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बाल श्रम निषेध दिवस 2020: मासूम आखिर मजबूर क्यों है?

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बाल श्रम एक ऐसा शोषण है जो बच्चों से उनके निर्दोष बचपन के अधिकार को लूटता है। - फोटो : फाइल फोटो
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जब हम कभी परिवार संग घूमने जाते हैं रास्ते में गाड़ी की हवा पानी चेेक करवाने के लिए किसी मैकेनिक की दुकान पर रुकते हैं तभी वहां एक छोटा लड़का दिखाई देता है, हम आवाज लगाते हैं ओए छोटू जरा गाड़ी की हवा चैक करना, 'छोटू' इसलिए क्योंकि नाम मालूम नहीं और ऐसे बाल मजदूरों को छोटू नाम से ज्यादातर संबोधित किया जाता है।

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जैसे ही छोटू से हवा चैक करवा कर आगे बढ़ते है गाड़ी में बैठे बच्चे कहते हैं पापा कोल्ड-ड्रिंक पीनी है, और फिर आगे दुकान या ढाबा दिखता है वहां रुकते हैं तभी एक 12-13 वर्ष का लड़का आता है और कहता है साहब जी क्या चाहिए, परिवार संग सलाह मशविरा करके ऑर्डर दिया जाता है 'छोटे दो चाय, दो कोल्ड-ड्रिंक और चार समोसे लाओ'।

चाय-पान करके आगे बढ़ते ही शहर आ जाता है शहर में प्रवेश करते ही चौराहे पर रेड सिग्नल आ जाता है गाड़ी को ब्रेक लगती है तभी एक 11-12 वर्ष की लड़की व इससे थोड़ा सा बड़ा लड़का हाथों में कुछ सामान लिए गाड़ी के नजदीक आकर कहता है अंकल जी ये वाईपर ले लो अच्छा है, लड़की कहती है ये कार के अंदर लगाने के लिए एक झालर ले लो, अंदर बैठे बच्चे कहते हैं पापा ले लो कितना अच्छा है।
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जैसे ही इन बच्चों से सामान खरीदा उनके चेहरे पर एक 'मुस्कराती' मुस्कान तैर गई। सिग्नल ग्रीन होते ही गाड़ी आगे बढ़ा दी लेकिन उन बच्चों की मुस्कान कई सवाल छोड़ गई कि मेरे बच्चे मेरे साथ गाड़ी में घूम रहे हैं अपने बचपन का आंनद ले रहे हैं लेकिन रास्ते में विभिन्न जगहों पर मिलने वाले बच्चे का बचपन कहां है ऐसी कौन सी मजबूरियांं हैं जो इन बच्चों को इस तरह मजदूरी करनी पड़ रही है।

जाहिर है शौक से तो ये इन काम-धंधों में लगे नहीं होंगे कोई न कोई मजबूरी जरूर रही होगी जो इनको मजदूरी के रास्ते पर चलना पड़ा। हर बच्चे को बचपन में 'आप बड़े होकर क्या बनोगे'? नामक प्रश्न से गुजरना पड़ता है लेकिन बाल श्रम में लगे बच्चों से भी क्या किसी ने पूछा होगा कि आप बड़े होकर क्या बनना चाहते हो? शायद किसी ने नहीं, इनके संपर्क में आने वाले ज्यादातर लोगों ने यही सोचा होगा कि ये तो पैदा होते ही श्रमिक का ठप्पा लगवाकर आए हैं।

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दुनिया भर में 21 करोड़ से अधिक बच्चों से बाल मजदूरी करवाई जाती है। - फोटो : फाइल फोटो
बाल श्रम करने वाले बच्चों में से हो सकता है किसी ने आपके पूछने पर कहा हो कि वह शिक्षक बनना चाहता है या वह चिकित्सक बनना चाहता है या फिर और भी बहुत कुछ, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हमनें कभी यह जानने की कोशिश की कि कितने बच्चे हैं जो अपने इन ख्वाबों को पूरा कर पाए।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार दुनिया भर में 21 करोड़ से अधिक बच्चों से बाल मजदूरी करवाई जाती है। 71 देश ऐसे हैं जहां बच्चों को मजदूरी करने के लिए किसी न किसी रूप में मजबूर होना पड़ता है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की नई रिपोर्ट 'फाइंडिंग्स ऑन द वर्स्ट फॉर्म्स ऑफ चाइल्ड लेबर' में 140 देशों का आंकलन किया गया है। रिपोर्ट बताती है कि ऐसी 130 चीजें है जिन्हें बनाने के लिए बच्चों से काम करवाया जाता है। ईंटें तैयार करने से लेकर मोबाइल फोन के पुर्जे बनाने तक के कई काम बच्चों से लिए जाते है।

2001 के जनगणना के आंकड़ों अनुसार भारत में  5 से14 वर्ष की आयु के 1 करोड़ 26 लाख 66 हजार 377 बच्चे बाल श्रम में लगे हुए थे। सरकारी नीतियों व सामाजिक विकास के कार्यक्रमों के चलते इसमें काफी कमी आई और यही आंकड़े इसी आयु वर्ग में 2011 की जनगणना के अनुसार कम होकर 43 लाख 53 हजार 247 तक आ गए। उतर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्रा और गुजरात में बाल मजदूरी की दर अन्य राज्यों से अधिक है।

एक सभ्य समाज में कोई मां-बाप नहीं चाहेगा कि उनकी बच्चे बीड़ी, पटाखे, माचिस, ईंटें, जूते, कांच की चूड़ियां, ताले, इत्र और फुटबॉल कालीन आदि बनवाना के कार्यों को करे। शायद बहुत कम लोग ही जानते होंगे की रेशम के तार खराब न हो इसलिए बच्चों के नन्हे हाथों से रेशमी वस्त्रों पर कढ़ाई करवाई जाती है।

बाल श्रम एक ऐसा शोषण है जो बच्चों से उनके निर्दोष बचपन के अधिकार को लूटता है। गरीबी और बाल श्रम का आपसी दुष्चक्र निरंतर चलता रहता है गरीबी से बाल श्रम होता है और बाल श्रम गरीबी के स्तर को बनाए रखता है।
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दुनिया भर में हर दस में से एक बच्चा बाल मजदूर हैंं।   - फोटो : child labour
दुनिया भर में हर दस में से एक बच्चा बाल मजदूर है।  जबकि 2000 के बाद से बाल श्रम में बच्चों की संख्या में 9 करोड़ से ऊपर की गिरावट आई है।  संयुक्त राष्ट्र सतत विकास ने 2025 तक बाल श्रम के सभी रूपों को समाप्त करने का लक्ष्य रखा है देखना होगा इस दिशा में विश्व समुदाय कैसे मजबूती से आगे बढ़ता है।

दुनिया भर के हर 10 बाल श्रमिकों में से  9 बच्चे अफ्रीका, एशिया और प्रशांत क्षेत्र में हैं, अफ्रीका में बाल श्रमिकों का सबसे ज्यादा अनुपात है। अफगानिस्तान के ईंट भट्टों में काम करने वाले लगभग आधे कर्मचारियों की आयु 14 वर्ष से कम है। इसी तरह इथियोपिया में लगभग 60% बच्चे काम करते हैं। 

बाल श्रम को दूर करने के लिए देश के भीतर बहुत से कठोर कानून व नीतियां भी बनाई गई हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद-24 के अनुसार 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से कारखानों, फैक्ट्रियों व खानों में जोखिम भरे कार्य कराना अपराध है।

बाल अधिनियम-1933, बाल रोजगार अधिनियम -1938, भारतीय कारखाना अधिनियम-1948, बागान श्रम अधिनियम-1951, खान अधिनियम-1952, बाल श्रम गिरवीकरण अधिनियम तथा बाल श्रमिक प्रतिबंध एवं नियमन अधिनियम-1986 आदि कानून व नीतियां बाल मजदूरों की सेवाओं, कार्यदशाओं, कार्य के घंटे, मजदूरी दर आदि का नियमन करते हैं।

बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम 1986, के अनुसार "बच्चे" का मतलब है एक व्यक्ति जिसने अपनी उम्र के 14 वर्ष पूरा न किए हों। यह अधिनियम, अधिनियम की अनुसूची के भाग क एवं ख (धारा 3) में शामिल 18 व्यवसाय और 65 प्रक्रियाओं आदि उद्योगों में बच्चों की नियुक्ति को प्रतिबंधित करता है।

संविधान में स्थापित अनुच्छेद 21-क में बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार कानून उनको 6 से 14 साल की उम्र तक सरकार द्वारा क़ानून के जरिए निर्धारित रूप से निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का मौलिक अधिकार देता है।

इसी तरह अनुच्छेद-24 के तहत चौदह साल से कम उम्र के किसी भी बच्चे को किसी कारखाने या खदान या किसी अन्य खतरनाक रोजगार में नियोजित नहीं किया जाएगा। बाल श्रम एक ऐसा विषय है, जिस पर संघीय व राज्य सरकारें, दोनों कानून बना सकती हैं।

नाम के लिए कानून जितने मर्जी बना दिए जाएं लेकिन जब तक धरातल पर इन्हें प्रभावशाली तरीके से लागू नहीं किया जा सकता तब तक बाल श्रम निषेध कानूनों की फेहरिस्त ही लंबी होगी इन कानून के हाथ लंबे नहीं हो सकते।

इसके साथ ही समाज को भी बच्चों के प्रति अपनी सोच बदलनी होगी। बच्चों को काम देने का अहसान करने की बजाए उसके व्यस्क अभिभावकों को रोजगार दिया जाना चाहिए।

हम सबका दायित्व बनता है वह बचपन जिसमें बच्चा सपनों के पंखों से उड़ान भरना सीखता है उसमें इन पंखों को काट कर आपाहिज करने की बजाए खुला आसमान देने की जरूरत है।

12 जून को भले ही पूरा विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मना रहा हो लेकिन बाल श्रम दिवस मनाने से नहीं बच्चों को उनके अधिकार देने से रुकेगा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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