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महिला सशक्तिकरण की राह में बाधा बनता बाल विवाह

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वैश्विक स्तर पर प्रत्येक वर्ष लगभग 12 मिलियन लड़कियों की शादी 18 वर्ष से पहले ही कर दी जाती है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : iStock
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कोरोना महामारी के दौरान यूं तो कई तरह के बदलाव देखें गए। जिनका सीधा संबंध मानव जीवन से रहा है, लेकिन इस महामारी से उपजे लॉकडाउन में सबसे ज्यादा महिलाओं और बच्चों को प्रभावित किया। इस दौरान महिलाओं पर अत्याचार पहले से भी ज्यादा बढ़े हैं।

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अचानक हुए लॉकडाउन ने मजदूरों की बड़ी संख्या को अपने गांव की ओर पलायन करने पर मजबूर कर दिया और इस मजबूरी का खामयाजा बच्चों और महिलाओं को भुगतना पड़ा। वैसे तो गरीबी बाल विवाह की मुख्य वजहों में से एक है, लेकिन अब जब सारे काम-धंधे ठप पड़े थे तो बाल मजदूरी और बाल विवाह की तादाद पहले से भी ज्यादा बढ़ गई, जिसने महिला सशक्तिकरण की राह में कई बाधाएं उत्पन्न कर दी हैं। ऐसे समय में जब हम समानता और स्वतंत्रता जैसे मूल्यों की बात करते हैं, बालविवाह सभ्य समाज में एक प्रश्नचिन्ह लगाता है। 
     

कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक फैसले में बाल श्रम और बाल विवाह जैसे मामलों में वृद्धि की मुख्य वजह स्कूल न जाना बताया है। महामारी के इस दौर में ज्यादातर ऑनलाइन पढ़ाई ही कराई जा रही है, ऐसे में जिन माता-पिता को अपने बच्चों का पेट पालना ही दूभर हो रहा है, ऑनलाइन पढ़ाई के लिए महंगे-महंगे सेल फोन ला कर देना, आसमान से तारे तोड़ कर लाने के बराबर जान पड़ता होगा लिहाजा अपने बच्चों को या तो वे किसी काम-धंधे में लगा रहे हैं या कम उम्र में बच्चों की शादियां कराकर उनकी जिम्मेदारियों से मुक्त हो रहे हैं।
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कुछ मामले तो ऐसे भी देखने मे आए हैं, जिनमें काम न मिलने की वजह से माता-पिता अपने छोटे बच्चों को एक राज्य से दूसरे राज्य चंद रुपयों के लिए काम पर भेजने को तैयार हो गए।
     
वैश्विक स्तर पर प्रत्येक वर्ष लगभग 12 मिलियन लड़कियों की शादी 18 वर्ष से पहले ही कर दी जाती है। जिसका अर्थ है कि प्रत्येक मिनट 23 लड़कियां एवं प्रत्येक 3 सेकेंड में एक लड़की बाल विवाह में जकड़ दी जाती है। चाइल्ड लाइन इंडिया की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में मार्च से जून के बीच लगभग 5214 बाल विवाह की घटनाएं सामने आई हैं। 

आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 1970 में लगभग 75 फीसदी महिलाओं की शादी 18 वर्ष से कम उम्र में कर दी जाती थी, जो कि वर्तमान में 27 प्रतिशत है। भारत में आज भी 15 वर्ष से कम उम्र वाले विवाहों की दर 7 प्रतिशत है।

बाल विवाह का चलन पुरूषों की अपेक्षा महिलाओं में ज्यादा है, पुरूषों में 4 फीसदी लड़को की शादी 18 वर्ष से पहले कर दी जाती है। हालांकि जैसे-जैसे भारत कामयाबी के नए पायदान छूते गया इन मामलों में कमी देखी गई है।

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स्वतंत्रता से पूर्व ब्रह्मसमाज और आर्यसमाज जैसी संस्थाओं के माध्यम से बाल विवाह की समस्या को उठाया गया था...

बाल विवाह महिला सशक्तिकरण की राह में एक बड़ी बाधा है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
भारत एक पितृसत्तात्मक देश है, यहां आज भी लड़कियों से ज्यादा लड़कों को अहमियत दी जाती है। कहने को हम महिलाओं के सशक्तिकरण की बात करते हैं लेकिन कई मामलों में आज भी बेटियां एक बोझ और जिम्मेदारी ही समझी जाती हैं। हालांकि समाज अब पहले जैसा नहीं रहा लेकिन अपवाद अब भी कम नहीं हैं।

बाल विवाह महिला सशक्तिकरण की राह में एक बड़ी बाधा है जो कई तरह की चुनौती उत्पन्न करता है। कम उम्र में शादी लड़कियों के शिक्षा के अधिकार का हनन करता है। इससे वैश्विक स्तर पर महिलाओं के विकास में कमी देखी जाती है। महिला असमानता को बढ़ावा मिलता है। शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन होता है, जिससे कोई भी समाज तरक्की की दौड़ में पिछड़ सकता है।

देश में महिला सुरक्षा, दहेज प्रथा, बाल विवाह जैसी समस्याओं से निपटने के लिए ढ़ेरों कानून बनाए गए हैं उनका पालन भी होता है,  इन कानूनों का गलत उपयोग भी अपवाद स्वरूप होते रहते हैं लेकिन ज्यादातर मामलों में इनका सही से पालन न हो पाना महिला विकास के अधिकारों से वंचित कर देने वाला होता है।

स्वतंत्रता से पूर्व ब्रह्मसमाज और आर्यसमाज जैसी संस्थाओं के माध्यम से बाल विवाह की समस्या को उठाया गया था। नेटिव मैरिज एक्ट 1872, में 14 वर्ष से कम आयु की लड़कियों का विवाह वर्जित कर दिया गया। सम्मति आयु अधिनियम(Age Consent Act) 1891, में 12 वर्ष से कम आयु की लड़कियों के विवाह पर रोक लगा दी गई।

समाज सुधारक हर विलास शारदा के प्रयासों से शारदा अधिनियम 1930 में पारित किया गया, जिसके अनुसार 18 वर्ष से कम लड़के और 14 वर्ष से कम आयु की लड़की का विवाह अवैध घोषित कर दिया गया। 1978 में इसमे संशोधन करके लड़को के लिए 21 वर्ष और लड़कियों के लिए 18 वर्ष शादी की न्यूनतम आयु तय की गई।

स्वतंत्रता के बाद बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 लागू किया गया, जिसके अनुसार बाल विवाह को संज्ञेय और गैर जमानती अपराध की श्रेणी में रखा गया है। समाज से इस बाल विवाह की समस्या को समाप्त करने के लिए सरकार के साथ साथ समाज को भी बढ़ चढ़ कर आगे आना होगा।

सरकार को महिला शिक्षा के साथ रोजगार के अवसरों पर भी जोर देना होगा। अशिक्षा, गरीबी और रोजगार जैसे मुद्दों को हल करके बाल विवाह की महामारी से मुक्त हुआ जा सकता है। जिसके लिए हमें एकजुटता से काम करना होगा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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