ओलंपियन सीए भवानी देवी ने एशियाई तलवारबाजी चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता है।
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फिल्म तो केवल सफल किरदार पर बनती है ऐसी कितनी ही कहानियां होती हैं, जिन्हें अपने संद्यर्ष के समय सहयोग की कमी के कारण मंजिल के नजदीक पहुंच, दिशा बदलने पर मजबूर होना पड़ता है। भारत में अब तक के खेलों में जितने भी मेडल महिलाओं ने जीते हैं उससे कहीं ज्यादा जीतने का दम भारत की बेटियां रखती हैं।
भारत एक भूमि तपोवन है यहां की महिलाएं किसी क्षेत्र में कमतर नहीं हैं। यदि उन्हें सही दिशा और उचित मार्गदर्शन एवं परिवार का सहयोग मिले तो वह दिन दूर नहीं जब भारत के बेटियां विश्व में मेडल लाने की फेहररिस्त में सबसे आगे खड़ी होंगी।
खेलों में बढ़ रहा है महिलाओं का प्रतिनिधित्व
वर्तमान में खेलों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व पहले की अपेक्षा बहुत बढ़ा है। कुछ परिवार बेटियों को खेल में करियर बनाने के लिए बढ़-चढ़ कर हिस्सा भी ले रहें हैं। लेकिन ऐसा प्रतिशत गांवों की अपेक्षा शहरों में अधिक है। हालांकि भारत सरकार की समय-समय पर विभिन्न योजनाओं के माध्यम से महिलाओं को दिया जाने वाला प्रोत्साहन सराहनीय है।
खेलो इण्डिया गेमों के माध्यम से दिया जाने वाला सहयोग निश्चित तौर पर आने वाले समय में खेलों में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ाने वाला है। लेकिन फिर भी मंजिल अभी दूर है और हमें महिलाओं के कैरियर चुनाव के प्रति और सरल बनना होगा। बहुत सी महिलाएं हैं जिन्होंने खेल के द्वारा अपने गांव, समाज और परिवार का नाम जगमगाया है उनकी मशाल को समाज में तेजी से फैलाना होगा। उनके संद्यर्ष को समाज का साहस बनाना होगा।
भारत की संद्यर्षशील बेटियों में एक तारा, ध्रुव तारा बनकर उभरी है। जिसके द्वारा जीते गए मेडल ने भारत को तलवार बाजी में ऊंची उड़ान का न्योता दिया है। ओलंपिक में पहली बार तलवारबाजी में क्वालीफाई करने वाली, ओलंपियन सीए भवानी देवी ने एशियाई तलवारबाजी चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीत कर देश का नाम रोशन किया है।
एशियाई तलवारबाजी चैंपियनशिप का अयोजन सन 1973 से हो रहा है परन्तु अब तक कोई भी (महिला या पुरुष) एशियाई तलवारबाजी चैंपियनशिप का किला फतह नहीं कर पाया है। 29 वर्षीय भवानी ने वो कर दिखाया जो अब तक के इतिहास में किसी ने नहीं किया। उन्होंने इस किले को फतह कर कांस्य पदक जीत कर दंगल मूवी के इस डायलॉग को अनेकों को याद दिला दिया होगा - 'मैं हमेशा ये सोच के रोता रहा कि छोरा होता तो देश के लिए गोल्ड लाता। ये बात मेरे समझ में न आई कि गोल्ड तो गोल्ड होता है, छोरा लावे या छोरी।''
यकीनन जो खेलेगा वही खिलेगा। भारत की बेटियों के लिए खेलों के प्रति सकारात्मक सोच वाले समाज और बेहतर समझ वाले परिवार का निर्माण हमें मिलकर करना होगा। बेटियां वो सब कर सकती हैं जो बेटे कर सकते हैं। समाज और सरकार को उनके बेहतर भविष्य के निर्माण के लिए पहले से भी अधिक सकारात्मक सोच पैदा करनी होगी तभी वैश्विक स्तर पर खेलों में महिलाओं का परचम लहराएगा।
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