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समाज में महिलाओं की स्थिति में बदलाव लाने की आवश्यकता

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हमारे समाज में स्त्रियों के प्रति हिंसा आम बात है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
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जब भी अखबार या खबरों को देखती सुनती हूं तो उसे हिंसा की खबरों से भरा पाती हूं। कोविड-19 में जब देश बंद था तब भी इन घटनाओं का थमते नहीं देखा। हिंसा में घर और बाहर का कोई भेद ही नहीं रहा। बंद में एक ओर घरेलू हिंसा को बढ़ता हुआ देखा गया तो वहीं समाज और राजनीति में उनपर शारीरिक व मानसिक हिंसा को देखा।

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हमारे समाज में स्त्रियों के प्रति हिंसा आम बात है। फिर चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक या फिर शाब्दिक। हमारे आस-पास स्त्रियों के प्रति घटने वाली शारीरिक घटनाओं के प्रति आक्रोश व विरोध आम जनता में सामान्यतः देखा जाता है किंतु हमारे समाज में स्त्रियों के प्रति होने वाली मानसिक व शाब्दिक हिंसा पर बात नहीं होती है।


स्त्री हिंसा का यह स्वरूप स्त्री चेतना को संवेगात्मक स्तर तक प्रभावित करता है। कभी-कभी हिंसा का यह स्वरूप इतना बर्बर हो जाता है कि वह आत्मघाती बन जाता है। हमारे आसपास सामान्य व्यक्ति से लेकर उच्च पदस्थ प्रशासनिक, न्यायिक व राजनीतिक महकमों तक में स्त्री के प्रति शाब्दिक हिंसा व उसके चारित्रिक हनन के लिए अशोभनीय भाषा, शब्दों का प्रयोग आम बात है। जिस पर कभी बहस होती है तो कहीं मौन विरोध तो कुछ उसके पक्ष में भी खड़े दिखाई देते हैं।
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फिर कुछ समय बाद सब ठंडा होकर गैर-जरूरी मुद्दा बनकर दबा दिया जाता है। इतना ही नहीं राजनीति में सक्रिय कई नेताओं पर महिलाओं के प्रति आपत्तिजनक टिप्पणी व दुर्व्यवहार के कई केस दर्ज है। बावजूद इसके यही स्त्री सुरक्षा और सम्मान पर बहस करते हैं और महिलाओं की सुरक्षा की पैरोकारी करते देखे जाते हैं।

हमारे समाज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि आम व्यक्ति से लेकर पढ़े-लिखे प्रबुद्ध वर्ग की भाषा में महिलाओं के प्रति अशोभनीय व आपत्तिजनक टिप्पणियां सामान्य हैं। राजनीति जो किसी देश व राष्ट्र की पथप्रदर्शक होती है वह भी महिलाओं पर ऐसे हमले करने से गुरेज नहीं करती। भारतीय राजनीति में महिला हिंसा की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए मजबूती से कार्य करने की अपेक्षा इन घटनाओं के लिए पीड़ित को ही दोषी बनाने की मानसिकता मौजूद है। 

‘यह क्या आइटम है’, 'टंच माल’, 'ये इस तरह की जितनी लड़कियां मरती है ये कुछ ही जगहों पर पाई जाती हैं। ये (लड़कियां) गन्ने के खेत में पाई जाती हैं, ये (लड़कियां) धान के खेत में ही मरी क्यों मिलती हैं? ये गेहूं के खेत में मरी क्यों नहीं मिलतीं? इनके मरने की जगह वही है और कहीं पे घसीटकर नहीं ले जाई जाती हैं। कोई इनको घसीटकर ले जाता नहीं है। तो आखिर ये घटनाएं इन्हीं जगहों पर क्यों होती हैं? ये पूरे देश स्तर पर जांच का विषय है’।

इसी तरह ‘सभी माता-पिता को अपनी बेटियों को एक संस्कारी वातावरण में शालीन व्यवहार करने का तरीका सीखाना चाहिए।' ये सभी बयान भारतीय राजनेताओं के हैं जो कहने को जन प्रतिनिधि है लेकिन पूर्णतः गैरजिम्मेदार व असंवेदनशील। जिनके लिए स्त्री के साथ हिंसा और फिर उसकी मृत्यु मायने नहीं रखती है। मायने रखती है तो केवल सत्ता।

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बेटी की इज्जत जाएगी तो गांव और मोहल्ले की इज्जत जाएगी...

इक्कीसवीं सदी में महिलाओं के प्रति अनुचित टिप्पणी को अपराध माना जाता है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पिक्साबे

उन्हें बेटियों के संस्कार की चिंता है मगर बेटे जो अपराध की घटनाओं को अंजाम दे रहे है, उनकी कोई चिंता नहीं। इनकी दृष्टि आज भी स्त्री को मनुष्य नहीं मानती है। तभी तो एक नेता सार्वजनिक मंच से कह जाते हैं कि 'लड़कों से गलती हो जाती है और इसके लिए उन्हें मौत की सजा नहीं देना चाहिए।' यह वही समाज है जहां एक मासूम का बलात्कार कर उसकी हत्या हो जाती है तो राजनीतिक पक्ष इस अपराध को गलती बताते हुए महिलाओं के साथ उत्पीड़न की मानसिकता को सार्वजनिक मंच से प्रोत्साहन देता है।

इतना ही नहीं न्याय के पैरोकार द्वारा बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के संदर्भ में स्त्रियों के प्रति विभिन्न तरह की टिप्पणियां उनकी मानसिकता को प्रदर्शित करती है। एक रिटायर जज द्वारा की गई यह टिप्पणी कि ‘सेक्स मर्द की सामान्य इच्छा है। कहा भी जाता है कि खाने के बाद अगली जरूरत सेक्स होती है। भारत जैसे रूढ़िवादी देश में सेक्स शादी के बाद ही किया जा सकता है लेकिन जब बड़े पैमाने पर बेरोजगारी है तो बड़ी संख्या में युवाओं की शादी नहीं होगी क्योंकि कोई लड़की बेरोजगार से शादी नहीं करेगी।’ 

तो यह टिप्पणी उनकी तथा समाज की मानसिक दशा को प्रदर्शित करता है। हमारे समाज में मां-बाप बेटियों को बचपन से नैतिक मूल्यों, इज्जत, संस्कार की शिक्षा देते हैं, किंतु इन अपराधों को अंजाम देने वाले बेटों को समझाने की बजाय माता-पिता उनके द्वारा किए गए अपराधों के बचाव में खड़े होकर समाज में स्त्रियों के प्रति आपराधिक प्रवृति को और बढ़ावा दे रहे हैं। ऐसे में माता-पिता द्वारा बेटों को नैतिक मूल्यों का बोध कराना जरूरी ही नहीं आवश्यक है।

इक्कीसवीं सदी में महिलाओं के प्रति अनुचित टिप्पणी को अपराध माना जाता है। मगर हमारे देश में उनकी बॉडी शेमिंग से लेकर उनके व्यवसायिक व व्यक्तिगत जीवन से संबंधित आपत्तिजनक व अशोभनीय शब्दों का प्रयोग करना सामान्य बात है। अपने वोट के लिए बेटियों व महिलाओं की इज्जत को तार-तार करने में भी ये राजनेता गुरेज नहीं करते। 

‘बेटी की इज्जत जाएगी तो गांव और मोहल्ले की इज्जत जाएगी। अगर वोट बिक गया तो देश की इज्जत जाएगी’। ऐसे बहुत से बयान और घटनाएं भारतीय राजनीति की महिलाओं के प्रति तुच्छ दृष्टि को उभारती है। यही लैंगिक पूर्वाग्रहों से ग्रस्त सोच पूरी राजनीतिक, न्यायिक, प्रशासनिक, सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा है। तभी तो आज तक बलात्कार की घटनाओं में कमी नहीं आई बल्कि इन सबके बीच में स्त्रियों पर बढ़ती हिंसा ने स्त्रियों पर अधिकार प्राप्त करने तथा उसे वस्तु बनाने की मानसिकता का विकास हुआ।

समाज को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाए जाने की प्रक्रिया में सर्वप्रथम राजनीतिक, प्रशासनिक व न्यायिक महकमों को महिलाओं के प्रति लैंगिक पूर्वाग्रहों से मुक्त और जेंडर संवेदनशील बनाए जाने की आवश्यकता है, क्योंकि यह सभी सत्ता और शक्ति के प्रतीक हैं और युवाओं के आदर्श हैं। ऐसे में आवश्यक है कि पहले इसमें बदलाव लाया जाए तभी समाज को बदला जा सकता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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