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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: दक्षिण अफ्रीका और यहां की फिल्में

सार

दक्षिण अफ्रीका का फिल्म उद्योग विश्व में एक सबसे प्राचीन सिने-उद्योगों में से एक रहा है। कार्ल हर्ट्ज नामक व्यक्ति इंग्लैंड से प्रोजेक्टर ले आया और उसने 11 मई 1896 को एम्पायर पैलेस में पहला प्रोडक्शन किया। उसने 30 सेकेंड की एक श्रृंखला दिखाई और अगले दिन यह प्रेस की सुर्खियों में था।
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दक्षिण अफ्रीकी फिल्मों का इतिहास - फोटो : Istock
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विस्तार
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दक्षिण अफ्रीका कहते आंखों के सामने नेलसन मंडेला की तस्वीर उभरती है, रेल में गांधी के अपमान और उनके प्रतिरोध की स्मृति जागती है। इस महादेश का नाम सुनते मन में तमाम अश्वेत लोगों की तस्वीरें उभरती हैं। रंगभेद नीति के तहत हुई ढेर सारी हिंसा, अत्याचार हमने अखबारों में पढ़े हैं। साहित्य से जुड़ाव है तो एम.जे. कोट्जी तथा नादीन गोर्डीमर जैसे नोबेल पुरस्कृत साहित्यकार और उनकी कृतियां भी याद आती हैं। इस बहुभाषीय महादेश की बात सोचने पर बहुत कुछ याद आता है, मगर यहां की फिल्मों की बात शायद ही याद आती है। चमक-दमक भरी दुनिया में कौन इन्हें देखना चाहता है।

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यह जानना रोचक होगा कि दक्षिण अफ्रीका का फिल्म उद्योग विश्व में एक सबसे प्राचीन सिने-उद्योगों में से एक रहा है। चलंत बायोस्कोप की सहायता से 1895-1909 के बीच मुख्यरूप से ब्रिटिश और अमेरिकी फिल्में दक्षिण अफ्रीका के विभिन्न भागों में पहुंचती रही हैं। हरवुड्स में 1895 में 19 अप्रैल को जनता के लिए पहला काइनेस्कोप उपलब्ध हुआ।

1896 से प्रोडक्शन की हुई शुरुआत

अवश्य ही कई अन्य देशों की भांति दक्षिण अफ्रीका वह देश था जहां पहले-पहल चलती-फिरती तस्वीरें देखी गईं। कार्ल हर्ट्ज नामक व्यक्ति इंग्लैंड से प्रोजेक्टर ले आया और उसने 11 मई 1896 को एम्पायर पैलेस में पहला प्रोडक्शन किया उसने 30 सेकेंड की एक श्रृंखला दिखाई और अगले दिन यह प्रेस की सुर्खियों में था। एक नए युग की शुरुआत हुई। एडगर हाईमैन नामक एक व्यक्ति हर्ट्ज़ के साथ था वह छ: सप्ताह उसके साथ घूमता रहा और सिनेमाटोग्राफ मशीन का अध्ययन करता रहा।

जल्द ही हाईमैन वारविक ट्रेडिंग कम्पनी से फिल्में खरीदने का काम करने लगा। वे ट्राम के सामने से जोहान्सबर्ग की तस्वीरें लेते। हाईमैन की एक फिल्म ट्रान्सवाल रिपब्लिक के राष्ट्रपति पॉल क्रुगर को अपने घर से निकल कर राडज़ाल की ओर जाते दिखाती है। पॉल क्रुगर बहुत भारी भरकम डीलडौल का व्यक्ति था अत: जब वह बग्घी में चढ़ रहा था तो बग्घी एक ओर बुरी तरह झुक गई, फिल्म इस दृश्य को भी कैद करती है। यह फिल्म वारविक ट्रेडिंग कम्पनी के केटलॉग में शामिल है और पूरी दुनिया में दिखाई गई थी।

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इसमें ड्ब्ल्यू.के.एल. डिक्सन नामक का एक आदमी था इसने एडीसन के लिए काम किया था और मोशन पिक्चर कैमरा को उन्नत बनाया था। जब एंग्लो-बोअर वार प्रारंभ होने के तीन दिन बाद 14 अक्टूबर 1899 को ड्ब्ल्यू.के.एल. डिक्सन युद्ध पर फिल्म बनाने के लिए दक्षिण अफ्रीका के बाहर भेजा गया। इस शुरुआती दौर में ही फिल्म की शक्ति को पहचाना गया। इसका लाभ अच्छे-बुरे दोनों उद्देश्यों की पूर्ति केलिए प्रारंभ से होने लगा।

फिल्म का प्रोपेगंडा के लिए सदा से उपयोग किया जाता रहा है और उसका इस युद्ध में भी प्रोपेगंडा के लिए जम कर प्रयोग किया गया। 1903 तक ‘टॉपिकल’, ‘ह्यूमरस’, ‘ड्रामेटिक’ आदि श्रेणियों में फिल्में बनने लगीं।

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2000 में बनी डॉक्यूमेंट्री ‘लॉन्ग नाइट’स जर्नी इनटू डे’ - फोटो : twitter

फिल्मों में क्रिकेट

चूंकि अंग्रेजों का राज था तो क्रिकेट का क्रेज होना हा था और 1906 में ऑन द स्पॉट शूट कर न्यूलैंड्स में चल रहे इंग्लैंड/साउथ अफ्रीका क्रिकेट मैच का प्रदर्शन हुआ। 1909 में ‘द इलेक्ट्रिक थियेटर’ डरबन का स्थाई थियेटर स्थापित हुआ और एक साल बाद डरबन में ही 11 दिसम्बर, 1910 को ‘कलर्ड पीपुल ओनली’ पहला थियेटर खुला।
‘द ग्रेट किम्बर्ली डायमंड रोबरी’ पहली फुल-लेन्थ फीचर फिल्म थी जो पूरी तरह से देसी थी। 1916-1922 के बीच अफ्रीकन फिल्म प्रोडक्शन्स ने 43 फिल्में बनाई। 1921 में शैम वुड ने ‘अंडर द लैश’ नामक पहली ‘एंटी-साउथ अफ्रीकन’ फिल्म प्रदर्शित की जिसमें ग्लोरिया स्वानसन ने भूमिका की। अश्वेत परम्परागत जीवन पर पहली साउंड फिल्म ‘इन द लैंड ऑफ़ द जुलुल’ 1930 में बनी। 1948 में पहली म्यूजिकल फिल्म बनी। ‘जिम कम्स टू जो’ बर्ग/अफ्रीकन जिम’ पहली वह फिल्म थी जिसके सारे कलाकार अश्वेत थे।

एलन पैटन की किताब ‘क्राई द बिलव्ड कंट्री’ पर आधारित जोल्टन कोर्डा की 1951 में बनाई फिल्म दक्षिण अफ्रीका की प्रथम रंगीन फिल्म थी। इसमें कनाडा ली तथा सिडनी पोइटर ने भूमिकाएं की थीं। 1970 तक श्वेत-अश्वेत दर्शकों के लिए फिल्म एक स्थान पर बैठ कर देखना संभव न था।

श्वेत-अश्वेत हमेशा से रहा बड़ा मुद्दा

चूंकि यह एक महादेश है अत: दक्षिण अफ्रीका में अफ्रीकन्स, इंग्लिश, उत्तरी सोठो, शोसा, ज़ुलु, दक्षिणी सोठो, सवाना, सोन्गा, वेन्डा, स्वाति, इंडबेले यानि कई ऑफीशियल भाषाएं हैं। यह महादेश श्वेतों का उपनिवेश था अत: सरकार तथा बड़े व्यापारियों ने काफी समय तक दक्षिण अफ्रीका में सिनेमा केवल श्वेतों के लिए ही रखा, लेकिन स्थिति बदली।

1956 और 1962 के बीच करीब 60 फिल्में बनी जिसमें से चार द्विभाषीए बनी, 13 इंग्लिश में बाकी अफ्रीकन भाषाओं में बनी। जब इनका अनुवाद होता तो वह बहुत खराब होता था मगर ‘टैकी’, ‘द मेन फ़्रॉम द मिनिस्ट्री, फ़्लाइंग स्क्वाड, गोल्ड स्क्वाड को जब रेडियो प्रोग्राम के रूप में प्रस्तुत किया गया तो निम्न मध्यवर्गीय श्वेत दर्शकों ने उसका भरपूर मजा उठाया। 

फिल्ममेकर सेड्रिक सैंडस्ट्रोम ने 1994 में ‘इन डार्कनेस हॉलीवुड’ बनाई जो काफी चर्चित रही। एक डॉक्यूमेंट्री ‘इन डार्कनेस हॉलीवुड: सिनेमा एंड अपार्थेड’ में रिचर्ड एटेनबरो ने काम किया और इसे कई पुरस्कार मिले करीब दो घंटे में पीटर डैविस तथा डैनियल रिसेनफ़ील्ड की यह डॉक्यूमेंट्री फ़ुटेज की सहायता से सिने- लेखक, निर्देशक, अभिनेता के साथ होने वाले अत्याचार और दुर्व्यवहार को दिखाती है।

काफी समय तक साउथ अफ्रीकन फिल्मों पर एआईडीएस/एचआईवी, गरीबी, अत्याचार, अपराध छाए रहे। 2008 में नोबेल पुरस्कृत साहित्यकार एमजे कोट्जी के उपन्यास ‘डिस्ग्रेस’ पर इसी नाम से स्टीव जैकब्स ने फिल्म बनाई। इसमें दक्षिण अफ्रीका की एक श्वेत स्त्री के साथ हुए क्रूर बलात्कार और उसके नस्लवादी पिता तथा बलात्कार से उत्पन्न संतान एवं राजनीति की बात दिखाई गई है।

2000 में बनी डॉक्यूमेंट्री ‘लॉन्ग नाइट्स जर्नी इनटू डे’ भी रंगभेद के तहत हुई चार कहानियों की बात बताती है। श्वेत सैनिकों और अश्वेत सक्रिय कार्यकर्ताओं दोनों ने हत्याएं की हैं। वृतचित्र पूछता है कि क्या किसी को माफ किया जाना चाहिए? 2008 की बायोपिक ‘स्किन’ एक अश्वेत लड़की की कहानी है जो श्वेत अफ़्रीकन माता-पिता की संतान है। रंगभेद के काल की यह घटना राष्ट्रीय सनसनी था।

नेलसन मंडेला को लेकर 21वीं सदी में दक्षिण अफ्रीका में ‘मंडेला: लॉन्ग वॉक टू फ़्रीडम’ तथा ‘इनविक्टस’ जैसी फिल्में बनी हैं। 2020 में वहां से ‘इस्केप फ़्रॉम प्रिटोरिआ’ टिम जेन्किन के काम ‘इनसाइड आउट: इस्केप फ़्रॉम प्रिटोरिया’ पर आधारित है और सत्य घटना पर बनी है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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