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World Elder Abuse Awareness Day 2020: बुजुर्गों से ही बनता है परिवार

सार

  • बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार एक मानवाधिकार का मुद्दा है।
  • बुजुर्गों की उपेक्षा और तिरस्कार की इस हवा ने शहरों का ही नहीं गावों का वातावरण भी दूषित कर रखा है।
  • हमारी संस्कृति में सदैव ही माता-पिता को भगवान का दर्जा दिया गया है।
  • आज की संस्कृति में लोग स्वतंत्र रहना चाहते हैं।
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आज के समय में बुजुर्गों के साथ हो रहा यह दुर्व्यवहार एक आम घटना हो गई है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
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विस्तार
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इन बूढ़ी उंगलियों की कपकपाहट पर ना जा।

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यह जिसके सर पर आजाएं शहंशाह बना दे।।
कभी सीखे थे चलना तुम थाम कर इन्हें ।
फिर तू थाम कर इन्हें अपनी तकदीर बना ले।।

 

यदि किसी बच्चे से पूछा जाए कि उसकी दुनिया क्या है निश्चय ही उसका उत्तर होगा मां। यकीनन हर बच्चे ने अपने पिता की उंगली थाम कर ही पहली बार चलना सीखा होगा। मां-बाप के साए में पले बढ़े ये बच्चे जिन्हें मां बाप अपना भविष्य समझते हैं उम्र के साथ कैसे उन्हीं से दूर होने लगते हैं शायद उन्हें स्वयं इसका आभास नहीं होता और उम्र का एक पड़ाव वह आता है जब मां बाप वृद्ध हो चुके होते हैं और बच्चे समर्थ।

और फिर वही बच्चे उन्हीं मां-बाप को बोझ समझकर उनकी उपेक्षा करने लगते हैं तथा कदम-कदम पर उन्हें उनकी लाचारी का अहसास दिलाते हैं। यहां तक कि कई बार तो जिस उंगली को थामकर चलना सीखा था उसी को पकड़कर घर के बाहर भी निकाल देते हैं।

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आज के समय में बुजुर्गों के साथ हो रहा यह दुर्व्यवहार एक आम घटना हो गई है। घर-परिवार के अतिरिक्त सार्वजनिक स्थलों पार्क, अस्पताल आदि सभी जगह उन्हें उपेक्षा व तिरस्कार सहन करना पड़ता है।

बढ़ती हुई जनसंख्या तथा चिकित्सीय सुविधाओं के परिणामस्वरूप बुजुर्गों की संख्या में तीव्र गति से वृद्धि हो रही है जो स्वाभाविक ही है, परंतु समस्या की बात यह है कि इन बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं भी बढ़ रही है जो विचारणीय है।

बुजुर्गों की इन्हीं समस्याओं को दृष्टिगत रखते हुए तथा लोगों में जागरूकता उत्पन्न करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय बुजुर्ग दुर्व्यवहार रोकथाम संघ की सलाह पर संयुक्त राष्ट्र ने 2006 में प्रस्ताव 66 /127 के तहत 15 जून को "बुजुर्ग दुर्व्यवहार रोकथाम दिवस" मनाना प्रारंभ किया।

बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार एक मानवाधिकार का मुद्दा है। 2017 में 'हेल्पेज  इंडिया' के मुख्य कार्यकारी अधिकारी' मैथ्यू चेरियन' का कहना है कि- 'आंकड़ों ने मुझे चौंका दिया बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार एक संवेदनशील मुद्दा है। 

पिछले कुछ सालों से हम घरों के बंद दरवाजों के पीछे बुजुर्गों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार का अध्ययन कर रहे हैं परंतु जब हमने सार्वजनिक स्थानों पर उनके साथ दुर्व्यवहार का आंंकलन किया वह भी विचारणीय है।'

जिस समाज में कभी बुजुर्गों का विषेष मान सम्मान तथा परिवार में पूरा वर्चस्व होता था...

दुनिया भर मे बुजुर्गों के अकेलेपन का सबसे बड़ा कारण है सोशल मीडिया- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
वर्ष 2017 में डब्ल्यूएचओ द्वारा कराए गए अध्ययन के अनुसार समस्त विश्व में 60 वर्ष से अधिक उम्र वाले बुजुर्गों में से अनुमानतः 15.7% बुजुर्गों के साथ अर्थात विश्व में प्रत्येक 6 में से एक बुजुर्ग के साथ दुर्व्यवहार हुआ। समुदाय में अनुमानित दुर्व्यवहार जैसे की मनोवैज्ञानिक दुर्व्यवहार 11.6 %, वित्तीय दुरुपयोग 6.8 %, उपेक्षा 4.2%, शारीरिक शोषण 2.6 % तथा यौन शोषण 0.9 %था।

बुजुर्गों की उपेक्षा और तिरस्कार की इस हवा ने शहरों का ही नहीं गावों का वातावरण भी दूषित कर रखा है। उपभोक्तावादी संस्कृति के तहत बदलते सामाजिक मूल्य, नई पीढ़ी की सोच में परिवर्तन ,तथा परिवार की सीमित होती परिभाषा ने बुजुर्गों के लिए अनेक समस्याएं खड़ी कर दी हैं।

सर्वे के मुताबिक 21.38 फ़ीसदी बुजुर्ग गांव में जबकि 25.3 फ़ीसदी बुजुर्ग शहरों में अकेले रह रहे हैं। करीब एक चौथाई लोगों का मानना है कि उन्हें बुजुर्गों की देखरेख करने में निराशा व कुंठा होती है और 29 फीसदी लोगों को बुजुर्गों को घर में रखने की अपेक्षा वृद्धाश्रम में रखना अधिक उचित प्रतीत होता है।

हाल ही में हुए एक सर्वे में आया है कि दुनिया भर मे बुजुर्गों के अकेलेपन का सबसे बड़ा कारण है सोशल मीडिया। जिस के संपर्क में लोग दुनिया जहान की खबर तो रखते हैं पर घर में बैठे माता-पिता के लिए समय नहीं होता।

अब छोटे बच्चों को भी बुजुर्गों के साथ समय बिताना अच्छा नहीं लगता उनके पास ज्यादा मनोरंजक विकल्प उपलब्ध है, इंटरनेट की दुनिया के रूप में।

हमारी संस्कृति में सदैव ही माता-पिता को भगवान का दर्जा दिया गया है तथा उनके चरणों में ही स्वर्ग माना गया है।

जिस समाज में कभी बुजुर्गों का विषेष मान सम्मान तथा परिवार में पूरा वर्चस्व होता था ,उनकी राय के बिना कोई कार्य नहीं किया जाता था आज उसी समाज में उन्हें बूढ़ा होते ही उपेक्षित और तिरस्कृत कर दिया जाता है।

उनसे ना तो कोई बात करना पसंद करता है और ना ही राय लेना। अतः शारीरिक कष्टों  की अपेक्षा वे मानसिक कष्टों से  अधिक दुखी रहते हैं।

देश में बढ़ते हुए "ओल्ड एज होम" की संख्या बता रही है कि अब माता-पिता के लिए उन्हीं घरों में जगह नहीं है जिन्हें कभी उन्होंने अपनी मेहनत से तिनका तिनका जोड़ कर बनाया था।

आज की संस्कृति में लोग स्वतंत्र रहना चाहते हैं माता-पिता की उपस्थिति उनकी निजता को बाधित करती है तथा वे असुविधा महसूस करते हैं। ऐसी संकुचित सोच के तहत बुजुर्ग आज अकेले रहने के लिए विवश हैं।

कुछ घरों में जहां बुजुर्गों के लिए जगह है तथा उनके खान- पान और स्वास्थ्य का ध्यान भी रखा जाता है, परंतु उनके लिए किसी के पास समय नहीं होता।

घर के किसी कोने में उन्हें सीमित कर दिया जाता है। बेटे बहुओं के आधुनिक तकनीक से सजाए हुए  घरों में हर जगह घूमने फिरने की उन्हें स्वतंत्रता नहीं होती।

ओल्ड एज होम में रह रहे बुजुर्गों के चेहरों की खामोश झुर्रियां तथा सूनी आंंखे चीख चीख कर उनके अकेलेपन की भयावह त्रासदी बयान करती हैं।
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जब तक हम बुजुर्गों की महत्ता नहीं समझेंगे, उस उम्र की पीड़ा का एहसास नहीं करेंगे तब तक...

बुजुर्गों के सम्मान के लिए जन चेतना को जगाना होगा- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : pexels.com
शर्मसार हो जाती है मानवता जब कोई मां कहती है कि- उसके बेटे ने बीमारी की हालत में उसे इतना मारा कि वह एक कान से बहरी हो गई और घर से निकाल दिया , झुक जाती हैं नजरें जब कोई बुजुर्ग बताता है उसके बेटे और बेटियां इसी शहर में रहते हैं पर कभी मिलने नहीं आते या कभी कभार बेटी बस आकर मिल जाती है।

हम विकास की किस राह पर हैं जहां हमारी संवेदना इतनी लुप्त हो गई है कि जिन घरों में नौकर-नौकरानियों के लिए जगह है वहां वृद्ध मां बाप के लिए नहीं।

युवा वर्ग को अपनी सोच में परिवर्तन लाना होगा उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि बुढ़ापा तो एक अनिवार्य अवस्था है। 

समय के इस चक्र से एक दिन उन्हें भी गुजरना ही होगा। लगभग 80% बुजुर्ग तो शिकायत भी नहीं करते इस उम्मीद से कि एक दिन शायद सब ठीक हो जाएगा।

घर के बाहर भी उन्हें अनेक तरह के दुर्व्यवहारों का सामना करना पड़ता है जो मानवीय दृष्टि से एक क्रूर कृत्य है।

हमें नई पीढ़ी की सोच में परिवर्तन लाना होगा तथा उन्हें बुजुर्गों के महत्व को समझाना होगा जब तक हम बुजुर्गों की महत्ता नहीं समझेंगे, उस उम्र की पीड़ा का एहसास नहीं करेंगे तब तक हमारी सारी उपलब्धियां अस्तित्व हीन होंगी।

बुजुर्गों के सम्मान के लिए जन चेतना को जगाना होगा, साथ ही उनकी बेहतरी के लिए विशेष योजनाओं का क्रियान्वयन भी जरूरी है।

हमें समाज में यह चेतना जगानी होगी कि बुजुर्ग हमारी जिम्मेदारी नहीं वरन हमारी आवश्यकता है। वे जीवन के अनुभव के खजाने हैं, जिन्हें सहेज कर रखना हर समाज एवं संस्कृति का धर्म एवं नैतिक जिम्मेदारी है।

"बुजुर्ग दुर्व्यवहार रोकथाम दिवस" मनाने की सही अर्थ में सफलता तभी है जब हम  बुजुर्गों के लिए समाज में एक ऐसा स्वस्थ वातावरण उपलब्ध करा पाते हैं जहां वे स्वयं को सुरक्षित सुखी तथा प्रसन्न महसूस करें। साथ ही बुजुर्गों के मन में भी एक आशा तथा जीवन के प्रति उत्साह जागृत करना होगा।

जेम्स गारफील्ड ने कहा है- यदि वृद्धावस्था की झुर्रियां पड़ती हैं तो उन्हें हृदय पर मत पढ़ने दो कभी भी आत्मा को वृद्ध मत होने दो। अतः बुजुर्गों को भी अपनी उम्मीद और हौसला कायम रखना होगा ताकि वे टूटे नहीं। और हमें उनके साए में एक स्वस्थ समाज का निर्माण करना होगा।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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