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ईरान में अंधेरे के चालीस साल

Sun, 24 Feb 2019 09:19 AM IST
प्रशांत राय ब्रेट स्टीफेंस ( द न्यू यॉर्क टाइम्स से साभार )
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चालीस साल पहले इसी महीने ईरान में इस्लामी क्रांति हुई थी। यह अद्भुत है कि तब से लेकर आज तक ईरान के नेताओं के बारे में पश्चिम की तरफ से लगातार ऐसी टिप्पणियां की गई हैं, जिन्हें संदेह का लाभ ही कहा जा सकता है।
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चालीस साल पहले इसी महीने ईरान में इस्लामी क्रांति हुई थी। यह अद्भुत है कि तब से लेकर आज तक ईरान के नेताओं के बारे में पश्चिम की तरफ से लगातार ऐसी टिप्पणियां की गई हैं, जिन्हें संदेह का लाभ ही कहा जा सकता है। ईरान के इन नेताओं की गलत नीतियों की पश्चिम ने वैसी निंदा नहीं की, जैसी अपेक्षित थी। प्रिंस्टन के रिचर्ड फॉक ने द न्यूयॉर्क टाइम्स के 16 फरवरी, 1979 के अंक में लिखा था, 'यह अच्छा ही हुआ कि अयातुल्लाह खुमैनी को कट्टर, प्रतिक्रियावादी और अशिष्ट पूर्वाग्रहवादी के रूप में पेश करना गलत साबित हुआ। अहिंसक तौर-तरीकों के आधार पर क्रांति का एक नया मॉडल पेश कर ईरान ने मानवीय स्वरूप वाली सरकार का एक ऐसा मॉडल सामने रखा है, जिसकी तीसरी दुनिया के देशों को बहुत जरूरत है।'

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उसके एक दशक बाद निरंकुश आतंक की सत्ता का सिलसिला सलमान रुश्दी के खिलाफ फतवे और 1988 में हजारों राजनीतिक कैदियों की सामूहिक हत्या तक चला, जिनमें बच्चे भी थे। उसके बाद ईरान में एक और नई सुबह की बात कही गई, जो कि झूठ थी। खुमैनी की मृत्यु के बाद अली अकबर हाशमी रफसंजानी ईरान के राष्ट्रपति बने। उन्हें उदारवादी बताया गया। जबकि वह भ्रष्ट और शोषक थे, जिन्होंने ब्यूनस आयर्स से लेकर बर्लिन तक बमबारी और हत्याओं का अभियान चलाया। रफसंजानी के उत्तराधिकारी मोहम्मद खातमी को आधुनिकतावादी बताया गया। लेकिन उनके समय में ही 1999 में छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर बर्बर हमला किया गया और उन्होंने परमाणु हथियार बनाने का एक कार्यक्रम भी चलाया, जो गोपनीय और गैरकानूनी था।

मोहम्मद अहमदीनेजाद
हां, मोहम्मद अहमदीनेजाद के बारे में यह जरूर कह सकते हैं कि ईरान के इस नेता को वैश्विक स्तर पर कम सहानुभूति मिली। हालांकि उनके दौर में पश्चिमी रिपोर्टरों ने ईरान के कथित खुलेपन की भूरि-भूरि प्रशंसा की-जबकि अहमदीनेजाद की सत्ता ने विपक्षी ग्रीन मूवमेंट को निर्ममता से कुचलकर 2009 के चुनाव में अनैतिक तरीके से जीत हासिल की थी। उसके बाद ईरान की सत्ता हसन रोहानी के पास गई। पश्चिम के नेताओं को लगा कि रोहानी के साथ काम किया जा सकता है। उन्होंने उनके साथ परमाणु समझौता किया भी-लेकिन बाद में अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने इस समझौते को रद्द कर दिया। इसके बावजूद ईरान के प्रति सद्भावना की बयार बहती रही। वर्ष 2015 में ईरान की सरकार ने लगभग 1,000 लोगों को मौत की सजा दी, जो कि 2010 के आंकड़े से दोगुनी थी। पिछले ही महीने ईरान की सरकार ने एक व्यक्ति को चोरी के आरोप में सरेआम फांसी की सजा दी-वह व्यक्ति समलैंगिक भी था। आंकड़े बताते हैं कि ईरान में अब तक पांच हजार समलैंगिकों और लेस्बियनों की हत्या की जा चुकी है।

सिर्फ पश्चिम एशिया में नहीं, ईरान और उसके गुर्गे दुनिया में वैश्विक स्तर पर हिंसा फैलाने के अपने काम में निरंतर लगे हुए हैं। पिछली ही गर्मियों में पेरिस में एक विपक्षी समूह पर बमबारी करने के ईरान के प्रयास को विफल कर दिया गया। डेनमार्क में ईरानियों द्वारा सुनियोजित हत्या की एक और कोशिश के बाद विगत अक्तूबर में कोपेनहेगन ने तेहरान से अपने राजदूत को वापस बुला लिया। ईरान के महान एयर के विमानों में हथियार ले जाकर सीरिया में हिंसा फैलाने की खबर आने के बाद पिछले ही महीने जर्मनी ने इस एयरलाइन को प्रतिबंधित कर दिया। जर्मन खुफिया अधिकारियों का तो यहां तक कहना है कि पश्चिम से परमाणु समझौता करने के बाद ईरान ने 2016 में चोरी-छिपे परमाणु सामग्री हासिल करने की कोशिश की थी। ये वे देश हैं, जो ईरान के साथ बेहतर रिश्ते के आकांक्षी रहे हैं और जिन्होंने ट्रंप प्रशासन से अलग रवैया अपनाया। लेकिन इस मामले में तेहरान का रुख धोखेबाजी का ही रहा है।
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ईरान-अमेरिका
डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति शर्मनाक रही है, लेकिन कई मामलों में उनकी सख्त नीति की प्रशंसा होनी चाहिए : सीरिया से अमेरिकी फौज की वापसी का फैसला बेशक बहुत बड़ी गलती था, जहां रहकर अमेरिकी फौज ईरान के खूनी इरादे को बेअसर कर सकती थी, लेकिन ईरान के मामले में ट्रंप की सख्त नीति सही ही रही है। यह ध्यान देने लायक है कि ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से अमेरिका के बाहर निकल जाने के बाद तेहरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को फिर से शुरू करने की कोशिश नहीं की। यह अमेरिकी सख्ती का ही नतीजा है कि ईरान ने फारस की खाड़ी में अमेरिकी नौसेना के जहाजों को रोककर परेशान करने का काम बंद कर दिया। ईरान पर फिर से लगे प्रतिबंध ने उसे गहरे आर्थिक संकट में भी डाल दिया।

ईरान को सबक सिखाने का मतलब यह नहीं है कि उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई की जाए। लेकिन आर्थिक प्रतिबंधों के जरिये उसके नेतृत्व पर यह दबाव तो बनाया ही जा सकता है कि वह अपनी कट्टरवादी महत्वाकांक्षा और जनता की आकांक्षाओं के बीच संतुलन कायम करे। कूटनीतिक दबाव बनाकर उसे अपने नागरिकों के साथ सभ्य तरीके से पेश आने के लिए तो कहा ही जा सकता है। महिलाओं और राजनीतिक कैदियों के साथ वहां जो सुलूक होता है, उसके खिलाफ और मानवाधिकार के पक्ष में अभियान अगर ईरान को बदल पाए, तो इससे अच्छा कुछ नहीं होगा।
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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