इक्कीसवीं सदी में महिलाओं के प्रति अनुचित टिप्पणी को अपराध माना जाता है- सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : पिक्साबे
उन्हें बेटियों के संस्कार की चिंता है मगर बेटे जो अपराध की घटनाओं को अंजाम दे रहे है, उनकी कोई चिंता नहीं। इनकी दृष्टि आज भी स्त्री को मनुष्य नहीं मानती है। तभी तो एक नेता सार्वजनिक मंच से कह जाते हैं कि 'लड़कों से गलती हो जाती है और इसके लिए उन्हें मौत की सजा नहीं देना चाहिए।' यह वही समाज है जहां एक मासूम का बलात्कार कर उसकी हत्या हो जाती है तो राजनीतिक पक्ष इस अपराध को गलती बताते हुए महिलाओं के साथ उत्पीड़न की मानसिकता को सार्वजनिक मंच से प्रोत्साहन देता है।
इतना ही नहीं न्याय के पैरोकार द्वारा बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के संदर्भ में स्त्रियों के प्रति विभिन्न तरह की टिप्पणियां उनकी मानसिकता को प्रदर्शित करती है। एक रिटायर जज द्वारा की गई यह टिप्पणी कि ‘सेक्स मर्द की सामान्य इच्छा है। कहा भी जाता है कि खाने के बाद अगली जरूरत सेक्स होती है। भारत जैसे रूढ़िवादी देश में सेक्स शादी के बाद ही किया जा सकता है लेकिन जब बड़े पैमाने पर बेरोजगारी है तो बड़ी संख्या में युवाओं की शादी नहीं होगी क्योंकि कोई लड़की बेरोजगार से शादी नहीं करेगी।’
तो यह टिप्पणी उनकी तथा समाज की मानसिक दशा को प्रदर्शित करता है। हमारे समाज में मां-बाप बेटियों को बचपन से नैतिक मूल्यों, इज्जत, संस्कार की शिक्षा देते हैं, किंतु इन अपराधों को अंजाम देने वाले बेटों को समझाने की बजाय माता-पिता उनके द्वारा किए गए अपराधों के बचाव में खड़े होकर समाज में स्त्रियों के प्रति आपराधिक प्रवृति को और बढ़ावा दे रहे हैं। ऐसे में माता-पिता द्वारा बेटों को नैतिक मूल्यों का बोध कराना जरूरी ही नहीं आवश्यक है।
इक्कीसवीं सदी में महिलाओं के प्रति अनुचित टिप्पणी को अपराध माना जाता है। मगर हमारे देश में उनकी बॉडी शेमिंग से लेकर उनके व्यवसायिक व व्यक्तिगत जीवन से संबंधित आपत्तिजनक व अशोभनीय शब्दों का प्रयोग करना सामान्य बात है। अपने वोट के लिए बेटियों व महिलाओं की इज्जत को तार-तार करने में भी ये राजनेता गुरेज नहीं करते।
‘बेटी की इज्जत जाएगी तो गांव और मोहल्ले की इज्जत जाएगी। अगर वोट बिक गया तो देश की इज्जत जाएगी’। ऐसे बहुत से बयान और घटनाएं भारतीय राजनीति की महिलाओं के प्रति तुच्छ दृष्टि को उभारती है। यही लैंगिक पूर्वाग्रहों से ग्रस्त सोच पूरी राजनीतिक, न्यायिक, प्रशासनिक, सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा है। तभी तो आज तक बलात्कार की घटनाओं में कमी नहीं आई बल्कि इन सबके बीच में स्त्रियों पर बढ़ती हिंसा ने स्त्रियों पर अधिकार प्राप्त करने तथा उसे वस्तु बनाने की मानसिकता का विकास हुआ।
समाज को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाए जाने की प्रक्रिया में सर्वप्रथम राजनीतिक, प्रशासनिक व न्यायिक महकमों को महिलाओं के प्रति लैंगिक पूर्वाग्रहों से मुक्त और जेंडर संवेदनशील बनाए जाने की आवश्यकता है, क्योंकि यह सभी सत्ता और शक्ति के प्रतीक हैं और युवाओं के आदर्श हैं। ऐसे में आवश्यक है कि पहले इसमें बदलाव लाया जाए तभी समाज को बदला जा सकता है।
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