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विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: पेड़ हैं धरती के मूल निवासी और हमारे अस्तित्व की प्रमुख आवश्यकता

सार

पेड़-पौधे धरती के सौम्य, सुकुमार, सुन्दर, सुखदायक शिशु की तरह हैं। वृक्षों के माध्यम से ही पृथ्वी अपने परजीवियों को अपनी संपत्ति को न्योछावर करती है।
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वृक्षों का संरक्षण वर्तमान की सबसे बड़ी आवश्यकता - फोटो : pixabay
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विस्तार
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इस संसार के सबसे पुराने पुरखे, पेड़ हैं। पेड़ धरती पर सर्वाधिक पुराने जीवन साक्ष्य हैं। 9,550 साल पुराना टीजिक्को नाम का पेड़ स्वीडन के डलारना प्रांत में है। पेड़ अपनी ज्यादा उम्र से भी नहीं मरते हैं, जब तक उन्हें काटा न जाए या क्षति न पंहुचाए। दुनिया भर में प्रत्येक वर्ष 5 अरब पेड़ लगाए जाते हैं तो इसके दुगने 10 अरब पेड़ काट लिए जाते हैं।

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एक पेड़ प्रतिदिन इतनी ऑक्सीजन पैदा करता है कि चार इंसान जिंदा रह सकें। विश्व भर के 38 शोधकर्ताओं के समूह द्वारा किया गया एक अध्ययन “नेचर” जर्नल में प्रकाशित हुआ है, जिससे पता लगा कि दुनिया भर में 30 खरब पेड़ मौजूद हैं। अर्थात प्रति व्यक्ति पर 422 पेड़। (सीएनएन न्यूज के शब्दों में ’इस ग्रह के हर व्यक्ति के लिए एक छोटा-सा जंगल मौजूद है)। यह धरती मां का हम पर विशेष उपहार है।
 

शोधकर्ताओं ने इस खोज के लिए जिन तीन प्रमुख विधियों का प्रयोग किया, उनमें पहली मदद उपग्रहों के प्राप्त चित्रों से मिली। दूसरी, जंगलों की 4,30,000 सूचियों के आधार पर पेड़ों का घनत्व निकाला गया और तीसरी विधि के तौर पर कम्प्यूटेशनल तरीके से प्रति हैक्टर में पेड़ों की संख्या की सैद्धांतिक गणना की गई।

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इस अनुसंधान में स्पष्ट किया गया कि अध्ययन में पेड़ किसे माना गया?

पेड़ उस वनस्पति को माना गया, जिसके काष्ठीय तने का व्यास छाती की ऊंचाई के बराबर हो यानी लगभग साढ़े चार फीट और 10 सेंटीमीटर से अधिक हो। पेड़ अपने भोजन का 10 प्रतिशत मिट्टी से प्राप्त करते हैं तो 90 प्रतिशत तक वायु से ग्रहण करते हैं।

इस अनुसंधान के मुताबिक लगभग 14 खरब पेड़ ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्रों और भारत जैसे अर्ध ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में हैं। वहीं 7.4 खरब पेड़ यानी 25 प्रतिशत रूस, स्कैंडिनेविया और उत्तरी अमेरिका के उप-आर्कटिक क्षेत्रों में है। जबकि 6.1 खरब यानी 22 प्रतिशत पेड़ शीतोष्ण क्षेत्रों में पाए जाते है। जिन क्षेत्रों में जंगल अधिक घने हैं, वहीं जनसंख्या का आधिक्य भी है, जिससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य प्रकृति और पेड़ों पर कितना निर्भर है।

विकासवादी जीवविज्ञान के अनुसार, जमीन पर पेड़-पौधों की उत्पत्ति हरे रंग के शैवालों से हुई है। प्राकृतिक प्रक्रियाओं और सामाजिक प्रक्रियाओं में बेहद साम्य दिखता है। जैसे समाज में अनवरत संघर्ष, सहयोग, उपभोग, उत्पादन, सृजन और विध्वंश जारी है, वैसे ही प्रकृति में भी यह गति बनी हुई है।

जब थोड़े साफ-सुथरे पानी में शैवाल पनपे और उन्हानें सूरज की रोशनी का उपभोग किया तो अपने विकास के लिए वायुमंडल की कार्बन डाईऑक्साइड से ऊर्जा प्राप्त की। इस प्रक्रिया में जो अपशिष्ट उत्पाद छोड़ा वह ऑक्सीजन गैस बनी। परिणाम वनस्पति का विकास और विस्तार पृथ्वी पर होना शुरू हुआ। परिणामस्वरूप धरती पर पौधों की संख्या बढ़नी शुरू हो गई।

पृथ्वी के पटल पर प्रकाश संश्लेषण की क्रिया तीव्र गई। फलस्वरूप धरती पर ऑक्सीजन की मात्रा में बढ़ोतरी होती गई। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि समय के साथ ऑक्सीजन की वृद्धि से ऑक्सीकरण की मात्रा बढ़ी जिसमें कई जीव-जंतु भस्म भी होते गए। 

जैव विकास की यह अवधारणा बताती है कि पर्यावरण के साथ अनुकूलन से ही आगे बढ़ा गया है। पृथ्वी पर ऑक्सीजन के बढ़ने से ऑक्सीजन-श्वसन करने वाले जीव-जंतु विस्तार पाते गए और शेष विलुप्त होते गए। मनुष्य ऑक्सीजन को भोजन पाचन के उपयोग में लेता है और उस ऊर्जा से शारीरिक क्रियाओ को संचालित कर लेता है तथा इस क्रिया में कार्बन डाईऑक्साइड को अपशिष्ट के रूप में बाहर निकालता है।

वहीं पृथ्वी पर मौजूद पेड़-पौधें उस कार्बन-डाई ऑक्साइड का उपभोग कर अपना भोजन और उर्जा प्राप्त करते हैं। इस लेन-देन और उपभोग-उत्पादन से ही जीवन संतुलन उत्पन्न हुआ है। इस संतुलन को बनाए रखने की सावधानी स्वस्थ जीवन की आवश्यक शर्त है।

बढ़ रहा है वायु प्रदूषण का खतरा - फोटो : iStock
पिछली दो सदियों में वनों का विनाश विकास के नाम पर अधिक हुआ है। औद्योगीकरण की शुरुआत के साथ वैश्वीकरण की प्रक्रिया तक प्रकृति विनाश की यह गति तीव्र से तीव्रतम होती गई है। परिणामतः दुनिया के जंगलों की तादाद 32 प्रतिशत तक घट गई है। खास तौर से ऊष्ण कटिबंधीय इलाकों में जंगलों को बेतरतीब ढंग से काटा जा रहा है। दुनिया में बचे हुए 6 खरब पेड़ों की संख्या तेजी से घट रही है। हर साल करीब 12 अरब पेड़ कट रहे हैं।
 

ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण पेड़ों की कटौती

अमेरीका के “नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस रिसर्च” के आंकड़ों बताते है कि ब्राजील के अमेजन नदी के इर्द-गिर्द के जंगलों में आग लगने की घटनाओं में 84 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। विकास की होड़ में जीवाश्म ईंधनों को ऊर्जा के लिए अंधाधुंध जला डाला है। हर वर्ष लगभग 15 अरब पेड़ों को काट डाला जा रहा है। परिणामतः कार्बन डाई-ऑक्साइड बढ़ रही है। यह एक ग्रीन हाउस गैस है, परिणाम सूरज की रोशनी को धरती पर आसानी से दस्तक देती है जिससे पृथ्वी की गर्माहट बढ़ती है।

कार्बन डाई-ऑक्साईड का वायुमंडल में बढ़ना एक ऐसे तंबू का तानना है जो पृथ्वी पर उपजी गर्मी को वापिस आकाश में बिखरने नहीं देता है। यह ठहरी हुई गर्मी ही पृथ्वी का तापमान बढ़ा रही है और ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण बन रही है। ग्रह की जलवायु का विनाश इस बढ़ते गैसीय असंतुलन ने ही किया है।

यह जीवन का नैसर्गिक-प्राकृतिक प्रवाह था जो सहस्रों वर्षों के धैर्य-धारण के क्रिया-कलापों से बने एक संतुलन को स्थापित करने के साथ पृथ्वी पर जीवन के साथ उपजा था। इस संतुलन का डगमगाना पूरी तरह से एक अनिर्वहनीय स्थिति है। इसलिए धरती के मूलनिवासियों (पेड़ों) को पुनः उक्त संतुलन के लिए स्वयं मोर्चा संभालना पड़ेगा, तभी जीवन दशाएं स्थिर हो सकेंगी। पेड़ों को बचाया जाए, पेड़ ही पृथ्वी का स्थायी सुरक्षा कवच है।  

पेड़-पौधे धरती के सौम्य, सुकुमार, सुन्दर, सुखदायक शिशु की तरह हैं। वृक्षों के माध्यम से ही पृथ्वी अपने परजीवियों को अपनी संपत्ति को न्योछावर करती है। फल-फूल, जल, जंगल, जमीन परोसकर समग्र प्राणी-जगत पर अनन्त उपकार करती हैं। धरती के पेड़-पौधे योद्धाओं की तरह अपने पृथ्वी-परिवार का पालन करते हैं। धरती मां सब जीवों का भरण-पोषण करने में अहम भूमिका निभाती हैं।

वृक्ष धरती पुत्रों के तमाम अभावों को दूर करने के प्राथमिक साधन बनते है। पेड़-पौधे, वृक्ष और वनस्पतियां हमें फल-फूल से लेकर औषधियां और आवश्यक जीवन तत्व तथा आराम-विश्राम तक की सुविधाएं प्रदान करने वाले घर-आवास तक प्रदान करते हैं।


पेड़ पर्यावरण के बड़े रक्षक

प्राणवायु ऑक्सीजन का अक्षय भंडार इन्हीं वृक्षों की मातहत होता हैं। जिसके बिना इंसान का जीवित रहना असंभव है। पेड़-पौधे ही ईंधन-भंडार का निर्माण करते हैं। पेड़ के पत्ते अपने आप झड़कर इधर-उधर बिखरकर अन्य वनस्पतियों को खाद देते हैं। रोजमर्रा के जीवन जरूरतों के लिए कागज हेतु कच्ची सामग्री उपलब्ध कराते हैं। पेड़ पर्यावरण के बड़े रक्षक हैं। पेड़-पौधों की पत्तियां और ऊपरी शाखाएं सूर्य किरणों के लिए धरती के भीतर से आर्द्रता या जलकण पोषण करने के लिए नलिका-तंत्र का काम करते हैं।

सूर्य किरणें, नदियों व सागर के जलकणों को अवशोषित कर वर्षा कराने में योगदान देती हैं। यह वर्षा पर्यावरण सुरक्षा व हरियाली दोनों के लिए आवश्यक है। पेड़, पृथ्वी पर जीवन जटाओं की तरह फैले हैं। पेड़. पृथ्वी पर प्राण प्रतीक हैं जिनके बिना धरती पर जीवन असंभव है। पेड़ सबके लिए ऑक्सीजन से लेकर सबके भोजन स्रोत हैं। पेड़ ही जीवन को आधार देने वाली जरुरी जरुरतों को पूरा करते हैं।

हवा, पानी, ईंधन-उर्जा, स्वस्थ मिट्टी और स्वच्छ आकाश से लेकर अनेकानेक औषधियां और जीवन संरक्षण/संवर्द्वन के अनेक स्रोत वृक्षों की वसीयत है, धरती मां से। पृथ्वी पर पेड़, हर जीव को प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप में फायदा पहुंचाते हैं। वृक्ष और पृथ्वी ग्रह एक-दूसरे पर निर्भर होने के कारण एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। हवा, मिट्टी और पानी सभी को पेड़ शुद्ध करके धरती को मजबूत बनाते हैं।

वृक्षों का जीवन के लिए विशेष महत्व है यथाः  
  • धरती के सभी जीव-जंतु पेड़ों पर आश्रित हैं।
  • पेड़ वातावरण सहित हमारे शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य तक को प्रभावित करते हैं।
  • पेड़ सूरज की रोशनी से प्रकाश संश्लेषण या फोटो-सिंथेसिस प्रक्रिया कर हवा से कार्बन-डाइऑक्साइड को अवशोषित कर वायुमंडल में ऑक्सीजन छोड़ उसे स्वच्छ बनाते हैं।
  • बारिश में पेड़ों की जड़ें मिट्टी को मजबूती से पकड़े रहती हैं। परिणामतः प्राकृतिक आपदाओं का खतरा कम हो जाता है।
  • पेड़ों की छाया जमीन से जल वाष्पीकरण को रोकती है। वातावरण को ठंडा रखती है।
  • पेड़ वायुमंडल की गैसों की गुणवत्ता को सुधारने में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं।
  • पेड़ों की गिरी सूखी पत्तियां खाद बनकर भूमि और बंजर धरती को उपजाऊ बनाती हैं।
  • पेड़ बहुत सारे जीव-जंतुओं को आवास मुहैया कराते हैं तो बहुत से जीव-जंतुओं को पेड़-पौधे आहार भी प्रदान करते हैं।  
  • पेड़ हमारे आसपास के वातावरण को सुंदर, स्वच्छ और सुरम्य बनाए रखते हैं और हमारे जीवन को सुविधायुक्त बनाते हैं।
 
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पेड़ धरती के मूल निवासी है! - फोटो : iStock

परिंदों की दुनिया हैं पेड़

वृक्ष हर जीव-जंतु के लिए कल्याणकारी हैं। पेड़ परिंदों की तो पूरी दुनिया हैं, पेड़ों को कटने से ही निरीह-पक्षियों के संसार से लुप्त होने का खतरा भी बढ़ रहा है। पेड़ बहुत सारे लोगों और जंगली जानवरों का प्राकृतिक घर हैं। पेड़-पौधे हमें ऑक्सीजऩ से लेकर हरी-भरी साग-सब्जियां, फल-फूल, विभिन्न कामों में आने वाली लकड़ियां, अलग-अलग प्रकार की सुविधाएं देते हैं।

आज हमारे सामने आने वाली प्राकृतिक आपदाएं भूकंप, सुनामी, अकाल, अनावृष्टि, अतिवृष्टि, अत्यधिक तापमान तथा अत्यधिक वर्षा का कारण पर्यावरण का असंतुलन ही है। वायु प्रदुषण लगातार तीव्र गति से बढ़ रहा है। जिस पर काबू पाने के लिए पेड़-पौधे लगाना ही एकमात्र उपाय है। इसलिए अधिक से अधिक पेड़-पौधे लगाने होगें और सबको जागरूक करना होगा। 

आज की जरूरत यही है कि हम वनों का संरक्षण करें। पेड़ों के संरक्षण और वृक्षारोपण के प्रति समाज को जागरूक करें। धरती पर जीवन का आधार पेड़-पौधे हैं जो किसी अन्य ग्रह पर नहीं हैं। इसीलिए पेड़ों को हरा-सोना (ग्रीन-गोल्ड) कहा जाता है। वृक्ष धरा से प्रदूषण सोखते हैं। पेड़-पौधे हमें फल-फुल, साग-सब्जियां, लकड़ियां, छाया, जल, वायु तथा औषधियां देते हैं। ये पेड़ ही है जो हमें शुद्ध वातावरण दे रहे हैं।

वृक्ष पर्यावरण पर संकट बनने वाली प्राकृतिक आपदाओं यथाः बाढ़, भूकंप, ओलावृष्टि, सूखा और प्रदूषण जैसी मानवीय आपदा से मुक्त रखते हैं। पेड़-पौधे विषैली, स्वास्थ्य विरोधी और घातक प्राकृतिक गैसों को वायुमण्डल और वातावरण में घुलने से रोकते हैं। राख और रेत के महीन कणों तक को अपने ऊपर ले लेते हैं।

पेड़ धूल-मिट्टी के स्तर को 75 प्रतिशत तक कम कर देते हैं। किसी भी तरह के शोर को 50 प्रतिशत तक कम करते हैं। पेड़ों में भीजीवन है। ये भी इंसानो की तरह बीमार होते हैं, हंसते हैं, बातें करते हैं। दुखी, कमजोर और बीमार होने पर वे कम ऑक्सीजन देने लगते हैं।

कोई क्षेत्र पेड़ों की सुंदरता, अद्भुतता, रूप-रंग, आकार-प्रकार, गुणों-अवगुणों की विशेषताओं से भी पहचान रखता है। वृक्षों की अपनी-अपनी खासियत है। यही वजह है कि कुछ पेड़, फल, फूल और पत्ते पूजा-पाठ, शादी-विवाह, तीज-त्योहारों व अन्य खास अवसरों पर सामाजिकता में सहभागी रहते हैं। जैसे पीपल का पेड़, बरगद का पेड़, अशोक का पेड़, आम का पेड़, नारियल का पेड़, नीम का पेड़, केले का पेड़, तुलसी आदि। 


वेद शास्त्रों में पेड़ पौधों का महत्व 

भारतीय चिंतन दृष्टि में तो पेड़ों का अतिरिक्त सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। भारतीय समाज पेड़-पौधे लगाने को पुण्य मानता है। वेद-शास्त्रों में एक पेड़ लगाने को सौ गायों का दान देने के बराबर कहा गया है। वेद भारतीय विवेक की वह वाणी है जो जीवन अनुभवों से तरंगित है। वेद वनस्पति, पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, वायु सबको संबोधित करते हैं। इन सबकी आराधना और साधना में समाज को रत रखते हैं।

वेद मंत्र, प्रकृति और पर्यावरण चेतना से परिपूर्ण हैं। वनस्पति-वृक्ष और पर्यावरण संरक्षण की मंत्रणाएं भरी पड़ी है। वेद व्याख्याएं करने योग्य को और न करने योग्य को दोनों को स्पष्ट करती है। जीवन संतुलन को स्वतंत्रता और नियंत्रण में मथकर संयमित बनाती है।

भारतीय आस्था के साथ पर्यावरण के तमाम उपांग अंतर्गुम्फित है। पेड़, पौधे, जल, जंगल, जमीन सब जनमानस के आस्था भाव में रमे हुए हैं। भारतीय देवी-देवता किसी न किसी पशु-पक्षी और वृक्ष में संस्थापित है। यह पर्यावरण बोध प्रकृति के समानांतर सम्मान से ही उपज सकता है। किसी कोरी धार्मिक वैचारिकी से नहीं। धरती पर जन-जीवन सुरक्षित रहे, मानव प्रगति पथ पर बढ़ता रहे। इसी चिंतन दृष्टि से प्राचीन भारत की वन व्यवस्था में वृक्षों को व्योम की तरह आच्छादित रखने की प्रबंधन-प्रणाली विकसित रही। तभी हम वनों में आश्रम, तपोवनों, सुरक्षित अरण्यों, बाग-बगीचों और लघु वन-वाटिकाओं की संस्कृति को विकसित कर पाए।

इसी विचार प्रक्रिया के तहत भारतीय समाज और संस्कृति में पेड़-पौधे उगाना/लगाना एक तरह का सामाजिक-सांस्कृतिक कर्म माना गया। पेड़-पौधों की रक्षा-सुरक्षा के साथ-साथ पोधों का नवरोपण सबकी प्राथमिकता हो। अगर चाहते हो धरती हरी-भरी रहे, नदियां अमृत धारा सी अनवरत बहती रहें और मानवता अक्ष्णुय बनी रहे तो वृक्षों का वंदन हो, धरती मां का अभिनंदन हो।    

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नोट- लेखक डॉ. राकेश राणा समाजशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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