बाल श्रम को रोके बिना भारत का भविष्य खतरे में है।
- फोटो : SELF
भारत में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन संघ, भारतीय मजदूर संघ, सेंटर ऑफ इंडिया ट्रेड यूनियंस, हिंद मजदूर सभा, बाल श्रम उन्मूलन एवं कल्याण कार्यक्रम आदि संगठन बाल श्रम के संबंध में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
भारतीय संविधान का 'अनुच्छेद 23' खतरनाक उद्योगों में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है। 1950 का 'अनुच्छेद 24 'स्पष्ट करता है कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को कारखाने इत्यादि में ना रखा जाए, जहां उनकी सुरक्षा को खतरा हो।
भारत में बाल श्रमिकों की संख्या सरकारी आंकड़ों के अनुसार तो लगभग 2 करोड़ है, परंतु अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार यह संख्या लगभग 5 करोड़ के आसपास है, जिनमें से लगभग 19% बच्चे घरेलू नौकर के रूप में काम करते हैं।
इसके अतिरिक्त इन बाल श्रमिकों को पटाखे बनाना, कालीन बुनना, वेल्डिंग करना, ताले बनाना, पीतल उद्योग का काम, कांच उद्योग, हीरा उद्योग, माचिस, बीडी बनाना, खेतों में काम करना, कोयले की खानों ,पत्थर की खदानों, सीमेंट उद्योग, होटलों एवं ढाबों में में काम करना तथा इसके साथ ही साथ मालिकों की इच्छानुसार काम ना होने पर आधे पेट भोजन के साथ शारीरिक मानसिक प्रताड़ना सहना उनके जीवन का हिस्सा बन जाता है।
इनमें से अधिकांश तो अनाथ और बेसहारा होते हैं, परंतु जिनके परिवार हैं, वे भी गरीबी के कारण अपने बचपन को श्रम की भट्टी में झोंक कर ये मासूम बच्चे अपने परिवारों का पेट पालते हैं।
मां की ममता व पिता के दुलार से महरूम इन बच्चों के लिए स्कूल, शिक्षा, खेल खिलौने आदि का कोई अर्थ ही नहीं है। वेल्डिंग की चमक से अपनी आंखों की रोशनी खो देना, फैक्ट्री के खतरनाक धुएं को श्वास के साथ शरीर का अंग बना लेना, जहरीली गैसों के संपर्क में रहने के कारण टीवी, कैंसर आदि रोगों का शिकार होना, यौन शोषण के कारण एड्स तथा अन्य यौन रोगों से ग्रस्त होकर श्रापित जीवन जीना इनकी नियति बन जाता है।
इन बाल श्रमिकों की समस्याएं अनंत है। कई बार तो इन्हें तस्करी आदि के कार्य में भी लगा दिया जाता है। नशीले पदार्थों तथा अन्य अवैध वस्तुओं की तस्करी में लिप्त कर इनकी मजबूरियों का लाभ उठाया जाता है। मानवता की हद से गिरकर कई बार इन बच्चों को दूर देशों में जानवरों की तरह बेचा भी जाता है।
बच्चों की यह स्थिति किसी भी शिक्षित और सभ्य समाज के माथे पर एक कलंक है और विश्व बाल श्रम निषेध दिवस का उद्देश्य लोगों को इन बाल श्रमिकों के विषय में सोचने व उनके हित के लिए कार्य करने के लिए प्रेरित करना है।
प्रत्येक राष्ट्र की सरकार का तो इन मासूमों के प्रति दायित्व है ही, साथ ही राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक का भी दायित्व है कि वे उनके प्रति मानवतापूर्ण दृष्टिकोण रखें।
यद्यपि बाल श्रमिकों के हित को ध्यान में रखते हुए सरकारों तथा निजी संस्थाओं द्वारा अनेक प्रयास किए गए, परंतु वे पर्याप्त नहीं हैं। उनमें अभी बदलाव तथा विकास की आवश्यकता है। इन बच्चों के त्रासदीपूर्ण जीवन की समस्याएं विकराल हो सकती हैं, निरूपाय नहीं।
आवश्यकता है सरकारों के निष्ठा पूर्ण प्रयासों की, समाज की सक्रिय भागीदारी की तथा प्रत्येक व्यक्ति की निजी जागरूकता की। इन बाल श्रमिकों के उदास बचपन व त्रासदीपूर्ण जीवन की मांग है। इनके हित के लिए उठाए जाने वाले ऐसे ठोस कदमों की जो इन्हें इनका बचपन लौटा सकें तथा एक सामान्य जीवन दे सकें।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।