हिंदी सीखने-समझने की चाह
जिस संस्था के लिए मैं काम करती थी, एक बार वहां के क्रिएटिव डायरेक्टर, जो कि मूल रूप से इजिप्ट के रहने वाले थे, ने गुरु शब्द पर लंबी चर्चा की। वो जानना चाहते थे कि आखिर गुरु शब्द का प्रयोग कब और किसके लिए करना उचित है? दरअसल वे एक ब्रांड में जो कि शिक्षा संबंधी सेवाओं से संबंधित था, हिंदी के इस शब्द का प्रयोग करना चाह रहे थे। उनसे चर्चा करने के बाद इस बात की खुशी हुई कि जिस व्यक्ति ने हिंदुस्तान की जमीं पर कभी पैर नहीं रखा, वो हिंदी के एक शब्द पर विस्तार से चर्चा कर रहा है।
इसी तरह की हैरानी एक अन्य सहकर्मी की बातों से हुई जब उसने बाप शब्द के बारे में पूछा, वो मूलत: अल्जीरिया की निवासी थी और अल्जीरिया से नौकरी करने दुबई पहुंची थी। बाप शब्द उसने हिंदी फिल्मों में सुना था, हालांकि उसे हिंदी नहीं आती थी लेकिन हिंदी फिल्मों के शौक ने उसकी पहचान कुछ शब्दों से करवा दी थी।
खैर, यह सब तो बहुत व्यक्तिगत उदाहरण हैं। पिछले दिनों किसी काम के सिलसिले में दुबई स्थित अमेरिकी दूतावास में जाने का मौका मिला। वहां बड़ी संख्या में अमेरिकी वीजा के लिए आवेदन कर चुके, भारतीय मूल के आवेदनकर्ता मौजूद थे। आवेदनकर्ताओं को निर्देश देने के लिए टीवी स्क्रीन पर कुछ वीडियो चल रहे थे। ये वीडियो एक बार अंग्रेजी, दूसरी बार अरबी और तीसरी बार हिंदी में चलते थे और फिर इसी क्रम में उनकी पुनरावृत्ति होती थी। यह भी अपने आप में मजेदार था एक देश, किसी अन्य देश में अपने दूतावास में हिंदी में निर्देश जारी कर रहा था। कारण भी साफ था, बड़ी संख्या में भारतीय आवेदनकर्ताओं की मौजूदगी।
दुबई के कुछ इलाकों में आप पैदल सैर पर निकलेंगे तो रेस्तरां के नाम में हिंदी ही हिंदी पाएंगे मसलन रसोईघर, राजधानी, भूक्कड़, छप्पन भोग, महाराजा भोज। यह महज कुछ उदाहरण है जो बताते हैं कि हिंदी अब हिंदुस्तान की सीमाओं से बाहर भी खिलखिलाती है, मुस्कुराती है।
हिंदी में ही एक कहावत है, घर की मुर्गी दाल बराबर। हमें बस इसी बात पर गौर करना होगा कि हम अपने ही घर में अपनी भाषा की उपेक्षा ना कर बैठें। कुछ दिनों पहले की बात है मुंबई से कुछ दोस्त परिवार के साथ दुबई घूमने आए थे, हमारे घर में भी आए। भोजन परोसते वक्त मैंने ग्यारह साल की एक बच्ची से पूछ लिया, बेटा अचार लोगे? उसे समझ नहीं आया। तुरंत उसकी मां बोल उठी, पिकल लेगी बेटा, पिकल। फिर मेरी ओर देखकर बोली, इसे हिंदी नहीं आती।
मुझे थोड़ी हैरानी हुई क्योंकि अचार, चटनी, पापड बड़े सामान्य से रोजमर्रा के शब्द हैं। अगर ये शब्द नई पीढ़ी के शब्दकोष से हट रहे हैं यानी कि हिंदी अपने ही घर में उपेक्षित बुजुर्ग सी होने की ओर बढ़ रही है।
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