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भारत को लेकर चर्चिल कितने गलत थे

Sun, 24 Feb 2019 09:35 AM IST
प्रशांत राय लेखकः रामचंद्र गुहा
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विंस्टन चर्चिल
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इसी महीने कुछ दिन पूर्व ब्रिटेन में उस समय एक विवाद गरमा गया, जब लेबर नेता जॉन मेकडोनेल ने विंस्टन चर्चिल की इस बात को लेकर आलोचना की कि उन्होंने 1910 में कामगारों पर सुरक्षा बलों को फायरिंग के आदेश दिए थे। इस पर उनके राजनीतिक विरोधी बर्बर तरीके से उन पर टूट पड़े। भद्र माने जाने वाले टोरी और चर्चिल के पोते सर निकोलस सोएम्स ने कहा, 'लोगों का ध्यान आकर्षित करने की चाहत में एक सस्ते नेता द्वारा किए गए हमले से मेरे दादा की प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आ सकती। मैं नहीं समझता कि इससे दुनिया में कोई हड़कंप मचेगा।'

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जहां तक ब्रिटेन की बात है, तो यह बात सही हो सकती है। वहां चर्चिल को आदर दिया जाता है (और जो सही भी है) क्योंकि वह ऐसे समय नाजियों के खिलाफ उठ खड़े हुए थे, जब उनकी पार्टी का कोई सहयोगी इसके लिए तैयार नहीं था। पुलिस फायरिंग में एकांत में हुई एक मौत दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अपने देश की रक्षा करने की तुलना में मामूली लगती है। लेकिन चर्चिल की प्रतिष्ठा पर भारत जैसे दूसरे स्थानों में किए गए हमलों पर क्या कहा जाए? भारतीयों के प्रति उनकी अरुचि ('वे जानवर जैसे लोग हैं और उनका धर्म भी पशुओं जैसा है।') गांधी के प्रति उनकी घृणा और भूख से तड़पते बंगाल के किसानों को खाद्य मदद से उनके इनकार के बारे में सब भली-भांति जानते हैं। एक दस्तावेज के आधार पर उनके खिलाफ अभियोग चलाने का मजबूत आधार बनता है, जोकि मुझे हाल ही में आर्किव से मिला।

 

कि उनकी नजर में किसी भी सूरत में भारत में अनिश्चितकाल तक ब्रिटिश शासन कायम रहना चाहिए। उन्होंने शिकायत की कि 'डोमेनियन स्टेटस' शब्द का इस्तेमाल इसलिए गलत तरीके से किया गया, क्योंकि इससे गलतफहमी पैदा होती है। चर्चिल ने लिखा कि 'सम्राट के उच्च सेवकों, चाहे वे मंत्री, वायसराय या गवर्नर हों, उनके द्वारा इस शब्द का इस्तेमाल या फिर इसके आधार पर उम्मीद जगाना गलत है, जब तक कि वे एक निश्चित समय में इसके हकीकत में बदलने के बारे में आश्वस्त न हों। यदि उनका विचार है कि भारत सौ या दो सौ साल में कनाडा या ऑस्ट्रेलिया की तरह स्वशासित इकाई बन सकता है और यदि उनका आशय यही है, तो भी उन्हें इस शब्द का इस्तेमाल यह स्पष्ट किए बिना नहीं करना चाहिए कि इसे ऐसे समय हासिल नहीं किया जा सकता, जब अभी मौजूद लोग इसे देख सकें।'

चर्चिल ने इसके बाद दावा किया, 'भारत न एक देश है या राष्ट्र है; यह एक महाद्वीप है, जिसमें कई देश बसे हुए हैं। भारत के समानांतर यूरोप है। लेकिन यूरोप एक राजनीतिक इकाई नहीं है। यह एक भौगोलिक अमूर्तता है। शताब्दियों के विकास के बावजूद कोई भी न तो यूरोप की राय जाहिर कर सकता है और न ही उसकी ओर से बोलने का दावा कर सकता है। लेकिन भारत में जातिगत और धार्मिक विभाजन बड़ी संख्या में है और यूरोप की तुलना में इसकी जड़ें वहां गहरी हैं। भारत में जैसी एकता और भावना व्याप्त है, वह पूरी तरह से केंद्रीकृत भारत की ब्रिटिश सरकार के कारण उपजी है... इसलिए मेरे लिए यह कल्पना करना असंभव-सा लगता है कि किसी भी विषय पर कोई समझौता भारत के साथ समग्रता में हो सकता है।'

यह एक छह पेज का ज्ञापन है, जिसे चर्चिल ने सितंबर, 1932 में ब्रिटिश संसद की भारतीय सांविधानिक सुधारों से संबंधित संयुक्त समिति के लिए तैयार किया था। इसमें उन्होंने लिखा, गोल मेज कॉन्फ्रेंस और राजनेताओं की ढीली बातों से उपजी दुश्वारियों का सबसे बुरा हिस्सा यह है कि भारत में जो कुछ भी किया जाना है, बल्कि जिसके आधार पर आगे बढ़ा जाना है, उसके बारे में सबको पता है, या फिर ये सबसे व्यापक बदलाव हैं, जोकि आसन्न हैं।

चर्चिल
इस नोट में चर्चिल ने इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए स्पष्ट किया
1932 में लिखते हुए चर्चिल कल्पना कर रहे थे कि भारत कभी भी एक स्वतंत्र देश नहीं हो सकता, जिसे लोग देख सकें। यह देखते हुए कि वह इस संबंध में कितने प्रतिक्रियावादी थे, मैं उनके दृष्टिकोण का प्रतिकार करूंगा, भारतीय राष्ट्रवादियों के दृष्टिकोणों से नहीं, बल्कि उनकी ही पार्टी के उनके सहयोगी और भारत के पूर्व वायसराय लार्ड इरविन के दृष्टिकोण से। उसी वर्ष 1932 में इरविन ने टोरंटो विश्वविद्यालय में एक व्याख्यान दिया था, जिसमें उन्होंने कहा कि हाल ही में मिस्र, चीन, फारस, अफगानिस्तान और जापान में जनांदोलन उभरे हैं, जो कि जोश से भरी राष्ट्रवादी आकांक्षाओं को आकार दे रहे हैं। इसलिए, जैसा कि इरविन ने कहा, 'किसी भी रूप में यह नहीं कहा जा सकता कि भारत उसके आसपास जो कुछ घट रहा है, उससे अप्रभावित रहेगा और यदि हम यह स्वीकार नहीं करते कि भारतीय राष्ट्रवाद मजबूत है तथा और मजबूत होगा, तो हम खुद को झांसा दे रहे हैं।'

इसके बाद इरविन ने उस समय के प्रमुख भारतीय नेताओं पर बात की। उन्होंने स्वीकार किया, 'कोई व्यक्ति किसी आंदोलन को विभिन्न रूपों में किस तरह जीवंत कर सकता है, श्री गांधी इसकी मिसाल हैं, जो कि संत और राजनेता का मिश्रण हैं और राष्ट्रीय स्वायत्तता के संघर्ष का लंबे समय से प्रतीक बने हुए हैं।' इसके आगे उन्होंने कहा, 'महात्मा हिंदू धर्म की गहरी शक्तियों की प्रार्थना करते हैं, जिनके बारे में पश्चिम के हम लोग कम जानते हैं और अपने अनुयायियों को ऐसे रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं, जिन पर हम शायद ही चल सकते हैं।' उन्होंने कहा, 'अपने विचारों और राष्ट्रीय स्वतंत्रता के आदर्श को हासिल करने के लिए गांधी कोई भी सर्वोच्च बलिदान देने के लिए तैयार हैं। अपने हिंदू अनुयायियों पर उनका प्रभाव किसी भी अन्य से अलग तरह का है और जब जब वह आह्वान करते हैं, उतनी ही बड़ी संख्या में लोग उनसे जुड़ते चले जाते हैं।'
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गांधी को लेकर यह दृष्टिकोण जरा सीमित है। अपनी व्यक्तिगत आस्था में हिंदू होने के बावजूद गांधी अपनी राजनीति में सभी क्षेत्रों और धर्मों के भारतीयों को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास करते थे। इसे अलग रखकर देखें तो इरविन ने भारतीय दावों और आकांक्षाओं के     प्रति सहानुभूति वाला नजरिया दिखाया था। वह 1932 में ही जान गए थे कि भारतीय राष्ट्रवाद मजबूत है तथा और मजबूत होगा और वह इसका स्वागत करने के लिए तैयार थे।

जबकि विंस्टन चर्चिल इसके लिए तैयार नहीं थे। वह निर्लज्ज साम्राज्यवादी थे, जो यह मानता था कि भारत कभी एक राष्ट्र नहीं बन सकता और भारतीयों को हमेशा अंग्रेजों का गुलाम रहना चाहिए। जहां तक हिटलर और नाजियों की बात है, तो चर्चिल एकदम सही थे। लेकिन गांधी और भारत को लेकर वह पूरी तरह से गलत थे। घर में तो वह राष्ट्रीय स्वतंत्रता का बचाव करते थे और विदेश में नस्लीय भेदभाव को बढ़ावा देते थे, यही विंस्टन चर्चिल की राजनीति का अंतरविरोध था।   

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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