गंगा करोड़ों रुपए खर्च करके साफ नहीं हुई जबकि लॉक डाउन से वह अब पहले से साफ दिखाई देे रही है।
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लाॅकडाउन से पहले बुरा हाल था पतित पावनी का
केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा गत वर्ष मई में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि गंगा का पानी पीने के लिए बिल्कुल अनुपयुक्त होने के साथ ही उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक के हिस्से में गंगाजल नहाने लायक भी नहीं है। बोर्ड के कुल 86 स्थानों पर बने गंगाजल निगरानी केन्द्रों में से केवल 7 केन्द्रों के निकट ही गंगा जल कीटाणुशोधन के बाद पीने लायक था। शेष 78 केन्द्रों के निकट का पानी पीने योग्य नहीं था।
इनमें से भी केवल 18 स्थानों पर गंगाजल नहाने योग्य पाया गया था। जबकि सम्पूर्ण गंगा तट के 62 स्थानों पर पानी नहाने के लिए भी उपयुक्त नहीं पाया गया। जिन 7 स्थानों पर कीटाणुशोधन के बाद गंगाजल पीने योग्य पाया गया उनमें से अधिकतर स्थान उत्तराखण्ड में तथा 2 स्थान पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में चिन्हित कि ए गंगा का शेष हिस्सा हिन्द महासागर में गिरने तक पीने और नहाने के योग्य नहीं पाया गया था। जिन 78 क्षेत्रों में गंगाजल पीने और स्नान के लिए उपयुक्त नहीं पाया गया उनमें से बिहार में भुसौला के पास गोमती नदी में, कानपुर, बाराणसी के गोला घाट, राय बरेली के डालमऊ, इलाहाबाद संगम, बुक्सार, पटना, भागलपुर, एवं पश्चिम बंगाल का हावड़ा-शिवपुर आदि क्षेत्र शामिल थे।
उत्तराखण्ड से निर्मल बहती है गंगा
पिछले साल भी जिन 6 स्थानों पर गंगाजल कीटाणुशोधन के बाद पीने योग्य पाया गया उनमें उत्तराखण्ड में भागीरथी में गंगोत्री, रुद्रप्रयाग, देवप्रयाग, रायवाला और ऋषिकेश, उत्तर प्रदेश में बिजनौर और पश्चिम बंगाल में डायमण्ड हार्बर शामिल थे। इसका मतलब साफ है कि गंगा अपने मायके उत्तराखण्ड में तो निर्मल है लेकिन वह जैसे ही मैदान में अपनी लम्बी यात्रा शुरू करती है, उसमें गंदगी का बोझ बढ़ता जाता है। लेकिन ज्यादातर शोर उत्तराखण्ड में गंगा की स्थिति पर किया जाता है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देश में नदियों को प्रदूषित करने वाले 1360 उद्योग चिन्हित किये हैं। इस सूची में उत्तराखण्ड के 33, उत्तरप्रदेश के 432, बिहार के 22 और पश्चिम बंगाल के 56 कारखाने शामिल हैं जो कि गंगा में सीधे खतरनाक रसायन और संयंत्रों से निकला दूषित जल तथा कचरा प्रवाहित कर रहे हैं। इनमें कानुपर के 76 चमड़ा कारखाने भी शामिल हैं।
गंगा का स्वयं शुद्धीकरण का गुण केवल पहाड़ तक
गंगा की अलकनन्दा और भागीरथी जैसी श्रोत जलधाराऐं समुद्रतल से लगभग 5 हजार मीटर की ऊंचाई से उत्तराखण्ड हिमालय के लगभग 917 में से 665 (427 अललकनन्दा और 238 भागीरथी के) ग्लेशियरों की नाशिकाओं (स्नाउट्स) से अपनी लम्बी यात्रा पर निकल पड़़ती हैं। आप कल्पना कर सकते हैं कि 5 हजार मीटर की ऊंचाई से चली हुयी जलराशियां जब ऋषिकेश में 300 मीटर की ऊंचाई पर उतरती होंगी तो तीब्र ढाल के कारण गंगा का वेग कितना प्रचण्ड होगा। एक अध्ययन के अनुसार भागीरथी का ढाल 42 मीटर प्रति किमी और अलकनन्दा का ढाल 48 मीटर प्रति कि.मी. है। जिसका ढाल जितना अधिक होगा उसका वेग उतना ही अधिक होगा। गंगा की यही उछलकूद उसे स्वच्छ और निर्मल बनाती है।
जलमल शोधन संयंत्रों में भी तो इसी तरह जल शोधन किया जाता है। अलकनंदा और भागीरथी के संगम देवप्रयाग से जब गंगा समुद्र मिलन के लिए यात्रा शुरू करती है तो उसका रंग मौसम के अनुसार नीला, कभी हरा तो बरसात में मटमैला होता है। गंगा को मैदानों के लिए हिमालय से उपजाऊ मिट्टी लाने की जिम्मेदारी भी निभानी हो़ती है। हरिद्वार के बाद गंगा रंग बदलने लगती है और प्रयागराज इलाहाबाद में यमुना से मिलन के बाद तो वह काली कलूटी और महानदी की जगह महानाला जैसी दिखती है।
हरिद्वार से सागर तक 800 किमी चलती है गंगा
हरिद्वार से लगभग 800 कि.मी. लम्बी मैदानी यात्रा करते हुए गढ़मुक्तेश्वर, सोरों, फर्रुखाबाद, कन्नौज, बिठूर, कानपुर होते हुए गंगा इलाहाबाद (प्रयाग) पहुंंचती है जहां उसका मिलन यमुना से होता है। काशी (वाराणसी) में गंगा एक वक्र लेती है, और वहां से उत्तरवाहिनी कहलाती है। यहाँ से मिर्जापुर, पटना, भागलपुर होते हुए पाकुर पहुँचती है। इस बीच इसमें सोन, गंडक, घाघरा,कोसी आदि नदियां मिल जाती हैं।
भागलपुर में राजमहल की पहाड़ियों से यह दक्षिणवर्ती होती है। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के गिरिया स्थान के पास गंगा नदी दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है-भागीरथी और पद्मा। भागीरथी नदी गिरिया से दक्षिण की ओर बहने लगती है जबकि पद्मा नदी दक्षिण-पूर्व की ओर बहती फरक्का बैराज से छनते हुई बंाग्ला देश में प्रवेश करती है। मुर्शिदाबाद शहर से हुगली शहर तक गंगा का नाम भागीरथी नदी तथा हुगली शहर से मुहाने तक गंगा का नाम हुगली नदी हो जाता है। देखा जाय तो मुर्शिदाबाद से लेकर कानपुर तक गंगा के स्वास्थ्य के तत्काल इलाज की जरूरत है।
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