पिछले दिनों ग्लासगो जलवायु बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारत 2030 तक अपनी गैर-ईंधन ऊर्जा क्षमता को 500 गीगावॉट तक बढ़ाकर अपनी 50 फीसदी ऊर्जा जरूरतें पूरी कर सकता है।
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इस कथित विकास की बेहोशी से जगने का बस एक ही मूल मंत्र है कि विश्व में सह अस्तित्व की संस्कृति का निर्वहन हो। सह-अस्तित्व का मतलब प्रकृति के अस्तित्व को सुरक्षित रखते हुए मानव विकास करे। प्रकृति और मानव दोनों का ही अस्तित्व एक दूसरे पर निर्भर है, इसलिए प्राकृतिक संसाधनों का क्षय न हो, ऐसा संकल्प और ऐसी ही व्यवस्था की जरुरत है। अभी तक इस सिद्धांत को पूरे विश्व ने खासतौर पर विकसित देशों ने विकासवाद की अंधी दौड़ की वजह से भुला रखा है।
कार्बन उत्सर्जन में कटौती का भारत का लक्ष्य
पिछले दिनों ग्लासगो जलवायु बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारत 2030 तक अपनी गैर-ईंधन ऊर्जा क्षमता को 500 गीगावॉट तक बढ़ाकर अपनी 50 फीसदी ऊर्जा जरूरतें पूरी कर सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने ये भी कहा कि भारत 2030 तक अपने कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में भी कटौती करेगा, अपनी अर्थव्यवस्था में कार्बन भागीदारी को 2030 तक 45 फीसदी तक कम कर देगा और 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन हासिल कर लेगा।
आईपीसीसी रिपोर्ट पर भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि सरकार ऊर्जा सेक्टर के उत्सर्जनों में कटौती के लिए कदम उठा रही है। उन्होंने कहा, "पर्यावरणीय वार्ताएं ‘एक हाथ ले एक हाथ दे' जैसा मामला नहीं होती हैं, वे दुनिया को बचाने के बारे में होती हैं। विकसित देशों को अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए और जानना चाहिए कि अतीत में वे क्या कर गुजरे हैं? ”
सब कुछ हो रहा है अस्त-व्यस्त
वास्तविकता तो यह है कि पिछले 20 वर्ष में जैविक ईधन के जलने की वजह से कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन 40 प्रतिशत तक बढ़ चुका है और पृथ्वी का तापमान 0.7 डिग्री सैल्शियस तक बढ़ा है। अगर यही स्थिति रही तो सन् 2030 तक पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा 90 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी।
1950 के बाद से हिमालय के करीब 2000 ग्लेशियर पिघल चुके हैं, यही दर कायम रही तो 2035 तक सभी ग्लेशियर पिघल जाएंगे। सन् 1870 के बाद से जल सतह 1.7 मिमी की दर से बढ़ रहा है और अब तक 20 सेमी के लगभग बढ़ चुका है। यदि ऎसा ही रहा तो एक दिन मॉरीशस जैसे कुछ देश और कई तटीय शहर डूब जाएंगे।
पश्चिमी विज्ञान ने हमारे एक धड़े को प्रकृति का दोहन करने और उस पर वर्चस्व स्थापित करने का पाठ पढ़ाने में कामयाबी हासिल की। अंग्रेजों के पहले के भारत में प्रकृति के साथ सह अस्तित्व की मान्यता थी जहां कृषि, उत्पादन प्रणाली, यातायात और सामाजिक व धार्मिक कार्यक्रमों की योजना मौसम चक्र के अनुसार बनाई जाती थी।
हमारा विज्ञान प्रकृति का सम्मान करता था लेकिन आधुनिक विज्ञान ने कोयले और कच्चे तेलों को उनकी खदानों से निकालने के साथ पुलों और बांधों को बनाने, भूजल के दोहन द्वारा बेमौसमी संकर फसलें उगाने, जीएम फसलों को पैदा करने की जानकारी दी। नए ज्ञान के इस रूप को अपनाने के दो सौ साल के भीतर ही आज हमने बड़े पैमाने पर पर्यावरण असंतुलन को जन्म दे दिया । जिससे अब हमें विकास के ऐसे माडल को अपनाना होगा जो पूरी तरह से सह अस्तित्व के सिध्दांत पर काम करता हो ।
बेमौसम बरसात, गहराता पेयजल संकट, बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं, जीव-जन्तु की घटती संख्या, प्रकृति और वातावरण को शुद्ध करने वाले पक्षी आज विलुप्त होने के कगार पर है। कौवा और गिद्ध जैसे पक्षी कम होते जा रहे हैं। हम अपना योगदान देकर इस पृथ्वी को नष्ट होने से बचा सकते हैं।
प्रकृति पर जितना अधिकार हमारा है उतना ही हमारी भावी पीढ़ियों का भी, जब हम अपने पूर्वजों के लगाए वृक्षों के फल खाते हैं, उनकी संजोई धरोहर का उपभोग करते हैं तो हमारा नैतिक दायित्व है कि हम भविष्य के लिए भी नैसर्गिक संसाधनों को सुरक्षित छोड़ जाएं। कम से कम अपने निहित स्वार्थों हेतु उनका दुरुपयोग तो न करें। अन्यथा भावी पीढ़ी और प्रकृति हमें कभी माफ नहीं करेगी।
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