पाकिस्तान में बनी फिल्में
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सत्तर के दशक में एक नई सिने-प्रतिभा संगीता, पाकिस्तानी क्षितिज पर उभरी। वह मंच की निर्देशक-अभिनेत्री थीं। लाहौर में उसने 1979 में बतौर सिने-निर्देशक ‘सोसाइटी गर्ल’ बनाई। फ़िल्म ने सफ़लता के झंडे गाड़े और निर्देशक एवं अभिनेत्री का निगार अवॉर्ड अपने नाम किया। परवीन रिज़वी सिने-संसार में संगीता के नाम से जानी गई।
‘मुट्ठी भर चावल’ (सर्वोत्तम नायिका एवं सर्वोत्तम निर्देशक पुरस्कार),‘सिर्फ़ तुम ही तो हो’, ‘तड़प’ आदि उसकी अन्य फ़िल्में हैं, उन्होंने 40 फ़िल्में निर्देशित कीं। समीना पीरज़ादा ने भी बतौर अभिनेत्री काम प्रारंभ किया और बाद में फ़िल्म तथा टीवी की एक सफ़ल निर्देशक बनीं।
‘नजदीकियां’ उनकी एक सफ़ल फ़िल्म थी। ‘इंतेहा’, ‘शरारत उनकी अन्य फ़िल्में हैं। इसके पहले 1972 में एक बहुत अच्छी फ़िल्म आई थी नाम था ‘उमराव जान अदा’(मिर्जा हादी रुसवा की कालजयी रचना पर आधारित)। ‘अदा’ में उमराव की भूमिका रानी ने की है और उसके शौहर हसन तारिक इसके निर्देशक हैं। प्यार के छल से उमराव की आत्मा पर लगी चोट-दर्द को रानी ने परदे पर साकार किया है। एक समीक्षक ने ‘इस फ़िल्म को भारत में बनी फ़िल्म ‘उमराव जान’ (मुज्जफ़र अली) की पैरोडी कहा है।
सैयद नूर माने जाते हैं सर्वश्रेष्ठ निर्देशक
‘सोसाइटी गर्ल’ फ़िल्म से सैयद नूर ने अपना पटकथा लेखन का दौर प्रारंभ किया और आगे चल कर वे पाकिस्तान के एक सर्वोत्तम निर्देशक कहलाए। उनकी पहली फ़िल्म ‘कसम’ 1992 में रिलीज हुई। ठंडी शुरुआत वाली इस फ़िल्म ने धीरे-धीरे रंग पकड़ा और एक ब्लॉकबस्टर साबित हुई। तीन साल बाद नूर की दूसरी फ़िल्म ‘जीवा’ आई जिसकी खूब चर्चा हुई। इसका कथानक गरीब बच्चों को अपहृत कर ऊंट की दौड़ में जॉकी के रूप में काम कराने से जुड़ा था।
पाकिस्तानी फ़िल्म ‘रामचंद पाकिस्तानी’ (2008) की चर्चा भारत में भी खूब हुई। यह भारत, पाकिस्तान एवं ब्रिटेन में खूब चली। न्यूयॉर्क निवासिनी महरीन जब्बार की इस फ़िल्म ने कई पुरस्कार (सत्यजित राय पुरस्कार भी) जीते। यह बायोपिक एक ऐसे लड़के और उसके पिता की कहानी है जो गैर इरादतन भारत की सीमा में चले आते हैं और नतीजन बरसों जेल में काटते हैं। महरीन ने फ़िल्म बनाना अपने पिता जावेद जब्बार से सीखा और बाद में लॉस एंजेल्स से प्रशिक्षण पाया। महरीन की दूसरी फ़िल्म का नाम, ‘दोबारा फ़िर से’ (2017) है।
एक समय गंडासा लिए सुलतान राही बने ‘मौलाना जाट’ की खूब चर्चा थी। वह पाकिस्तान की सांस्कृतिक पहचान बन गया था मगर आज इस फ़िल्म को कोई नहीं देखता है। कुछ लोग बीच-बीच में नफ़रत भड़काने का काम करते रहते हैं और देश की धरोहर नष्ट करने में हिचकते नहीं हैं। विभाजन पूर्व कराची का निशात सिनेमा पाकिस्तान की भी शान था। मगर इस साझी विरासत को 2012 के विरोध के दौरान जला कर समाप्त कर दिया गया।
सआदत हसन मंटो पर बनी फिल्में
कुछ फ़िल्मों की बात के बिना पाकिस्तान का सिने-इतिहास पूरा नहीं हो सकता है। सआदत हसन मंटो हमारी साझा विरासत हैं। उन पर दोनों देशों में फ़िल्में बनीं। पाकिस्तान में सरमद सुल्तान ख़ूस्त ने मंटो पर फ़िल्म बनाई। यह एक बेहतरीन फ़िल्म है। शोएब मंसूर ने फ़ांसी चढ़ रही एक औरत (हुमैमा मलिक) को अपनी कहानी का मौका दिया है फ़िल्म ‘बोल’ में। और शोएब मंसूर की ही ‘खुदा के लिए’ तो भारत में भी खूब देखी और सराही गई। इसमें तीन कहानियों को गूँथा गया है और 9/11 का पाकिस्तान पर असर दिखाया गया है।
‘आई एम शाहिद अफ़रीदी’ (निर्देशक: एस. अली रज़ा उस्मान) में एक युवक शाहिद अफ़रीदी बनने का ख्वाब देख रहा है। हाल की फ़िल्म ‘पंजाब नहीं जाऊंगी’ ने रिकॉर्ड तोड़ सफ़लता हासिल की है। पाकिस्तान की कई फ़िल्मों पर विस्तार से लिखा जा सकता है। यह संक्षेप में पाकिस्तान के सिने-इतिहास को समेटने की कोशिश है।
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