हर साल 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है, जो महिलाओं की उपलब्धियों, अधिकारों और समानता का प्रतीक है। यह दिन सिर्फ उत्सव का अवसर नहीं बल्कि उन चुनौतियों पर विचार करने का भी समय है, जिनका सामना महिलाएं आज भी कर रही हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
2022 में देशभर में महिलाओं के खिलाफ कुल 4,45,256 मामले दर्ज किए गए, जो 2021 की तुलना में 4% अधिक हैं। इन अपराधों में सबसे अधिक मामले घरेलू हिंसा, बलात्कार, अपहरण, दहेज उत्पीड़न और साइबर अपराध से जुड़े हुए हैं।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के कुल 4,45,256 मामले दर्ज किए गए, जो 2021 के 4,28,278 मामलों की तुलना में 4% की वृद्धि दर्शाते हैं। अपराध दर की दृष्टि से देखा जाए तो प्रति लाख महिला जनसंख्या पर यह दर 66.4 रही, जो चिंताजनक है।
NCRB के आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ सबसे अधिक अपराध उत्तर प्रदेश (65,743 मामले), महाराष्ट्र (45,331 मामले), राजस्थान (45,058 मामले), पश्चिम बंगाल (34,738 मामले) और मध्य प्रदेश (32,765 मामले) में दर्ज किए गए। इन पाँच राज्यों में ही देश के कुल महिला अपराधों का लगभग 50% हिस्सा दर्ज किया गया। देश की राजधानी दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराध की दर सबसे अधिक रही, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है।
महिला सुरक्षा के मुद्दे पर बात करें तो घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न अब भी प्रमुख समस्याएं बनी हुई हैं। पति और उसके परिवार द्वारा की गई क्रूरता के मामले महिलाओं के खिलाफ दर्ज कुल अपराधों में 31.4% हैं। इसके अलावा, बलात्कार और यौन हिंसा की घटनाएं भी लगातार बढ़ रही हैं, जिससे महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं खड़ी हो रही हैं।
कई महिलाएं कार्यस्थलों पर भी सुरक्षित महसूस नहीं करतीं और वहां भी उन्हें यौन उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। साइबर युग में डिजिटल उत्पीड़न भी एक बड़ी चुनौती बन चुका है, जहाँ ऑनलाइन स्टॉकिंग, धमकियां और मॉर्फिंग जैसी घटनाएँ आम हो गई हैं।
महिलाओं के खिलाफ अपराधों में न्याय की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। महिला अपराधों के मामलों में दोषियों को सजा मिलने की दर बेहद निराशाजनक है। 2022 में, बलात्कार के मामलों में सजा दर केवल 27-28% के बीच थी, जो न्याय व्यवस्था की खामियों, भ्रष्टाचार और कानूनी प्रक्रियाओं में देरी का नतीजा है।
पुलिस की लचर कार्यप्रणाली, न्यायिक प्रक्रिया में देरी और प्रभावशाली अपराधियों द्वारा मामलों को दबाने की प्रवृत्ति के कारण पीड़ित महिलाओं को न्याय मिलने में कठिनाई होती है। कई मामलों में गवाह अपने बयान से मुकर जाते हैं, जिससे अपराधी बच निकलते हैं। इसके अलावा, सामाजिक दबाव और लोकलाज के डर से भी कई महिलाएं अपराध की शिकायत दर्ज नहीं करातीं, जिससे अपराधियों का मनोबल बढ़ता है।
हालाँकि, सरकार और विभिन्न संस्थाएं महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए कई कदम उठा रही हैं। निर्भया कानून (2013) के तहत बलात्कार और यौन हिंसा के खिलाफ कड़े दंड का प्रावधान किया गया। घरेलू हिंसा अधिनियम (2005) और कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा (POSH) अधिनियम (2013) जैसे कानून भी महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए बनाए गए हैं। इसके अलावा, महिला हेल्पलाइन नंबर 1091 और 112, साइबर अपराध की शिकायत के लिए ऑनलाइन पोर्टल और त्वरित न्यायालयों की स्थापना जैसी पहल भी की गई हैं।
लेकिन महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण केवल कानून बनाने से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए सामाजिक मानसिकता में बदलाव लाना भी जरूरी है। लैंगिक समानता को बढ़ावा देना, स्कूलों में बच्चों को महिलाओं का सम्मान करना सिखाना और समाज में महिलाओं की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक भागीदारी बढ़ाना आवश्यक है। पुलिस और न्याय प्रणाली को भी अधिक संवेदनशील बनाया जाना चाहिए ताकि महिलाओं के खिलाफ अपराधों की त्वरित और निष्पक्ष जाँच हो सके।
एक और हैरान करने वाली बात यह है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में खुद महिलाएं भी शामिल होती हैं। दहेज प्रताड़ना, हत्या, मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न जैसे मामलों में कई बार सास, ननद, जेठानी, यहां तक कि खुद पीड़िता की मां भी भूमिका निभाती है। यह दर्शाता है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा सिर्फ पुरुषों की मानसिकता का परिणाम नहीं, बल्कि समाज की उस सामूहिक सोच का हिस्सा है जो महिलाओं को कमजोर समझती है।
महिला दिवस हमें याद दिलाता है कि महिलाओं की सुरक्षा और अधिकार केवल एक दिन का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक सतत संघर्ष है। NCRB की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध एक गंभीर समस्या है, जिसका समाधान केवल कड़े कानूनों से नहीं, बल्कि सामाजिक सोच और व्यवहार में बदलाव से संभव है।
इस महिला दिवस पर हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम महिलाओं की सुरक्षा, समानता और सशक्तिकरण के लिए अपनी सोच बदलेंगे और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में कार्य करेंगे। तभी महिला दिवस का वास्तविक उद्देश्य सार्थक होगा।
महिला दिवस पर किए जाने वाले समारोहों, अभियानों और नारों का कोई अर्थ नहीं जब तक कि जमीनी हकीकत न बदले। असली जरूरत है कि महिलाओं की सुरक्षा, उनके प्रति न्याय व्यवस्था की सख्ती और सामाजिक सोच में बदलाव पर ध्यान दिया जाए।
महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों पर सिर्फ कानून नहीं, बल्कि समाज को भी कठोर कदम उठाने होंगे। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक महिला दिवस का जश्न महज एक दिखावा ही रहेगा।
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