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विश्व दुग्ध दिवस 2020: जैविक दुग्ध उत्पादन से रोजगार और स्वास्थ्य दोनों पर पड़ेगा अनुकूल प्रभाव

सार

  • एक जून को विश्व दुग्ध दिवस के रूप में मनाया जाता है।
  • जैविक का मतलब है सौ फीसदी प्राकृतिक।
  • जैविक दूध के उत्पादन के लिए विशेष तरह के डेयरी फार्म की आवश्यकता होती है।
  • देसी गाय के दूध पीने से कैंसर रोग का खतरा नहीं के बराबर होता है।
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एक जून को विश्व दुग्ध दिवस के रूप में मनाया जाता है। - फोटो : Pixabay
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विस्तार
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एक जून को विश्व दुग्ध दिवस के रूप में मनाया जाता है। कोरोना संक्रमण से उत्पन्न महामारी ने साबित कर दिया है कि आने वाले समय में दुनिया के मानवता के सामने दो बड़ी समस्या आने वाली है। एक रोजगार का संकट और दूसरा विषाणुजन्य महामारी का उभार।

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इन दोनों समस्याओं को लेकर दुनिया के वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री और राजनीतिक-सामाजिक चिंतक बेहद तसल्ली से चिंतन कर रहे हैं। उन्हें इन दोनों समस्याओं का समाधान नहीं मिल पा रहा है। सच पूछिए तो भारत के देसी प्रबंधन प्रणाली और स्थानीय सामाजिक संरचना में इसका समाधान ढूंढा जा सकता है।

इसे थोड़ा आधुनिक विज्ञान की मदद से और ज्यादा उत्तम बनाया जा सकता है। इस क्षेत्र में देसी गोवंश और जैविक दुग्ध उत्पादन को हथियार के रूप में उपयोग किया जा सकता है। कोरोना काल में बेरोजगारी की समस्या जो उत्पन्न हुई है इसके लिए भी यह उपयोगी साधन साबित हो सकता है।
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जैविक का मतलब है सौ फीसदी प्राकृतिक, यानी जिस चीज के उत्पादन में किसी भी प्रकार के रासायनिक वस्तु का इस्तेमाल नहीं किया जाता हो। जैविक दूध प्राप्त करने के लिए पशुओं को ऐसा चारा खिलाया जाता है, जिसका उत्पादन जैविक खाद से किया जाता है। जिसमें कोई रासायनिक कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं किया जाता हों। इसके साथ ही जानवरों के इलाज के लिए भी किसी तरह के अंग्रेजी दवाओं, जैसे ऐंटीबायोटिक वगैरह का उपयोग नहीं किया जाता हो। हालांकि रोग से बचाव के लिए वैक्सीन का इस्तेमाल किया जा सकता है।

जैविक दूध के उत्पादन के लिए विशेष तरह के डेयरी फार्म की आवश्यकता होती है। यहां के एक हिस्से में पशुओं को रखने का इंतेजाम होता है। वहीं फार्म के एक बड़े हिस्से में जैविक चारा का उत्पादन किया जाता है।

इन डेयरी फार्मो में पशुओं को रेडीमेड पशु आहार नहीं खिलाया जाता है। बल्कि फार्म में पैदा किया गया पौष्टिक एवं जैविक चारा खिलाया जाता है। इन फार्मो में गायों को बांधकर नहीं रखा जाता, बल्कि इन्हें स्वछंद रूप से घूमने दिया जाता है।

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देसी गायों पर इन दिनों खूब प्रयोग हो रहा है.....

जैविक दूध सेहत के लिए काफी फायदेमंद है। - फोटो : Pixabay
जैविक दूध सेहत के लिए काफी फायदेमंद है। शोध से पता चला है कि जैविक चारा खाने वाली गायों के दूध पीने से शरीर में पॉलीअनसैचुरेटेड वसा में इजाफा होता है। जैविक दूध में बढ़िया कोलेस्ट्रोल की
मात्रा सामान्य दूध से दोगुनी ज्यादा होती है।

एक रिपोर्ट के अनुसार देशी गाय के दूध में ओमेगा थ्री मौजूद होता है। जिससे हार्ट, डाइबिटीज, कैंसर जैसी बीमारियांं दूर होती हैंं। बच्चों के दिमाग के विकास के लिए भी देसी गाय का दूध लाभदायक मानाा जाता है।

देसी गायों पर इन दिनों खूब प्रयोग हो रहा है। इस मामले में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची के वेटनरी संकाय द्वारा संचालित पशु प्रसार शिक्षा विभाग के गव्य प्रक्षेत्र ईकाई के प्रभारी, डॉ. आलोक कुमार पांडेय बताते हैं कि देसी गाय की पीठ पर मोटा सा हम्प होता है। जिसमें सूर्यकेतु नाड़ी होती है, जो सूर्य के किरणों के संपर्क में आते ही दूध में स्वर्ण का प्रभाव छोड़ती है। इससे देसी गाय के दूध में स्वर्ण तत्व की मात्रा बढ़ जाती है। देसी गाय के दूध पीने से कैंसर रोग का खतरा नहीं के बराबर होता है।
 
आंकड़े बताते हैं कि केवल झारखंड राज्य में 38 लाख ब्रीडेबल गो वंशीय पशु हैं, जिसमें लगभग 35 लाख देशी किस्म की हैं जिनका दूध प्राकृतिक रूप से मनुष्यों के लिए बहुुत फायदेमंद है। पूरे देश की यदि बात करें तो यह संख्या करोड़ों में होगी।

इन पशुओं को केवल चराकर या पुआल कुट्टी एवं जंगलो से प्राप्त घास खिला कर रखा जाता है। पशुओं के बीमार होने की स्थिति में इन्हें देसी चिकित्सा प्रणाली यानि औषधीय पौधों से इलाज किया जाता है। ज्यादा समय तक ठीक नहीं होने या जटिल बीमारियों के लिए पशु चिकित्सक के पास ले जाया जाता है।

डॉ. पांडेय ने बताया कि देसी गाय की दूध उत्पादन क्षमता बहुुत कम होती है और राज्य में हरे चारे की लगभग 55 प्रतिशत कमी है। पशुओं को उत्तम गुणवत्ता वाले चारे को खिलने से पशुओं की उत्पादकता में काफी सुधार आता है।

अत: राज्य में जैविक हरे चारे के व्यापक पैमाने पर उत्पादन की आवश्यकता है। देशी नस्ल के पशुओं के नस्ल सुधार हेतु विदेशी पशुओं (होल्स्टीन फ्रीजियन एवं जर्सी) के स्थान पर रेड सिन्धी, गीर, साहीवाल, थारपारकर के सांढो के वीर्य का इस्तेमाल किया जाए तो ज्यादा उपयोगी साबित होगा। इसके अलावा पशुओं के चिकित्सा हेतु आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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