मी टू सभ्य समाज की उस पोल को खोल रहा है जहां एक सफल महिला, एक सफल और ताकतवर पुरुष पर आरोप लगाकर अपनी सफलता अथवा असफलता का श्रेय मी टू को दे रही हैं। यानी अगर वो आज सफल हैं तो इस "सफलता" के लिए उसे "बहुत समझौते" करने पड़े, और अगर वो आज असफल हैं, तो इसलिए क्योंकि उसने अपने संघर्ष के दिनों में "किसी प्रकार के समझौते" करने से मना कर दिया था।
दरअसल, यह बात सही है कि हमारा समाज पुरुष प्रधान है और एक महिला को अपने लिए किसी भी क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है। लेकिन यह संघर्ष इसलिए नहीं होता कि ईश्वर ने उसे पुरुष के मुकाबले शारीरिक रूप से कमजोर बनाकर उसके साथ नाइंसाफी की है, बल्कि इसलिए होता है कि पुरुष स्त्री के बारे में उसके शरीर से ऊपर उठकर कभी सोच ही नहीं पाता। लेकिन इसका पूरा दोष पुरुषों पर ही मढ़ दिया जाए तो यह पुरुषों के साथ भी नाइंसाफी ही होगी क्योंकि काफी हद तक महिला भी स्वयं इसकी जिम्मेदार है।
आज जब मी टू के जरिए अनेक महिलाएं आगे आकर समाज का चेहरा बेनकाब कर रही हैं तो काफी हद तक कटघरे में वे खुद भी हैं, क्योंकि इन मामलों में इतने सालों बाद सोशल मीडिया पर जो "सच" कहा जा रहा है उससे किसे क्या हासिल होगा?न्याय के लिए सोशल मीडिया का बयान कोई सुबूत नहीं होता जो आरोपी को कानूनी सज़ा दिला पाए। हां आरोपी को मीडिया ट्रायल और उससे उपजी मानसिक और सामाजिक प्रतिष्ठा की हानि और पीड़ा जरूर दी जा सकती है, लेकिन क्या ये महिलाएं जो सालों पहले अपने साथ हुए यौन अपराध और बलात्कार पर तब चुप रहीं इनका यह आचरण उचित है? नहीं, ये तब भी गलत थीं और आज भी गलत हैं, क्योंकि कल जब उनके साथ किसी ने गलत आचरण किया था उनके पास दो रास्ते थे। उसके खिलाफ आवाज उठाने का या चुप रहने का, तब वो चुप रहीं।
आज भी उनके पास दो रास्ते थे, चुप रहने का या फिर मी टू की आवाज़ में आवाज़ मिलाने का और उन्होंने अपनी आवाज उठाई। वो आज भी गलत हैं, क्योंकि सालों तक एक मुद्दे पर चुप रहने के बजाय अगर वो सही समय पर आवाज उठा लेतीं तो यह सिर्फ उनकी अपने लिए लड़ाई नहीं होती बल्कि हजारों लड़कियों के उस स्वाभिमान की रक्षा के लिए लड़ाई होती जो उन पुरुषों को दोबारा किसी और लड़की या महिला के साथ दुराचार करने से रोक देता, लेकिन इनके चुप रहने ने उन पुरुषों का हौसला बढ़ा दिया। उस समय उनकी आवाज इस समाज में एक मधुर बदलाव ला सकती थी, लेकिन आज जब वो आवाज़ उठा रही हैं तो वो केवल शोर बनकर सामने आ रही हैं।
दरअसल, कल वो अपने भविष्य को संवारने के लिए चुप थीं और आज शायद वर्तमान संवारने के लिए बोल रही हैं। यहां यह समझना जरूरी है कि महिलाएं गलत नहीं बोल रहीं बल्कि गलत समय पर बोल रही हैं। अगर सही समय पर ये आवाजें उठ गई होती तो शायद हमारे समाज का चेहरा आज इतना बदसूरत नहीं दिखाई देता। केवल पुरुषों को दोष देने से काम नहीं चलेगा।
बहरहाल, अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज कभी भी उठाई जाए तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए और उसे हिम्मत मिलनी चाहिए, लेकिन काम केवल सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोरने से नहीं होगा बल्कि इस अभासीय दुनिया के इस आंदोलन को जमीन पर उतारना होगा और कानूनी लड़ाई लड़नी होगी। क्या हर क्षेत्र की महिलाएं ये पहल करने को तैयार हैं?