पाकिस्तान में संस्कृत, उससे जुड़ी पांडुलिपियां और भारत की भूमिका का प्रश्न केवल भाषा या अकादमिक रुचि का विषय नहीं है, अपितु यह दक्षिण एशिया की सभ्यतागत स्मृति, ऐतिहासिक उत्तराधिकार और भारत की वैश्विक सांस्कृतिक भूमिका से जुड़ा गहन मुद्दा है।
भारत-पाकिस्तान संबंधों की चर्चा जब होती है, वह प्रायः सीमाओं, युद्धों, आतंकवाद और कूटनीतिक टकरावों के इर्द-गिर्द सिमट जाती है, लेकिन इन तात्कालिक विवादों के नीचे एक गहरी परत है, जो हजारों वर्षों की साझा बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत से बनी है। संस्कृत इसी परत का केंद्रीय तत्व है।
आज जिस भू-भाग को पाकिस्तान कहा जाता है, वह कभी वैदिक, बौद्ध और शास्त्रीय भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रमुख केंद्र रहा है। ऋग्वेद में जिन नदियों का बार-बार उल्लेख मिलता है, सिंधु, वितस्ता, परुष्णी, वे सभी आज पाकिस्तान की भौगोलिक सीमा में बहती हैं। तक्षशिला जैसा महान शिक्षा केंद्र, जिसे विश्व का प्राचीनतम अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय कहा जाता है, इसी क्षेत्र में स्थित था।
यहीं से पाणिनि जैसे आचार्य उत्पन्न हुए, जिन्होंने अष्टाध्यायी के माध्यम से संस्कृत को एक वैज्ञानिक, संरचित और वैश्विक स्तर की भाषा का स्वरूप दिया। यह ऐतिहासिक तथ्य किसी भी आधुनिक राजनीतिक सीमा से कहीं बड़ा है।
मौर्य, कुषाण और गुप्त काल में संस्कृत केवल धार्मिक अनुष्ठानों की भाषा नहीं थी, बल्कि शासन, दर्शन, गणित, खगोल, आयुर्वेद और साहित्य की मुख्य भाषा थी। गुप्त काल में संस्कृत राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित हुई। मध्यकाल में इस्लामी शासन के आगमन के बाद भले ही फारसी को राजकाज की भाषा बना दिया गया हो, लेकिन संस्कृत परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
मुगल काल में महाभारत जैसे ग्रंथों का फारसी अनुवाद कराया जाना इस बात का प्रमाण है कि संस्कृत ज्ञान को तब भी बौद्धिक महत्व प्राप्त था।
1947 का विभाजन केवल दो राष्ट्रों का निर्माण नहीं था, बल्कि वह एक गहरे सभ्यतागत विच्छेद का क्षण भी था। पाकिस्तान के गठन के बाद वहां की राष्ट्रीय पहचान इस्लामी और उर्दू-केंद्रित ढांचे में विकसित की गई। इस प्रक्रिया में संस्कृत, जो उस भू-भाग की प्राचीन भाषा थी, को ‘पूर्व-इस्लामी’ और ‘भारत-केंद्रित’ कहकर धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन और शिक्षा से बाहर कर दिया गया।
विभाजन के समय संस्कृत के विद्वान, पंडित, शिक्षक और पांडुलिपियों के संरक्षक भारत की ओर चले आए। अनेक ग्रंथ अपने साथ ले जाए गए, लेकिन बड़ी संख्या में संस्कृत पांडुलिपियां लाहौर, कराची, सिंध और पंजाब के संग्रहालयों, अभिलेखागारों व मंदिरों में रह गईं।
आज यह एक स्थापित तथ्य है कि पाकिस्तान में संस्कृत की पांडुलिपियां मौजूद हैं। लाहौर संग्रहालय, पंजाब विश्वविद्यालय, नेशनल आर्काइव्स और सिंध के कुछ धार्मिक स्थलों में वेद, पुराण, धर्मशास्त्र, ज्योतिष और बौद्ध संस्कृत ग्रंथों के अवशेष पाए जाते हैं।
समस्या यह नहीं है कि ये पांडुलिपियां अस्तित्व में नहीं हैं, बल्कि समस्या यह है कि उनका संरक्षण, सूचीकरण और डिजिटलीकरण लगभग न के बराबर है। यह स्थिति केवल पाकिस्तान की सांस्कृतिक विफलता नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की साझा स्मृति के लिए भी एक गंभीर क्षति है।
हाल में लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज में संस्कृत का एक परिचयात्मक कोर्स शुरू होना एक छोटा, लेकिन महत्वपूर्ण संकेत है। यह बताता है कि पाकिस्तान के कुछ अकादमिक वर्ग अपनी साझा विरासत को पूरी तरह नकारने के पक्ष में नहीं हैं।
यह पहल प्रतीकात्मक है, सीमित है, लेकिन यह उस मानसिक जड़ता में एक दरार अवश्य है, जो दशकों से बनी हुई थी। यहीं से भारत की भूमिका और जिम्मेदारी का प्रश्न सामने आता है।
भारत को यह तय करना होगा कि वह इस मुद्दे को भावनात्मक प्रतिक्रिया के रूप में देखता है या दीर्घकालिक सभ्यतागत रणनीति के रूप में। भारत को संस्कृत के संदर्भ में सभ्यतागत कूटनीति अपनानी चाहिए। भारत को यह स्थापित करना होगा कि संस्कृत केवल एक भारतीय भाषा नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की साझा बौद्धिक विरासत है।
उसके संरक्षण व वैश्विक नेतृत्व की जिम्मेदारी भारत पर स्वाभाविक रूप से आती है। जैसे चीन कन्फ्यूशियस परंपरा का वैश्विक प्रतिनिधित्व करता है, वैसे ही भारत को संस्कृत के संदर्भ में नेतृत्वकारी भूमिका निभानी चाहिए।
इस दिशा में सबसे व्यावहारिक और प्रभावी कदम डिजिटल पुनर्प्राप्ति हो सकता है। भारत को चाहिए कि वह पाकिस्तान में मौजूद संस्कृत पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण, पाठ-संपादन और अनुवाद में तकनीकी और अकादमिक सहयोग की पेशकश करे।
मूल पांडुलिपियां जहां हैं, वहीं रहें, लेकिन उनकी उच्च गुणवत्ता वाली डिजिटल प्रतियां भारत और विश्व के विद्वानों के लिए उपलब्ध हों। यह न केवल कानूनी विवादों से बचाता है, बल्कि भारत को नैतिक और बौद्धिक नेतृत्व भी प्रदान करता है।
अकादमिक सहयोग इस प्रक्रिया का तीसरा महत्वपूर्ण आयाम हो सकता है। भारतीय विश्वविद्यालयों, संस्कृत संस्थानों और शोध परिषदों को पाकिस्तान के चुनिंदा शैक्षणिक संस्थानों के साथ संयुक्त सेमिनार, ऑनलाइन पाठ्यक्रम और अतिथि व्याख्यान जैसी पहल करनी चाहिए। यह सहयोग किसी भी प्रकार के धार्मिक प्रचार से मुक्त होना चाहिए और इसे ज्ञान, इतिहास और साझा विरासत के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
वैसे जहां तक पांडुलिपियों की भौतिक वापसी का प्रश्न है, केवल विशिष्ट और स्पष्ट मामलों में यह मुद्दा उठाया जाना चाहिए, जहां यह प्रमाणित हो कि वे 1947 में अवैध रूप से रोकी गई थीं और किसी निजी हिंदू, जैन या बौद्ध संस्था की संपत्ति थीं। ऐसी प्रक्रिया भी केवल द्विपक्षीय सहमति और अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के तहत ही होनी चाहिए।
यह प्रश्न केवल अतीत से जुड़ा नहीं है, बल्कि भारत के भविष्य की भूमिका से जुड़ा है। क्या भारत स्वयं को केवल एक सैन्य या आर्थिक शक्ति के रूप में देखेगा, या एक ऐसे राष्ट्र के रूप में जो ज्ञान, भाषा और सभ्यता का वैश्विक केंद्र हो?
यदि भारत संस्कृत को केवल अपनी सीमाओं तक सीमित कर लेता है और उसके ऐतिहासिक विस्तार क्षेत्र से मुंह मोड़ लेता है तो वह अपनी ही सभ्यतागत भूमिका को संकुचित कर लेगा।
पाकिस्तान में संस्कृत की स्थिति आज भले ही कमजोर हो, लेकिन उसका इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। भारत का दायित्व है कि वह उस इतिहास को स्मरण में रखे, उसका संरक्षण करे और उसे बौद्धिक पुनर्जागरण का माध्यम बनाए।
संस्कृत न सीमाएं मानती है, न धर्म, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि जिस सभ्यता ने संस्कृत को जन्म दिया, उसके संरक्षण और नेतृत्व का नैतिक अधिकार उसी का है। भारत को इस अधिकार का प्रयोग शांत आत्मविश्वास, ऐतिहासिक तथ्यों और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ करना चाहिए। यही भारत का पक्ष है, मजबूत, तथ्यपरक और सभ्यतागत रूप से अडिग।
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