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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: पाकिस्तानी सिने-इतिहास

सार

पाकिस्तान में अधिकांश फिल्में उर्दू में बनती हैं, साथ ही पंजाबी, पश्तो, बलोची, सिन्धी जैसी स्थानीय भाषाओं में भी कुछ फिल्में बनती हैं। मगर अधिकतर फ़िल्में पाकिस्तानी दर्शकों तक ही सीमित रहती हैं, उनकी वैश्विक पहचान कदाचित ही बन पाती हैं। हां, भारत-पाक दर्शक एक-दूसरे की फिल्म अवश्य देखते हैं कभी खुले आम कभी चोरी-छिपे।
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पाकिस्तान में सिनेमा का इतिहास - फोटो : Istock
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विस्तार
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भारत विभाजन के पूर्व बंबई और लाहौर सिनेमा के केंद्र थे। सन् 1947 में पाकिस्तान बनने के बाद वहां लाहौर के बाद कराची और ढ़ाका भी, तीन सिनेमा निर्माण केंद्र बन गए। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद पाकिस्तान में लाहौर तथा कराची, मुख्य रूप से दो सिने केंद्र रह गए। पाकिस्तान में राजनैतिक उतार-चढ़ाव के साथ सिने-जगत भी ऊपर-नीचे होता रहा है। 60 फीचर फिल्म बनाने वाला यह देश विश्व में 20वें नंबर पर आता है।

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पाकिस्तान में अधिकांश फिल्में उर्दू में बनती हैं, साथ ही पंजाबी, पश्तो, बलोची, सिन्धी जैसी स्थानीय भाषाओं में भी कुछ फिल्में बनती हैं। मगर अधिकतर फ़िल्में पाकिस्तानी दर्शकों तक ही सीमित रहती हैं, उनकी वैश्विक पहचान कदाचित ही बन पाती हैं। हां, भारत-पाक दर्शक एक-दूसरे की फिल्म अवश्य देखते हैं कभी खुले आम कभी चोरी-छिपे।

वैसे भारत में पाक के नाटक उसकी फिल्मों से अधिक देखे जाते हैं। जब-जब दोनों देशों के रिश्तों में तनाव आता है, दोनों देश एक-दूसरे की फ़िल्म प्रतिबंधित करने की घोषणा करते हैं। मगर आज के डिजिटल युग में दर्शक जो चाहे देख ही लेता है।
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मगर मल्टिपल स्क्रीन पर हाल में जा कर फिल्म देखना मुश्किल है क्योंकि मध्यवर्ग और निम्नवर्ग (सिनेमा का संख्या की दृष्टि से प्रमुख दर्शक) मंहगी टिकट, मंहगा पेट्रोल तथा इन सिनेमा हाल में मंहगी खाने-पीने का खर्च उठाने की कूबत नहीं रखता है। चाहे वह भारत का दर्शक हो अथवा पाकिस्तान का।


नजीर अहमद खान का दौर

भारत में पैदा हुए नजीर अहमद खान (1910-83) अभिनेता, निर्देशक तथा निर्माता ने करीब 200 फिल्मों में काम किया। वे एक समय भारत के और बाद में पाकिस्तान के  सफल अभिनेता रहे। ए.आर. कार्दर उनके मित्र थे जिन्होंने कलकत्ता-बंबई की कई फ़िल्मों में खान ने काम किया और नाम पाया।

नज़ीर अहमद खान का बंबई में एक स्टूडियो भी था जो बंटवारे के दौरान नष्ट हुआ। पाकिस्तान बनने पर कार्दर भी लाहौर लौट गए। शुरुआती दौर में दोनों ने पाकिस्तानी फ़िल्म उद्योग को स्थापित करने में प्रमुख भूमिका निभाई। 

शुरू में वहां फ़िल्म से संबंधित उपकरणों की कमी थी, साथ ही फिल्म बनाने की प्रतिभा भी उतनी नहीं थी। कारण अधिकांश प्रमुख निर्देशक-अभिनेता या तो भारत में ही रह गए थे अथवा भारत लौट आए थे।

पाकिस्तान की पहली फ़ीचर फ़िल्म ‘तेरी याद’ सन् 1948 में बनी जिसमें नासिर खान एवं आशा पोस्ले ने प्रमुख भूमिकाएं की थीं। परंतु पहली सफ़लता का श्रेय अनवर कमाल पाशा तथा मुर्तज़ा गिलानी की 1950 में बनने वाली फ़िल्म ‘दो आँसू’ को जाता है।

 


पाकिस्तानी सिनेमा का स्वर्ण युग

पिछली सदी के साठ-सत्तर के दौर को पाकिस्तानी सिनेमा का स्वर्ण युग कहा जाता है। इसी समय पाकिस्तान में रंगीन फिल्में बननी प्रारंभ हुईं। 

असल में पाकिस्तान में भारतीय फ़िल्में खूब देखी जाती रही हैं। सितम्बर 1965 में वहां भारतीय फ़िल्में पूरी तरह प्रतिबंधित कर दी गई। नतीजन वहां के सिने-प्रेमी देसी फ़िल्में देखने को मजबूर हुए। पाकिस्तानी फिल्मों के दर्शकों में इजाफ़ा होने के कारण इस काल को वहां सिने-स्वर्ण युग कहा जाता है। इसी तरह एक समय भारत में बने विज्ञापनों को प्रतिबंधित कर दिया गया था। द ऑल इंडियन सिने वर्कर्स एसोसिएशन ने देश में पाकिस्तानी कलाकारों को रोक दिया था। 2018 में भी पाकिस्तान में भारत की फिल्मों एवं टीवी शो को प्रतिबंधित कर दिया था।

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पाकिस्तान में बनी फिल्में - फोटो : istock
सत्तर के दशक में एक नई सिने-प्रतिभा संगीता, पाकिस्तानी क्षितिज पर उभरी। वह मंच की निर्देशक-अभिनेत्री थीं। लाहौर में उसने 1979 में बतौर सिने-निर्देशक ‘सोसाइटी गर्ल’ बनाई। फ़िल्म ने सफ़लता के झंडे गाड़े और निर्देशक एवं अभिनेत्री का निगार अवॉर्ड अपने नाम किया। परवीन रिज़वी सिने-संसार में संगीता के नाम से जानी गई।

‘मुट्ठी भर चावल’ (सर्वोत्तम नायिका एवं सर्वोत्तम निर्देशक पुरस्कार),‘सिर्फ़ तुम ही तो हो’, ‘तड़प’ आदि उसकी अन्य फ़िल्में हैं, उन्होंने 40 फ़िल्में निर्देशित कीं। समीना पीरज़ादा ने भी बतौर अभिनेत्री काम प्रारंभ किया और बाद में फ़िल्म तथा टीवी की एक सफ़ल निर्देशक बनीं।
 
‘नजदीकियां’ उनकी एक सफ़ल फ़िल्म थी। ‘इंतेहा’,  ‘शरारत उनकी अन्य फ़िल्में हैं। इसके पहले 1972 में एक बहुत अच्छी फ़िल्म आई थी नाम था ‘उमराव जान अदा’(मिर्जा हादी रुसवा की कालजयी रचना पर आधारित)। ‘अदा’ में उमराव की भूमिका रानी ने की है और उसके शौहर हसन तारिक इसके निर्देशक हैं। प्यार के छल से उमराव की आत्मा पर लगी चोट-दर्द को रानी ने परदे पर साकार किया है। एक समीक्षक ने ‘इस फ़िल्म को भारत में बनी फ़िल्म ‘उमराव जान’ (मुज्जफ़र अली) की पैरोडी कहा है।
 


सैयद नूर माने जाते हैं सर्वश्रेष्ठ निर्देशक

‘सोसाइटी गर्ल’ फ़िल्म से सैयद नूर ने अपना पटकथा लेखन का दौर प्रारंभ किया और आगे चल कर वे पाकिस्तान के एक सर्वोत्तम निर्देशक कहलाए। उनकी पहली फ़िल्म ‘कसम’ 1992 में रिलीज हुई। ठंडी शुरुआत वाली इस फ़िल्म ने धीरे-धीरे रंग पकड़ा और एक ब्लॉकबस्टर साबित हुई। तीन साल बाद नूर की दूसरी फ़िल्म ‘जीवा’ आई जिसकी खूब चर्चा हुई। इसका कथानक गरीब बच्चों को अपहृत कर ऊंट की दौड़ में जॉकी के रूप में काम कराने से जुड़ा था।

पाकिस्तानी फ़िल्म ‘रामचंद पाकिस्तानी’ (2008) की चर्चा भारत में भी खूब हुई। यह भारत, पाकिस्तान एवं ब्रिटेन में खूब चली। न्यूयॉर्क निवासिनी महरीन जब्बार की इस फ़िल्म ने कई पुरस्कार (सत्यजित राय पुरस्कार भी) जीते। यह बायोपिक एक ऐसे लड़के और उसके पिता की कहानी है जो गैर इरादतन भारत की सीमा में चले आते हैं और नतीजन बरसों जेल में काटते हैं। महरीन ने फ़िल्म बनाना अपने पिता जावेद जब्बार से सीखा और बाद में लॉस एंजेल्स से प्रशिक्षण पाया। महरीन की दूसरी फ़िल्म का नाम, ‘दोबारा फ़िर से’ (2017) है।

एक समय गंडासा लिए सुलतान राही बने ‘मौलाना जाट’ की खूब चर्चा थी। वह पाकिस्तान की सांस्कृतिक पहचान बन गया था मगर आज इस फ़िल्म को कोई नहीं देखता है। कुछ लोग बीच-बीच में नफ़रत भड़काने का काम करते रहते हैं और देश की धरोहर नष्ट करने में हिचकते नहीं हैं। विभाजन पूर्व कराची का निशात सिनेमा पाकिस्तान की भी शान था। मगर इस साझी विरासत को 2012 के विरोध के दौरान जला कर समाप्त कर दिया गया। 


सआदत हसन मंटो पर बनी फिल्में

कुछ फ़िल्मों की बात के बिना पाकिस्तान का सिने-इतिहास पूरा नहीं हो सकता है। सआदत हसन मंटो हमारी साझा विरासत हैं। उन पर दोनों देशों में फ़िल्में बनीं। पाकिस्तान में सरमद सुल्तान ख़ूस्त ने मंटो पर फ़िल्म बनाई। यह एक बेहतरीन फ़िल्म है। शोएब मंसूर ने फ़ांसी चढ़ रही एक औरत (हुमैमा मलिक) को अपनी कहानी का मौका दिया है फ़िल्म ‘बोल’ में। और शोएब मंसूर की ही ‘खुदा के लिए’ तो भारत में भी खूब देखी और सराही गई। इसमें तीन कहानियों को गूँथा गया है और 9/11 का पाकिस्तान पर असर दिखाया गया है।

‘आई एम शाहिद अफ़रीदी’ (निर्देशक: एस. अली रज़ा उस्मान) में एक युवक शाहिद अफ़रीदी बनने का ख्वाब देख रहा है। हाल की फ़िल्म ‘पंजाब नहीं जाऊंगी’ ने रिकॉर्ड तोड़ सफ़लता हासिल की है। पाकिस्तान की कई फ़िल्मों पर विस्तार से लिखा जा सकता है। यह संक्षेप में पाकिस्तान के सिने-इतिहास को समेटने की कोशिश है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 
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