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World Environment Day: प्रकृति को बचाने के लिए सह-अस्तित्व के सिद्धांत पर करना होगा काम

सार

विकास की बेहोशी से जगने का बस एक ही मूल मंत्र है कि विश्व में सह अस्तित्व की संस्कृति का निर्वहन हो। सह-अस्तित्व का मतलब प्रकृति के अस्तित्व को सुरक्षित रखते हुए मानव विकास करे।
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‘केवल एक पृथ्वी ‘ (ओनली वन अर्थ ) की थीम पर इस बार का पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है, जो कई मायनों में बहुत खास है क्योंकि साल  2022 में, पर्यावरण पर पहले संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के 50 साल पूरे होने जा रहे हैं। - फोटो : amar ujala
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‘केवल एक पृथ्वी ‘ (ओनली वन अर्थ ) की थीम पर इस बार का पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है, जो कई मायनों में बहुत खास है क्योंकि साल  2022 में, पर्यावरण पर पहले संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के 50 साल पूरे होने जा रहे हैं। पर्यावरण दिवस की नींव उस समय रखी गई जब पहली बार 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में एक पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें भारत समेत दुनिया भर के लगभग 119 देशों ने हिस्सा लिया था।

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हालांकि, पहला विश्व पर्यावरण दिवस इसके दो साल बाद 5 जून 1974 को मनाया गया था। पूरी दुनिया की जलवायु में तेजी से परिवर्तन हो रहा है। बेमौसम आंधी, तूफान और बरसात से हजारों लोगों की जान जा रही है साथ ही सभी ऋतु चक्रों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। सच्चाई यह है कि पर्यावरण सीधे-सीधे हमारे अस्तित्व से जुड़ा मसला है। दुनियाभर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर काफी बातें, सम्मेलन, सेमिनार आदि हो रहे हैं परन्तु वास्तविक धरातल पर उसकी परिणिति होती दिखाई नहीं दे रही है।

भारत के लिए स्थिति चिंताजनक

पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पर गठित सरकारों के पैनल (आईपीसीसी) की सबसे ताजा रिपोर्ट में भारत को लेकर निराशाजनक तस्वीर पेश की गई है। उसमें चेतावनी दी गई है कि भारत अगले दो दशकों में जलवायु परिवर्तन से होने वाली बहुत सारी तबाहियों का सामना करने को विवश हो सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक अगर 2030 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कटौती नहीं की गई तो जलवायु परिवर्तन जनित विनाश को रोक पाना भारत के लिए संभव नहीं होगा। रिपोर्ट के अनुसार अगर भारत 2030 तक कड़े से कड़ा कदम नहीं उठाता है तो जलवायु परिवर्तन के नतीजे उस पर बहुत भारी पड़ने वाले हैं।

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इस रिपोर्ट को देखकर यह स्पष्ट हो गया है कि पूरी दुनिया जिस तरह कथित विकास की दौड़ में अंधी हो चुकी है उसे देखकर तो यही लगता है कि आज नहीं तो कल मानव सभ्यता का विनाश निश्चित है। कोरोना जैसी महामारी और प्राकृतिक आपदाओं का बार-बार आना हमें चेतावनी दे रहा है कि अभी भी समय है और हम अपनी बेहोशी से जाग जाये नहीं तो कल कुछ भी नहीं बचने वाला।

पर्यावरण असंतुलन दशकों से मानवजाति के लिए चिंता का सबब बना है। पृथ्वी का तापमान बढ़ा है और इससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है। वास्तव में देखा जाए तो पर्यावरण संरक्षण हमारे राजनीतिक एजेंडे में शामिल ही नहीं है। हम क्यों रोते हैं कि मौसम चक्र बदल चुका है, तापमान निरंतर बढ़ता जा रहा है, इसके लिए कौन दोषी है? 

धरती जो कभी सोना उगला करती थी, हमारी अर्थ की हवस ने केमिकल डाल-डाल कर उसे बंजर बना दिया, फसल अच्छी लेने के लिए उसको बांझ बना दिया। कृत्रिम साधनों से उसका दोहन हो रहा है, उससे हमने गुणवत्ता खोई है। पिछले कई वर्षों से दुनियाभर के ताकतवर देशों के कद्दावर नेता हर साल पर्यावरण संबंधित सम्मेलनों में भाग लेते रहे हैं, लेकिन आज तक कोई ठोस लक्ष्य हासिल नहीं हुआ है।

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पिछले दिनों ग्लासगो जलवायु बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारत 2030 तक अपनी गैर-ईंधन ऊर्जा क्षमता को 500 गीगावॉट तक बढ़ाकर अपनी 50 फीसदी ऊर्जा जरूरतें पूरी कर सकता है। - फोटो : istock
इस कथित विकास की बेहोशी से जगने का बस एक ही मूल मंत्र है कि विश्व में सह अस्तित्व की संस्कृति का निर्वहन हो। सह-अस्तित्व का मतलब प्रकृति के अस्तित्व को सुरक्षित रखते हुए मानव विकास करे। प्रकृति और मानव दोनों का ही अस्तित्व एक दूसरे पर निर्भर है, इसलिए प्राकृतिक संसाधनों का क्षय न हो, ऐसा संकल्प और ऐसी ही व्यवस्था की जरुरत है। अभी तक इस सिद्धांत को पूरे विश्व ने खासतौर पर विकसित देशों ने विकासवाद की अंधी दौड़ की वजह से भुला रखा है।

कार्बन उत्सर्जन में कटौती का भारत का लक्ष्य

पिछले दिनों ग्लासगो जलवायु बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारत 2030 तक अपनी गैर-ईंधन ऊर्जा क्षमता को 500 गीगावॉट तक बढ़ाकर अपनी 50 फीसदी ऊर्जा जरूरतें पूरी कर सकता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने ये भी कहा कि भारत 2030 तक अपने कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में भी कटौती करेगा, अपनी अर्थव्यवस्था में कार्बन भागीदारी को 2030 तक 45 फीसदी तक कम कर देगा और 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन हासिल कर लेगा।


आईपीसीसी रिपोर्ट पर भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि सरकार ऊर्जा सेक्टर के उत्सर्जनों में कटौती के लिए कदम उठा रही है। उन्होंने कहा, "पर्यावरणीय वार्ताएं ‘एक हाथ ले एक हाथ दे' जैसा मामला नहीं होती हैं, वे दुनिया को बचाने के बारे में होती हैं। विकसित देशों को अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए और जानना चाहिए कि अतीत में वे क्या कर गुजरे हैं? ”

सब कुछ हो रहा है अस्त-व्यस्त

वास्तविकता तो यह है कि पिछले 20 वर्ष में जैविक ईधन के जलने की वजह से कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन 40 प्रतिशत तक बढ़ चुका है और पृथ्वी का तापमान 0.7 डिग्री सैल्शियस तक बढ़ा है। अगर यही स्थिति रही तो सन् 2030 तक पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा 90 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी।

1950 के बाद से हिमालय के करीब 2000 ग्लेशियर पिघल चुके हैं, यही दर कायम रही तो 2035 तक सभी ग्लेशियर पिघल जाएंगे। सन् 1870 के बाद से जल सतह 1.7 मिमी की दर से बढ़ रहा है और अब तक 20 सेमी के लगभग बढ़ चुका है। यदि ऎसा ही रहा तो एक दिन मॉरीशस जैसे कुछ देश और कई तटीय शहर डूब जाएंगे।

पश्चिमी विज्ञान ने हमारे एक धड़े को प्रकृति का दोहन करने और उस पर वर्चस्व स्थापित करने का पाठ पढ़ाने में कामयाबी हासिल की। अंग्रेजों के पहले के भारत में प्रकृति के साथ सह अस्तित्व की मान्यता थी जहां कृषि, उत्पादन प्रणाली, यातायात और सामाजिक व धार्मिक कार्यक्रमों की योजना मौसम चक्र के अनुसार बनाई जाती थी।

हमारा विज्ञान प्रकृति का सम्मान करता था लेकिन आधुनिक विज्ञान ने कोयले और कच्चे तेलों को उनकी खदानों से निकालने के साथ पुलों और बांधों को बनाने, भूजल के दोहन द्वारा बेमौसमी संकर फसलें उगाने, जीएम फसलों को पैदा करने की जानकारी दी। नए ज्ञान के इस रूप को अपनाने के दो सौ साल के भीतर ही आज हमने बड़े पैमाने पर पर्यावरण असंतुलन को जन्म दे दिया । जिससे अब हमें विकास के ऐसे माडल को अपनाना होगा जो पूरी तरह से सह अस्तित्व के सिध्दांत पर काम करता हो ।

बेमौसम बरसात, गहराता पेयजल संकट, बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं, जीव-जन्तु की घटती संख्या, प्रकृति और वातावरण को शुद्ध करने वाले पक्षी आज विलुप्त होने के कगार पर है। कौवा और गिद्ध जैसे पक्षी कम होते जा रहे हैं। हम अपना योगदान देकर इस पृथ्वी को नष्ट होने से बचा सकते हैं।

प्रकृति पर जितना अधिकार हमारा है उतना ही हमारी भावी पीढ़ियों का भी, जब हम अपने पूर्वजों के लगाए वृक्षों के फल खाते हैं, उनकी संजोई धरोहर का उपभोग करते हैं तो हमारा नैतिक दायित्व है कि हम भविष्य के लिए भी नैसर्गिक संसाधनों को सुरक्षित छोड़ जाएं। कम से कम अपने निहित स्वार्थों हेतु उनका दुरुपयोग तो न करें। अन्यथा भावी पीढ़ी और प्रकृति हमें कभी माफ नहीं करेगी। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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