे मारेंगे। वो उसी मुद्रा में खड़े भी हो गए। उस घबराहट में ही सही पर मैं उस जगह को गा गया। वो बोल पड़े - अच्छा तो तुम इस तरह से ही सीखोगे।
असीम स्नेह और अपनत्व
बहुत सी यादें हैं उनके साथ। क्या-क्या बताऊंं? वो एक बार जिसे शिष्य बनाते उसे फिर इस कदर अपनाते कि उसकी हर छोटी बात का भी खयाल रखते। मैं उन्हें अपने महत्वाकांक्षी आयोजन-इंदौर म्यूजिक फेस्टिवल के लिए निमंत्रित करने मुंबई गया था। इस बार उनका जो ड्राइवर आया था वो नया था। उसने मुझसे पूछा क्या आप इंदौर से हैं? मैंने कहा- हांं। तो वो बोला क्या आपकी बेटी का नाम सानिका है?
मैं आश्चर्य में पड़ गया कि इन्हें कैसे पता। तब उसने किस्सा बताया- कल ही जब हम मुंबई की गलियों से गुजर रहे थे तो एक गाड़ी के पीछे लिखा था- सानिक - तब उन्होंने हम सब जो गाड़ी में थे उनसे पूछा कि तुम सबको सानिका का मतलब पता है? फिर उन्होंने ही बताया कि सानिका का मतलब है कृष्ण की बांसुरी। इंदौर में मेरा एक प्रिय शिष्य है गौतम। उसकी बेटी का नाम है सानिका, मतलब उनका प्रेम सिर्फ सामने या दिखाने के लिए नहीं है। वो पूरे परिवार को अपना लेते हैं। अभी जनवरी में ही मेरी पत्नी अदिति के जन्मदिन पर उन्होंने वीडियो कॉल पर बात की थी। तब वो बड़ौदा में थे।
पंडित जसराज ने मुझे अपार स्नेह और प्रेम दिया।
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हवाई अड्डे पर बंदिश सीखा दी!!
वो जब भी इंदौर आते तो घर का ही खाना खाते थे। बाहर का खाना तो वो यों भी नहीं खाते थे। पर इंदौर में हों तो अदिति के हाथ का खाना ही उन्हें पसंद था। अभी पिछले उज्जैन के सिंहस्थ में जब वो आए तो इंदौर से उनकी फ्लाइट लेट हो गई। मैं और अदिति टिफिन लेकर एयरपोर्ट पहुंचे। तो वहीं एयरपोर्ट के प्रतीक्षालय (वेटिंग लाउंज) में ही बातचीत के बीच उन्होंने पूछा - कोई कागज है तुम्हारे पास? मैंने कहा हांं गुरुजी, है। तो उन्होंने कहा कि लिखो। मैं लिखने लगा। पर कुछ समझ नहीं पाया। वो बोले - ये राग बहार है। मैं चौंक गया। मैं बोला कि पर गुरुजी वो तो मुझे आता नहीं, वो तपाक से बोले तभी तो सिखा रहा हूं।
इसी तरह गुरुजी से इतना सीखने को मिला कि वो सब मेरी धरोहर है। उसको साधना ही मेरा लक्ष्य है। मेरा सौभाग्य है कि सुनील बुद्धिराजा की पुस्तक - रसराज-जसराज में उनकी शिष्यावली में मैं उपस्थित हूं। इसे निभा पाने का प्रयत्न ही संगीत है और जीवन है।
एक महत्वपूर्ण बात जो पंडितजी ने कही और जिसे मैं जीवन भर नहीं भुला सकता- वो ये की चाहे खुद बिक जाओ पर ये हमेशा ध्यान रखो कि अपने घर से किसी कलाकार को नाराज होकर कभी मत जाने दो।
मैं इसका पालन करने का प्रयत्न सदैव करुंंगा। इससे ये पता चलता है कि वो किस मयार के कलाकार थे। कला और कलाकार को वो कितना अधिक सम्मान देते थे। ऐसे सरस्वती पुत्र को पाकर हम सभी धन्य हुए। मैं अपने गुरुवर को शत-शत नमन करता हूं, उन्हें विनम्र आदरांजलि अर्पित करता हूं।
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