बिहार और बंगाल में इसी साल चुनाव होने हैं।
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भारत में उपचुनाव और फिर विधानसभा चुनाव का क्या होगा?
भारत में भी कोरोना संकट के चलते राज्यसभा के चुनाव स्थगित करने पड़े हैं। मप्र, महाराष्ट्र, उप्र समेत कई राज्यों में राज्यसभा की रिक्त सीटों के लिए मार्च-अप्रैल में चुनाव की प्रक्रिया अंतिम चरण में स्थगित की गई। मप्र में तो कोरोना संकट काल में भी सत्ता पलट की सियासत के चलते 22 विधानसभा सीटें रिक्त हुई हैंं। इनमें से दो पूर्व विधायक अब मंत्री भी बना दिए गए हैं। इन सीटों पर सितंबर तक चुनाव होना चाहिए।
उधर महाराष्ट्र में बिना किसी सदन के सदस्य रहे मुख्यमंत्री बने शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को 29 मई तक विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य चुना जाना आवश्यक है, वे इस तारीख को बतौर मुख्यमंत्री छह महीने पूरे करेंगे। अगर सदस्य नहीं बन सके तो मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ेगा या यों कहें कि स्वयमेव ही वे मुख्यमंत्री नहीं रह जाएंगे। विधान परिषद का चुनाव भी स्थगित हो जाने से अब उद्धव विधान परिषद मेंं मनोनीत सदस्य बनकर मुख्यमंत्री पद बरकरार रखने की कोशिश में हैं जरूर लेकिन मनोनयन का अधिकार राज्यपाल को है। मनोनयन को राज्यपाल की मंजूरी मिलने या न मिलने के पेंच से ज्यादा बड़ा सवाल यह है कि क्या मनोनीत सदस्य मुख्यमंत्री हो सकता है? किसी भी तरह के सदन में किसी भी तरह के मनोनीत सदस्यों को मताधिकार नहीं होता तो मताधिकार विहीन कोई सदस्य सदन का नेता मुख्यमंत्री या मंत्री भी कैसे हो सकता है?
बिहार और पश्चिम बंगाल चुनाव ....
भारतीय राजनीति में वर्तमान में सर्वाधिक महत्वपूर्ण बिहार और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होना है। पहले बिहार और फिर बंगाल में। सवाल यह है कि कोरोना संकट अगर जल्द नहीं टला तो क्या इन राज्यों के विधानसभा आम चुनाव पर भी असर पड़ेगा? गैर भाजपा दलों की सियासत के लिहाज से यह सवाल अत्यंत महत्वपूर्ण है और उन दलों में अब इस पर सुगबुगाहट शुरू भी होगई है। राज्यसभा चुनाव टलने और इसके बाद कोरोना संकट गहराने ने इन दलों को चौकन्ना कर दिया है। लोकसभा की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस की कोरोना संकट पर केंद्र सरकार की घेराबंदी के पीछे एक कारण भविष्य की राजनीति भी है।
मध्य प्रदेश में पहले से ही टले नगरीय निकाय और पंचायती राज चुनाव मे कोरोना जनित नया पेंच
मध्यप्रदेश में बीते साल कांग्रेस की तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने नगरीय निकायों के चुनाव नवंबर में नही कराए, सरकार महापौर और नपाध्यक्षों के सीधे चुनाव के बजाय चुने हुए पार्षदों में से ही चुनने की ढाई दशक पुरानी पद्धति को फिर लागू करना चाहती थी। इसके पीछे निकायों में भाजपा के जारी वर्चस्व को तोड़ने की मंशा थी लेकिन तत्कालीन विपक्ष भाजपा ने पुरजोर विरोध किया और राज्यपाल लालजी टंडन ने सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी।
सरकार ने निकायों की चुनी हुई परिषदों और महापौर, अध्यक्षों का कार्यकाल पूरा होते ही प्रशासक नियुक्त कर निकाय पूरी तरह अफसरों को सौँप दिए। लेकिन इस साल के तीसरे महीने यानी प्रशासक व्यवस्था के करीब पांच माह पूरे होने तक सत्तापलट हो जाने के बाद अब भाजपा की शिवराज सरकार ने यह प्रशासक व्यवस्था खत्म कर पांच साल का कार्यकाल पूरा कर चुके महापौरों और अध्यक्षों को ही प्रशासक की जगह बैठाने का फैसला कर लिया है।
यानी कोरोना के संकट के चलते यह किया गया है, इसी तरह का फैसला त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं के लिए किया गया। यानी सरपंच, जनपद और जिला पंचायत अध्यक्षों की जगह प्रशासनिक अधिकारियों को दिए गए अधिकारों को अब कार्यकाल पूरा कर चुके सरपंच, जनपद और जिला पंचायत अध्यक्षों को कमान दी गई है। यह अभूतपूर्व हालात हैं। सवाल यह है कि क्या इन फैसलों को अदालत में चुनौती नहीं दी जाएगी?
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