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भूरागढ़ का किला: राजकुमारी सोनालिका और बहादुर नट की अमर प्रेम कहानी

सार

वर्तमान बांदा जिले (उत्तर प्रदेश) में केन नदी के किनारे भूरागढ़ नामक स्थान है, वहां मौजूद है खंडहर में तब्दील हो चुका एक "ऐतिहासिक किला" जो अपनी दीवारों में शौर्य की कई गाथाएं समेटे हुए है। शौर्य और वीरता की अंगिनत कहानियों के बीच "मोहब्बत की एक सुनहरी दास्तान भी उसी किले में दर्ज है।"
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राजकुमारी सोनालिका और बहादुर नट की प्रेम कहानी अमर हो गई - फोटो : Fcebook/shorturl.at/ptuvB
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विस्तार
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इतिहास के पन्नों में दफन अनगिनत कहानियां! कहानियों में पिरोया हुआ प्रेम, मानों संसार में प्रेम का आरंभ मात्र होता है! इनके किरदार मरते नहीं वे जीवित रहते हैं आने वाली पीढ़ियों के नायक नायिका बनकर। दुनिया के एक छोर से दूसरे छोर तक आज भी मौजूद हैं ऐसे कई वीरान खंडहर जिनकी बुलंद दीवारों पर लिखा गया था अटूट प्रेम... बेशक! आज ये इमारतें खंडहर में तब्दील हो चुकी हों लेकिन उन्हें देख ऐसा लगता है जैसे अब भी ये वीरान किले, ये जमींदोज इमारतें, हर रोज प्रेम में जिंदा हो उठती हों। खंडहरों के बीच मौजूद कब्रों में पसरा सन्नाटा, सन्नाटे को चीरती प्रेम में डूबी कहानियां दोहराई जाती हैं आज भी कई छोटे-छोटे किस्सों और लोक गीतों के माध्यम से।

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इतिहास के पन्नों में जीवित कुछ ऐसी ही असाधारण कहानी है वीरन उर्फ़ बहादुर नट और राजकुमारी सुनालिका की जिनके प्रेम को आज भी भूरागढ़ किले के विशाल खंडहर में महसूस किया जा सकता है...

कहते हैं इस घटना को गुजरे लगभग 600 साल बीत चुके हैं।
 

वर्तमान बांदा जिले (उत्तर प्रदेश) में केन नदी के किनारे भूरागढ़ नामक स्थान है, वहां मौजूद है खंडहर में तब्दील हो चुका एक "ऐतिहासिक किला" जो अपनी दीवारों में शौर्य की कई गाथाएं समेटे हुए है। शौर्य और वीरता की अंगिनत कहानियों के बीच "मोहब्बत की एक सुनहरी दास्तान भी उसी किले में दर्ज है।"

        

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"वीरन उर्फ़ बहादुर नट और राजकुमारी सुनालिका की अमर प्रेम कहानी" जो आज भी प्रेमियों के लिए अमर प्रेम गाथा है। 

बात कुछ ऐसी है

बात उस समय की है जब भूरागढ़ के किले का किलेदार था नोने अर्जुन सिंह जो किले की देख रेख कर उसे सुरक्षित रखता था साथ ही गांव के लोगों के बीच राजा की भूमिका का निर्वाह करता था। कहते हैं की राजा अर्जुन सिंह के विवाह के कई वर्ष बीत जाने के बाद भी कोई संतान न हुई। धन-धान्य से संपन्नता होने के बाद भी राजा बहुत दुःखी रहता, दूर-दूर तक मन्नते और पूजा आदि का भी कोई हल न निकला। किले की सेवा में एक नट जाति का सेवक रहता था जो मां काली का भक्त था, उसने राजा के लिए मां काली से प्रार्थना की...कहते हैं उसकी प्रार्थना के असर से ही राजा के घर एक कन्या ने जन्म लिया। "जिसका नाम रखा गया सोनालिका"। 

नट के भी एक छोटा बालक था "वीरन उर्फ़ बहादुर"। जिसका बचपन पिता से तंत्र विद्या की सीख ले किले के प्रांगण में खेल कूद कर गुजर रहा था। राजमहल के बच्चों के साथ वह बेखौफ खेलता था। 

बचपन अमीरी का कोई खाका कहां खींच पाता है। दिन गुजरते गए दोनों बच्चें बड़े होते गए। 
            
राजकुमारी को महल से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी। 
  
उसकी सुरक्षा हेतु राजा ने पुखता इंतजाम किये थे। महल के अंदर ही उसकी पूरी दुनिया समाई हुई थी। 

किले के झरोखे से जब वह नदी में तैरती नावों को देखती तो अकसर जिद करती नाव चलाने की। 

राजा का मन भी पुत्री प्रेम पर विवश अपने पुत्री की हर इच्छा पूरी करने के लिए युद्ध करता रहता था। 

एक दिन राजा ने दरबार में घोषणा करवाई की एक कुशल नाविक जो राजकुमारी को नाव खेना सिखा सके हाजिर किया जाए। पूरे गांव में खोज शुरू हुई। एक कुशल और पारंगत नाविक को राजकुमारी को नाव चलाना सिखाने के लिए नियुक्त किया गया। 

राजकुमारी अपनी विश्वास पात्र सहेलियों के साथ प्रतिदिन उत्साह से केन नदी की अटखेलियों के बीच, अपने स्वप्न को जीने लगी। हर रोज इसी बहाने वह महल की चारदीवारी से बाहर प्रकृति की गोद में अपने बचपन और यौवन की मध्य की बेला का आनंद ले पाती। 
         
राजकुमारी का चंचल मन कभी मछलियों के साथ तैरने का साहस भरता तो कभी लहरों से साथ प्रतिस्पर्धा की जिद करता। 
            
कई दिन गुजर गए
  
एक दिन नदी पार करते समय अचानक राजकुमारी की नाव, (नदी के किनारे पर पहुंचने से पहले ही) मगरमच्छ से टकरा गयी। इससे पहले की राजकुमारी कुछ समझ पाती मगरमच्छ ने उसका हाथ अपने जबड़े में जकड़ लिया और उसे नदी में गिरा दिया... 

यह दृश्य पास ही खड़ा बहादुर नट देख रहा था जो नदी में गोता लगाने की तैयारी कर रहा था। 
उसने फौरन ही पास रखी अपनी कटार उठाई और नदी में छलांग लगा दी..

                    

राजकुमारी को बचाने के लिए उसने अपनी कटार से मगरमच्छ के जबड़े पर जोर से प्रहार किया!! कटार मगरमच्छ के जबड़े में फंसा छोड़ वह राजकुमारी को सुरक्षित नदी से निकाल लाया और स्वम् राजकुमारी और उसकी सहेलियों को महल तक छोड़ने गया। 

तब तक राजा को इस घटना की सूचना मिल चुकी थी। राजा राजदरबार में बहादुर की बहुत प्रसन्नता करता है और उसे पुरस्कार देता है। वह कहता है- "तुम सच में अपने नाम की भाँति बहादुर हो!"
               
मगरमच्छ के हमले से राजकुमारी घायल हो जाती है उसके उपचार के लिए दूर-दूर से वैध बुलाये जाते हैं। धीरे धीरे राजकुमारी का स्वास्थ बेहतर होने लगता है। वह अपने सामान्य जीवन पर लौटने लगती है। 

अपितु राजकुमारी सोनालिका के ऊपर से संकट के बादल दूर नहीं होते...
    
कुछ समय बाद फिर राजकुमारी एक हादसे का शिकार हो जाती है।
शायद नियति राजकुमारी सोनालिका और बहादुर नट की अमर प्रेम कहानी को रचने की पृष्ठभूमि तैयार कर रही थी। 
        
महल में चारों तरफ वीरन की बहादुरी के चर्चे सुन राजकुमारी बहादुर नट की दिलेरी से बहुत प्रभावित थी। कौन जानता था? कि दोनों में अटूट प्रेम पलने जा रहा था... 
    
एक दिन राजकुमारी अपनी सहेलियों के साथ शिव मंदिर जाने की इच्छा राजा के समक्ष करती है। राजा की आज्ञा मिलते ही राजकुमारी के जाने का प्रबंध किया जाता है। 
         
राजकुमारी शिव मंदिर में पहुंच परिक्रमा की तैयारी में व्यस्त थी जैसे ही वह परिक्रमा आरंभ करती है एक विषैला सांप राजकुमारी के पैर में काट लेता है। राजकुमारी जोर से चिल्लाती है उसकी चीख सुन उसके अंगरक्षक उसके आ जाते हैं। वहां मौजूद लोगों और उसकी सहेलियों में अफरा तफरी मच जाती है। 

राजकुमारी पर जहर का असर तेजी से दिखने लगता है उसका शरीर नीला पड़ने लगता है। राजा के पास खबर पहुंचाई जाती है। राजा मंदिर में पहुंच, राजकुमारी को महल लाने का प्रबंध करने को कहता है लेकिन मंदिर का पुजारी उसे मना कर देता है। वह उसे मंदिर में ही रुक कर उसके इलाज की व्यवस्था करने को कहता है वह राजा को बतलाता है- की यह सांप मंदिर में ही रहता है यदि कोई अपनी तंत्र विद्या से इस सांप को विवश करे की वह राजकुमारी का जहर चूस ले तो राजकुमारी स्वस्थ हो जायेगी। 
    
राजा पूरे राज्य में मुनादी करवाता है की राजकुमारी की जान बचाने के लिए जो भी अपनी तंत्र विद्या में सफल होगा उसे राजा मुंह मांगा पुरस्कार देंगे। 

पूरे गांव में राजकुमारी के अस्वस्थ होने की खबर जंगल में आग की तरह फैल जाती है। 
  
सभी राजकुमारी के स्वस्थ होने की प्रार्थना करने लगते हैं। जैसे ही खबर बहादुर को मिलती है तो वह अपने गुरु (जो उसके पिता ही थे) से आज्ञा लेकर मंदिर की ओर चल पड़ता है।  
   
वीरन राजा से कहता है की, "वह अपनी विद्या से उस सांप को बुला लेगा बस राजा उसे अपनी कला आजमाने का मौका दें।"
   
राजा के लिए तो बस राजकुमारी का स्वस्थ होना जरूरी था..
 
वह मंदिर परिसर से लोगों की भीड़ को दूर जाने के लिए कहता है और वीरन को अपनी विद्या आजमाने को कहता है! 
   
वीरन मां काली का भक्त था वह कई घंटे लगातार तपस्या करता है और फिर अचानक झाड़ियों के बीच से वही सांप तेजी से आते हुए दिखाई देता है। 
     
वीरन अपनी तपस्या जारी रखता है और मंत्र से राजकुमारी के पांव में घेरा बना देता है। 
    
सांप राजकुमारी के पांव के उसी हिस्से में जहां उसने काटा था अपने मुख से सारा जहर निकाल लेता है। सांप वापस लौट जाता है और राजकुमारी को धीरे धीरे होश आने लगता है। होश में आने के बाद उसे पता चलता है की बहादुर ने एक बार फिर उसकी जान बचाई है तो वह अत्यंत प्रसन्न होती है और मन ही मन बहादुर को अपना मित्र मान लेती है। 
   
अब अक्सर राजकुमारी जब भी बाहर जाती बहादुर उसके साथ जाता। राजा को भी दोनों के साथ रहने से कोई गुरेज न रहा। समय गुजरता गया और दोस्ती प्रेम में परिवर्तित होने लगी। 
   
मित्रता और प्रेम में बहुत छोटा सा फ़ासला होता है और ये फासला धीरे धीरे कम होने लगा। 
   
उधर राजा को भी अपनी बेटी के विवाह की चिंता सताने लगी। वह दूसरे राज्यों के राजकुमारों की कुंडली मिलवाने लगे।
    
राजकुमारी सोनालिका बहुत सुंदर थी। कोई भी राज्य का राजकुमार आसानी से उससे विवाह कर लेता। 
 
परंतु राजकुमारी वीरन से प्रेम करने लगी थी और प्रेम भी अटूट विश्वास के साथ परवान चढ़ा चुका था। 

जैसे ही राजकुमारी को इस बात का पता चला की महल में उसके विवाह की तैयारियां हो रही हैं, उसने वीरन को संदेश भिजवा दिया की वह केवल उसी से विवाह करेगी अन्यथा अपने प्राण त्याग देगी। वीरन भी उससे बहुत प्रेम करता था। उसने राजकुमारी से धैर्य रखने को कहा और स्वयं कोई रास्ता खोजने की बात की। 
   
वीरन को याद था राजा ने उसे वचन दिया था की वह उसकी एक इच्छा पूरी करेंगे। 

वह राजा के दरबार में उपस्थित हुआ और दरबार में राजा से अपने दिये गए वचन को पूरा करने को कहता है। राजा बड़े ही शांत मन से पूछता है- बोलो क्या चाहिए तुम्हें बहादुर?,, मुझे याद है मैंने तुम्हारी एक इच्छा पूरी करने का वचन दिया था!! 

बहादुर कहता है- "राजकुमारी सोनालिका का विवाह मेरे साथ कर दीजिये महाराज",,, हम दोनों एक दूसरे से बहुत प्रेम करते हैं! 
राजा आग बबूला हो जाता है,,, अपने सैनिकों से बहादुर को कैद करने का आदेश दे देता है! 
    
बहादुर सैनिकों को ढकेलता हुआ राजा से कहता है- यही है आपका न्याय?
     
आपने ही मुझे वचन दिया था। अब आप ही अपना वचन निभाने से मुकर रहे हैं। भले ही आप मुझे काल कोठरी में डाल दें लेकिन इससे सत्य नहीं बदल जायेगा। आप अपना वचन पूरा करें महाराज?
    
राजकुमारी सोनालिका को जैसे ही पता चलता है कि बहादुर को राजा कैद करने का आदेश सुना चुके हैं तो वह भी दरबार में आकर राजा से प्रार्थना करती है की- वह भी आधे दंड की सहभागी है। उसे भी वही दंड मिलना चाहिए जो बहादुर को मिला है... क्यों की वह भी बहादुर से उतना ही प्रेम करती है जितना बहादुर उससे.... 

राजा अपनी पुत्री से बहुत प्रेम करता था। वह उसे दुःखी नहीं देख सकता था। 
इसलिए उसने कोई और रास्ता खोजा.... 
राजा ने बहादुर को छोड़ने का आदेश दे दिया!! 

उसने बहादुर से कहा- ठीक है यदि तुम मेरी एक शर्त पूरी करोगे, तो मैं राजकुमारी का विवाह तुम्हारे साथ करने को तैयार हूँ!! 
बहादुर ने पूछा- कैसी शर्त महाराज? 
    
राजा ने कहा- "यदि तुम केन नदी के एक सिरे से दूसरे सिरे तक कच्चे सूत के धागे पर चलकर नदी पार कर लेते हो और महल तक पहुंच जाते हो,,,तो मैं राजकुमारी सोनालिका का विवाह तुम्हारे साथ कर दूंगा और यदि कोई और भी इस शर्त को पूरा करता है तो राजकुमारी का विवाह उसके साथ कर दिया जायेगा"!!!!!!! 

सोनालिका चिल्लाती है ये कैसी शर्त है पिता जी??

बहादुर नट ने अपने पूर्वजों की तरह काली मां की बरसों तपस्या करके जो तंत्र विद्या प्राप्त की थी उस पर उसे पूरा भरोसा था। 
 उसने राजा का प्रस्ताव मान लिया!!!
    
केन नदी पार करने का दिन तय किया गया। जनवरी माह में "मकर संक्रान्ति का दिन"!!! 

बहादुर नट ने राजकुमारी को विश्वास दिलाया कि वह इस परीक्षा में निश्चित ही सफल होगा। माँ काली का उस पर आशीर्वाद है... 

राजकुमारी का मन भयभीत था... 
    
बहादुर, काली के मंदिर में साधना में जुट गया। उसने माँ की बचपन से सेवा की थी। अब तक ऐसा कोई भी काम न था जिसे वह पूरा न कर सका हो। इसी विश्वास के साथ काली मां के आशीर्वाद से वह ऐसा सूत का धागा तैयार करता है जिसे सहज कोई काट नहीं सकता था और न ही कोई नष्ट कर सकता था। 

वह अपनी पूरी तैयारी के साथ मकर संक्रान्ति के दिन केन नदी पार करने की योजना बनाता है। 

पूरा गांव केन के किनारे आकर सिमट जाता है। सभी बहादुर की विजय की प्रार्थना करते हैं। 

राजा भी जानता था कि बहादुर को हराना असंभव है। इसलिए उसने अपने गुप्तचरों को बहादुर की विद्या का तोड़ ढूंढने के लिए चारों तरफ फैला दिया। उसके गुप्तचरों ने उसे बताया की केवल मोची की रापी से ही उस सूट को काटा जा सकता है। 

आखिर मकर संक्रान्ति का दिन आ गया और केन नदी के एक सिरे से दूसरे सिरे तक उस सूत के धागे को बांधा गया। नदी के इस किनारे महल की छत पर राजकुमारी सोनालिका वरमाला लिए बहादुर का इंतेजार कर रही थी। 

बहादुर भी अपनी पूरी विद्या के बल पर उस धागे से नदी पार करने को चल पड़ा। 
    
नदी पूरे उफान पर थी... सभी की सांसें थमी हुई थी...
        
लोग बहादुर के लिए प्रार्थना कर रहे थे। सोनालिका ने भी व्रत रखा था। 

बहादुर बिना रुके नदी को पार करता चला जा रहा था। आधी से ज्यादा नदी पार हो चुकी थी। 

राजकुमारी का उत्साह बढ़ता जा रहा था... 

बस थोड़ी ही दूर का रास्ता बचा था तभी राजा ने अपने सेनापति को इशारा किया..... 

सेनापति ने मोची की रापी से उस सूत के धागे को काट दिया... 

बहादुर महल के सिरे पर पहुंचने ही वाला था की धागा कट जाता है और वह नदी के तेज बहाव में समा जाता है.... 

सोनालिका सब देख रही थी। अपने पिता के छल से वह बहुत दुखी हुई और राजमहल को हमेशा वीरान रहने का श्राप देते हुए उसने भी नदी में छलांग लगा दी... 

राजकुमारी सोनालिका और बहादुर नट का विवाह तो नहीं हो सका लेकिन दोनों के प्रेम का गवाह पूरा गांव बना... 

कहते हैं दोनों की समाधि महल के पास ही बनायी जाती है जिसपर हर साल मकर संक्रान्ति के दिन भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। आज भी दूर-दूर से प्रेमी जोड़े वहाँ आते हैं और अपनी मन्नतों के धागे बांधते हैं.... 

राजकुमारी सोनालिका और बहादुर नट की प्रेम कहानी अमर हो गई.... यहां के लोकगीतों और कहानियों में आज भी दोनों जिंदा हैं.... 
  
शायद राजकुमारी सोनालिका का श्राप ही था की,,,कई सदियाँ गुजर जाने के बाद भी वीरान पड़ा भूरागढ़ का किला अपने अतीत पर आज भी मातम मनाता हुआ नज़र आता है। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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