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विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार रोकथाम जागरूकता दिवस 2020: कोरोना काल में बदलें बुजुर्गों के प्रति रवैया

सार

  • सोशल डिस्टेंसिंग शब्द ने तो बुजुर्गों के जीवन में अकेलापन भर दिया है।
  • आज हमारे देश की 70 प्रतिशत आबादी नौजवानों की है और यह देश के लिए एक पूंजी है।
  •  बढ़ती उम्र और घटती प्रतिरोधक क्षमता बीमारियों का एक प्रमुख कारक है।
  • बुजुर्गों को वृद्धाश्रम में भेजने की बजाए अपने साथ रखने की पहल होनी चाहिए।
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लॉकडाउन हटने के बाद भी बुजुर्गों के लिए अपना घर कैदखाना बन गया है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Pixabay
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विस्तार
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67 वर्षीय मेरे पिता जी पिछले चार साल से क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) से पीड़ित हैं। ऐसी बीमारी है जिससे रोगी का श्वसन तंत्र कमजोर हो जाता है और दवाइयों के साथ-साथ बहुत से परहेज व सावधानियां रखनी पड़ती है।

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देश में जैसे ही कोरोना की आहट हुई सबसे पहले मुझ जैसे पता नहीं कितने लोग अपने बच्चों व बूढ़े माता-पिता को लेकर चिंतित हो उठे। चिंता होना वाजिब भी था क्योंकि विश्वभर की तमाम सरकारों व स्वास्थ्य संस्थानों ने कोरोना के चलते वरिष्ठ नागरिकों व बच्चों को गैर जरूरी कार्यों के लिए घर से बाहर न निकलने की सलाह दी।

लॉकडाउन हटने के बाद भी बुजुर्गों के लिए अपना घर कैदखाना बन गया है। हमने भी पिता जी को घर के आंगन से बाहर निकलने से मना कर दिया। खैर हमारा घर गांव में है और आंगन काफी बड़ा है आराम से घूमा जा सकता है, लेकिन प्रश्न यह भी है कि देश में ऐसे कितने घर होंगे जहां खुला आंगन है या बड़े बुजुर्गों के लिए अलग कमरे हैं? जो बुजुर्ग अपने बच्चों के साथ शहरों, कस्बों में एक दो कमरों में एक साथ रह रहे हैं उनका जीवन इस दौर में कैसा होगा?
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विशेषकर उन लोगों का जो पहले से ही किसी रोग से पीड़ित हैं। सोशल डिस्टेंसिंग शब्द ने तो बुजुर्गों के जीवन में और अकेलापन भर दिया है। जो बुजुर्ग कोरोना से पहले अपने बेटे-बहुओं की मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना का शिकार हो रहे थे, कोरोना ने ऐसे बुजुर्गों के जीवन को और कष्टकारी बना दिया है।

अब तो ऐसे बेटे-बहुओं को बुजुर्गों को अकेले छोड़ने का बहाना मिल गया है, बहुत सी जगह तो वे अपने पोते-पोतियों से भी नहीं मिल पा रहे हैं. जिन बुजुर्गों को घरों में ही वित्तीय सहायता मिल रही थी वह भी नहीं पहुंच रही,अपनी दवा-दारू पर खर्च करना उनके लिए मुश्किल हो गया है।

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है वृद्ध व्यक्तियों की देखभाल करने वाले सभी पहलुओं पर दबाव होता है फिर चाहे वह वित्तीय हो, स्वास्थ्य हो या आश्रय हो। जो वृद्ध लोग लंबे समय तक छोटे घरों व भीड़-भाड़ वाली जगहों और संयुक्त विस्तारित परिवारों में एक साथ रह रहे हैं वहां इनके लिए परेशानियों बढ़ी हैं।

विभिन्न शोध के अनुसार 60 वर्ष और उससे अधिक आयु में...

देश में वृद्धाश्रमों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : PTI
आज बुजुर्ग सह-हाशिए पर हैं, पीढ़ी-अंतराल और जीवन शैली में बदलाव के कारण बुजुर्ग व्यक्ति खुद में अलगाव और असुरक्षा महसूस कर रहे हैं। महामारी के इस दौर में बुजुर्गों को सबसे ज्यादा मदद की दरकार होती है, लेकिन इस दौर में उन्हें ही अकेला और तिरस्कृत होना पड़ रहा है, ठीक है बहुत से घरों में देखभाल हो रही है लेकिन देश में इस वर्ग की एक ऐसी संख्या भी है जिनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है, न ही उन्हें दवाईयों की याद दिलाने वाला कोई है, न ही उनकी दवाई लाने वाला कोई है।

हम बड़े गर्व से कहते हैं कि आज हमारे देश की 70 प्रतिशत आबादी नौजवानों की है और यह देश के लिए एक पूंजी है, लेकिन चिंता का विषय यह भी है कि क्या यह 70 प्रतिशत आबादी हमेशा युवा ही रहेगी? जो आज युवा देश है वह कल को बूढ़ा भी तो होगा अमेरिका और जापान जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं।

यूनाइटेड नेशन पॉपुलेशन फंड और हेल्पएज इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 तक भारत में बुजुर्गों की संख्या 17 करोड़ 30 लाख और 2050 में यह बढ़कर 34 करोड़ हो जाएगी अर्थात् 2050 तक हर 5 वां भारतीय 60 साल से अधिक उम्र का होगा, फिलहाल देश में 60 साल से ज्यादा उम्र के आबादी के लगभग 8 करोड़ लोग हैं।

विभिन्न शोध के अनुसार, 60 वर्ष और उससे अधिक आयु में, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, फेफड़ों की बीमारी, और हृदय की स्थिति आदि जैसी चिकित्सा स्थितियों से संक्रमित होने का खतरा अधिक होता है। बढ़ती उम्र और घटती प्रतिरोधक क्षमता बीमारियों का एक प्रमुख कारक है।

आर्थिक साम्राज्यवाद, भूमंडलीकरण, उदारीकरण व बढते औद्योगिकीकरण ने भी आज बुजुर्गों को हाशिए पर धकेलने का काम किया है। टूटते संयुक्त परिवारों के कारण घर के बड़े बुजुर्ग एकांकी जीवन जीने को मजबूर हो गए हैं। वृद्धाश्रम की बढ़ती संख्या से लगता है एक दिन देश में विद्यालयों की तुलना वृद्धाश्रमों की संख्या ज्यादा होगी।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी एक रिपोर्ट ‘बुजुर्गों की स्वास्थ्य समस्याएं’ बताती है कि 25 प्रतिशत भारतीय बुजुर्ग अवसाद में जी रहे हैं, 33 प्रतिशत को गठिया या हड्डी के रोग से ग्रस्त हैं, 40 प्रतिशत को एनीमिया है, गांवों में 10 और शहरों में 40 प्रतिशत को डायबीटीज है, 10 प्रतिशत कम सुनने संबंधी समस्या से गुजर रहे हैं, गांवों में 33 प्रतिशत तो शहरों में 50 प्रतिशत को हाइपरटेंशन है,  50 प्रतिशत के करीब की नजर कमजोर है, 10 प्रतिशत भारतीय बुजुर्ग कहीं न कहीं  गिरकर अपनी कोई न कोई हड्डी तुड़वा बैठते हैं तो 33 प्रतिशत पाचन तंत्र के विकार से जूझ रहे हैं।
 
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विशेषज्ञों का कहना है कि जिन देशों में बुजुर्गों की संख्या बढ़ती है....

बुजुर्गों ने हमेशा सामाजिक संबंधों पर सबसे अधिक भरोसा किया है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
2025 ऐसे बुजुर्गों की संख्या कुल आबादी की 12.50 प्रतिशत होगी और उनमें से 10 प्रतिशत तो पूरी तरह से बिस्तर पर होंगे। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि 4 से 6 प्रतिशत बुजुर्ग तो हमेशा कुपोषित ही रहते हैं।

भारत की मौजूदा जीवन प्रत्याशा दर 69 वर्ष है जबकि विश्व की औसत जीवन प्रत्याशा दर 72 साल है, हमारे पड़ोसी देश चीन के साथ-साथ नेपाल की जीवन प्रत्याशा दर भी हमसे अधिक है। हमें यह प्रयास करने होंगे जिससे युवा अवस्था में ही लोगों को समर्थ बनाया जा सके ताकि उनका शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य बेहतर बना रहे और वे परिवार तथा समुदाय में बढ़ती उम्र के बावजूद भी सक्रिय भागीदारी निभा सकें।

विशेषज्ञों का कहना है कि जिन देशों में बुजुर्गों की संख्या बढ़ती है वे संसाधनों की कमी के साथ बढ़ते खर्च को भी झेलते हैं। क्यूबा जैसे देश विश्वभर के लिए उदाहरण हैं कि लंबी आयु जीने के लिए संसाधनों व धन-दौलत का होना जरूरी नहीं बल्कि अपनों का साथ होना आवश्यक है।

क्यूबा के '120 क्लब' में शामिल लोग बताते हैं कि अपने पोते-पोतियों, बेटे-बेटियों के पास रहने से ही हमारी उम्र 100 पार हो पाई है। अपनों के साथ रहने से ही इन्हें लंबे समय तक जीने की प्रेरणा मिलती है। संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने भी कहा था कि "वृद्ध लोगों के पास जीवन और स्वास्थ्य के समान अधिकार हैं। 

"जीवन-रक्षक चिकित्सा देखभाल के आसपास के कठिन निर्णय मानव अधिकारों और सभी की गरिमा का सम्मान करना चाहिए" 

बुजुर्गों ने हमेशा सामाजिक संबंधों पर सबसे अधिक भरोसा किया है। कोरोना काल में ऐसा संबंधों की पहले से कहीं ज्यादा जरूरत है। बड़ों को खुद से दूर करने की बजाए उनका हाथ पकड़ने और उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ने की ज़रूरत है क्योंकि इस दौर में वे अधिक अकेलापन महसूस कर रहे हैं।

घरों में हम उनके साथ कोई इनडोर गेम खेल सकते हैं, उन्हें गतिविधियों में संलग्न करना, उनसे बात करना न केवल उन्हें खुश रखेगा बल्कि उन्हें प्यार और कम अकेलापन महसूस करवाएगा। लॉकडाउन के दौरान हमें अपने बच्चों से अपने दादा-दादी या बुजुर्ग माता-पिता के साथ घर पर समय बिताने और उन्हें डिजिटल रूप से साक्षर बनाने की पहल करवानी करनी चाहिए।

यह न केवल एक बुजुर्ग को लंबे समय में स्वतंत्र होने में मदद करेगा बल्कि उस अकेलेपन और मानसिक तनाव से राहत देने में भी मदद करेगा जिस से वे गुजर रहे हैं। कमरे भले 1 हो या 10? बंद दरवाजों के पीछे भी बहुत कुछ किया जा सकता है यदि उद्देश्य सकारात्मक तरीके से देखभाल करने का हो। 

बुजुर्गों को वृद्धाश्रम में भेजने की बजाए अपने साथ रखने की पहल हो अन्यथा जो व्यवहार हम अपने मां-बाप से करते हैं वही आगे चलकर हमारे बच्चे भी हमसे करेंगे.याद रखिए जिस तरह हमें अपने बच्चों की चिंता है हमारे मां-बाप भी हमारे प्रति उतने ही चिंतित रहते हैं तो क्या संतान की अपने मां-बाप के प्रति कोई चिंता नहीं?


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 
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