बाल विवाह महिला सशक्तिकरण की राह में एक बड़ी बाधा है- सांकेतिक तस्वीर
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भारत एक पितृसत्तात्मक देश है, यहां आज भी लड़कियों से ज्यादा लड़कों को अहमियत दी जाती है। कहने को हम महिलाओं के सशक्तिकरण की बात करते हैं लेकिन कई मामलों में आज भी बेटियां एक बोझ और जिम्मेदारी ही समझी जाती हैं। हालांकि समाज अब पहले जैसा नहीं रहा लेकिन अपवाद अब भी कम नहीं हैं।
बाल विवाह महिला सशक्तिकरण की राह में एक बड़ी बाधा है जो कई तरह की चुनौती उत्पन्न करता है। कम उम्र में शादी लड़कियों के शिक्षा के अधिकार का हनन करता है। इससे वैश्विक स्तर पर महिलाओं के विकास में कमी देखी जाती है। महिला असमानता को बढ़ावा मिलता है। शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन होता है, जिससे कोई भी समाज तरक्की की दौड़ में पिछड़ सकता है।
देश में महिला सुरक्षा, दहेज प्रथा, बाल विवाह जैसी समस्याओं से निपटने के लिए ढ़ेरों कानून बनाए गए हैं उनका पालन भी होता है, इन कानूनों का गलत उपयोग भी अपवाद स्वरूप होते रहते हैं लेकिन ज्यादातर मामलों में इनका सही से पालन न हो पाना महिला विकास के अधिकारों से वंचित कर देने वाला होता है।
स्वतंत्रता से पूर्व ब्रह्मसमाज और आर्यसमाज जैसी संस्थाओं के माध्यम से बाल विवाह की समस्या को उठाया गया था। नेटिव मैरिज एक्ट 1872, में 14 वर्ष से कम आयु की लड़कियों का विवाह वर्जित कर दिया गया। सम्मति आयु अधिनियम(Age Consent Act) 1891, में 12 वर्ष से कम आयु की लड़कियों के विवाह पर रोक लगा दी गई।
समाज सुधारक हर विलास शारदा के प्रयासों से शारदा अधिनियम 1930 में पारित किया गया, जिसके अनुसार 18 वर्ष से कम लड़के और 14 वर्ष से कम आयु की लड़की का विवाह अवैध घोषित कर दिया गया। 1978 में इसमे संशोधन करके लड़को के लिए 21 वर्ष और लड़कियों के लिए 18 वर्ष शादी की न्यूनतम आयु तय की गई।
स्वतंत्रता के बाद बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 लागू किया गया, जिसके अनुसार बाल विवाह को संज्ञेय और गैर जमानती अपराध की श्रेणी में रखा गया है। समाज से इस बाल विवाह की समस्या को समाप्त करने के लिए सरकार के साथ साथ समाज को भी बढ़ चढ़ कर आगे आना होगा।
सरकार को महिला शिक्षा के साथ रोजगार के अवसरों पर भी जोर देना होगा। अशिक्षा, गरीबी और रोजगार जैसे मुद्दों को हल करके बाल विवाह की महामारी से मुक्त हुआ जा सकता है। जिसके लिए हमें एकजुटता से काम करना होगा।
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